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कुर्बानी का प्रतीक सुर्ख पॉपी

Posted On November - 15 - 2018

निवेदिता चौधरी
इस साल प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के सौ साल और ब्रिटेन का ‘यादगार’ रविवार एक ही दिन थे। ब्रिटेन और राष्ट्रमंडल देशों में ‘यादगार’ रविवार दो विश्व युद्धों और बाद के संघर्षों में ब्रिटिश व राष्ट्रमंडल के सैनिकों व महिलाओं के योगदान की याद में जश्न मनाने के लिए मनाया जाता है। फ्रांस के कॉम्पीन में वर्ष 1918 के 11वें महीने में 11 तारीख को सुबह 11 बजे मित्र देशों और जर्मनी के बीच युद्ध विराम संधि हुई। हालांकि, औपचारिक शांति समझौता अगले साल वर्साइली की संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद हुआ। प्रथम विश्व युद्ध को मानव इतिहास में सबसे घातक संघर्षों में से एक माना जाता है। इसमें करीब 2 करोड़ लोग मारे गए थे और 2 करोड़ अन्य घायल हुए थे। इस युद्ध के दौरान पॉपी (खसखस) के फूल जंग में अपनी जिंदगी गंवाने वाले लाखों सैनिकों की याद और सम्मान का प्रतीक बन गए थे।
पहले विश्व युद्ध की ज्यादातर लड़ाई पश्चिमी यूरोप में लड़ी गई थी। खूबसूरत ग्रामीण इलाकों पर हमले हुए। हरे-भरे मैदान जल्द ही उजाड़ में बदल गए। हालांकि, इस तबाही के बीच भी गहरे लाल रंग के पॉपी के फूल लगातार खिले और फलते-फूलते रहे।
1915 में अपने एक दोस्त को खोने के बाद सेना में डॉक्टर कनाडा के लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन मैक्रे खिले हुए पॉपी को देखकर कविता लिखने को प्रेरित हुए। उन्होंने ‘फ्लेंडर्स फील्ड’ कविता लिखी। इस कविता ने अमेरिकी प्रोफेसर मोइना माइकल को लाल सिल्क के पॉपी बनाने को प्रेरित किया। फ्रेंच महिला ग्यूरिन इन्हें इंगलैंड लेकर आई। प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के दो साल बाद ब्रिटिश सेना ने ऐसे 9 लाखों पॉपी बनाने का ऑर्डर दिया और इन्हें 11 नवंबर, 1921 को बेचा गया। ये देखते ही देखते बिक गए और उस पहली ‘पॉपी अपील’ से एक लाख पाउंड जुटाए गए, जो उस वक्त बहुत बड़ी राशि थी। यह राशि पहले विश्व युद्ध के सैनिकों की मदद के लिए इस्तेमाल की गई।
भारत ने ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में भारी योगदान दिया था। यहां से मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ने और मरने के लिए बड़ी संख्या में वालंटियर भेज गए। वर्तमान के पंजाब, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और बिहार से लगभग 15 लाख मुस्लिम, सिख और हिंदू भारतीय अभियान बल में शामिल हुए और इन्होंने पश्चिमी मोर्चा संभाला। इसने लोगों को जाति व्यवस्था को बाईपास करने का मौका दिया, क्योंकि एक सैनिक बनने का मतलब अच्छा वेतन और ‘योद्धा जाति’ का हिस्सा बनने का अवसर था। इनमें से हजारों सैनिक मारे गए और 67 हजार घायल हुए और 10 हजार लापता हो गए थे।
1918 में जैसे ही प्रथम विश्व युद्ध के विराम की खबरें दुिनया सहित ब्रिटेन पहुंची तो यहां के चर्चाें में शांत पड़ी घंटियां बज उठीं।
युद्ध विराम के 100वें साल यानी इस 11 नवंबर को भी पूरे ब्रिटेन में 3 हजार से ज्यादा चर्चाें की घंटियां उन लोगों की याद में
बजाई गईं, जिन्होंने इस युद्ध में अपनी जानें गंवाई थीं। ब्रिटेन और जर्मनी की सरकारों ने अन्य देशों से भी एक ही वक्त घंटियां बजाने की अपील की थी, ताकी जो देश कभी दुश्मन थे उनमें एकता और मित्रता प्रदर्शित।


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