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अरावली पर आफत

Posted On November - 8 - 2018

हर्षदेव
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु पैनल की नयी रिपोर्ट ने भारत को आगाह किया है कि पर्यावरण बचाने की सबसे विकट चुनौती उसी के सामने है, लेकिन हम अब भी अपने परिवेश को खुद नष्ट करने का आत्मघाती अपराध जारी रखे हुए हैं| हिमालय क्षेत्र में विनाशकारी चार धाम योजना के लिए हजारों पेड़ काटने और बारूदी सुरंगें लगाकर पहाड़ों को खंड-खंड करने पर सुप्रीमकोर्ट को रोक लगानी पड़ी| अरावली पर्वत शृंखला की लूट पर भी अदालत को ही आदेश देना पड़ा कि वहां दो दिन में खनन पूरी तरह बंद कराया जाए| सुनवाई के दौरान बेहद हैरान करने वाली जानकारी अदालत को दी गई कि अरावली की 31 पहाड़ियां माफिया हजम कर चुका है| गंगा का विनाश रोकने के लिए प्रो. जीडी अग्रवाल ने जीवन बलिदान कर दिया, लेकिन इस महान नदी का चीरहरण होते सरकार अब भी तमाशबीन की तरह देख रही है| कुंभ का एकमात्र महत्व गंगास्नान है| हम उसके नाम पर मेला तो लगाएंगे, लेकिन गंगा जल को आचमन छोडिए, नहाने लायक भी नहीं रहने दे रहे| राजधानी दिल्ली प्रदूषण से कराह रही है, लेकिन उसकी हवा को सांस लेने लायक बनाए रखने के लिए भी हम कुछ ठोस कदम नहीं उठा पा रहे हैं| अपनी इस लाचारी, बेबसी और लालच पर हम शर्मिंदा भी नहीं हैं|
सुप्रीमकोर्ट ने चार धाम परियोजना को अधबीच स्थगित करके हिमालय को नष्ट होने से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है| यह बहुत दूरगामी फैसला है| आने वाले दसियों साल तक इससे होने वाले लाभ पर्यावरण को मिलते रहेंगे| चारधाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ यात्रा के लिए 522 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई जानी है। इसमें से 285 किलोमीटर क्षेत्र में काफी काम हो चुका है| अभी तक इतना मार्ग बनाने में ही 23 हजार पेड़ काट डाले गए| पूरी योजना के लिए 43 हजार पेड़ काटने थे| योजना को पूरा करने के लिए हिमालय को हजारों स्थानों पर पहाड़ों की गहराई में बारूदी सुरंगें लगाकर खोखला और जर्जर बनाया गया| देश में कोई भी दूसरी ऐसी योजना नहीं बनी, जिसके लिए दुनिया की सबसे समृद्ध प्राकृतिक संपदा के धनी हिमालय को इस तरह कंगाल-तबाह करने का विचारहीन खाका खींचा गया हो| गनीमत है कि अदालत ने विवेक का इस्तेमाल करते हुए इस बर्बादी को रोकने का नेक काम किया है| हिमालय की पारिस्थितिकी के बारे में हाल की एक रिपोर्ट बताती है कि हिमशैलों (ग्लेशियर) का दायरा तेजी से सिकुड़ रहा है| इस पर्वतराज का तापमान पृथ्वी के वातावरण से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है| एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 2300 हिमशैल झील या विशाल तालाबों का आकार ले चुके हैं| वनस्पति के अंधाधुंध दोहन की वजह से कई जंगल तबाह हो चुके हैं| वनस्पतियाें की सैकड़ों प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं, लेकिन सरकार ने इन समस्याओं पर ध्यान दिए बिना ही चारधाम-यात्रा जैसी विनाशकारी योजना पर काम शुरू करा दिया| यह कदम पर्यावरण के लिहाज से बहुत नुकसानदायी सिद्ध हुआ है| गनीमत है कि सब नष्ट होने से पहले ही इस पर रोक लगा दी गई|
अरावली पर्वत शृंखला की बर्बादी के तथ्य भी इससे अलग नहीं हैं| उसकी 31 पहाड़ियां लुप्त हो जाएं और सरकारों को पता भी न लगे तो इसे आत्मशत्रुता के अलावा क्या कहा जा सकता है! अरावली का विस्तार दिल्ली-हरियाणा से गुजरात तक है| करीब 692 किलोमीटर लंबी इन पहाड़ियों में आज भी दर्जनों जंगल लहलहा रहे हैं, जिनमें शेर-भालू-भेड़िये जैसे वन्य जीव विचरते और वातावरण को संतुलित बनाए रखने का जिम्मा निभाते हैं| इन पर्वत शृंखलाओं से अनेक नदियाें का भी जन्म होता है, लेकिन इस प्राकृतिक संपदा की अनवरत लूट आंखें मूंदे बैठी सरकारों की नाक के नीचे बेरोकटोक जारी है| अंततः अदालत को दखल देने के लिए आगे आना पड़ा, जिसने तत्काल इसको रोकने के आदेश जारी कर दिए हैं| अरावली में माफिया राज की सच्चाई पर पिछले दो दशक से अदालत संज्ञान ले रही है और उसे बार-बार इसकी रोकथाम के आदेश जारी करने पड़ते हैं, लेकिन अफ़सोस इनकी रक्षा का दायित्व जिन पर है, वे आश्चर्यजनक रूप से कर्तव्यहीन बने हुए हैं| कहने की जरूरत नहीं कि इसके पीछे संबंधित लोगों के स्वार्थ और लालच ही कारण है। सवाल यह है कि सरकार इसे क्यों होने दे रही है?
हमने पेरिस में जलवायु संरक्षण समझौते पर बड़े उत्साह के साथ हस्ताक्षर किए और पर्यावरण रक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन उस संकल्प पर अमल नहीं कर पा रहे हैं। इसका कारण है आर्थिक लालच। कारोबारी घरानों के स्वार्थों को पूरा होने देने के लिए देश का परिवेश नष्ट होने की चिंता की भी
अनदेखी की जा रही है| यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण नहीं बचेगा तो हम सब भी नहीं बचेंगे| बढ़ते प्रदूषण के नुकसान अकसर किसी दूर के खतरे के रूप में देखे जाते हैं, जबकि सच यह है कि दूषित जलवायु आज भी हमारी ही नहीं, समूचे प्राणिजगत की जिंदगी को बीमार और कमजोर बना रही है| उससे वनस्पतियां भी बीमार हो रही हैं| एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने की वजह से पेड़-पौधे पूरी तरह फोटोसिन्थेसिस (भोजन बनाने की वानस्पतिक क्रिया) नहीं कर पाते और कमजोर रह जाते हैं। इससे उनकी आयु भी कम रह जाती है| प्रदूषण के दुष्प्रभावों पर वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ मेडिसिन ने एक महत्वपूर्ण शोध के जरिए पता लगाया है कि मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों की संख्या में हो रही भारी बढ़ोतरी का वास्तविक कारण दूषित आबोहवा है| इस अध्ययन दल के मुखिया जियाद अल-अली के अनुसार, अकेले 2016 में प्रदूषण की वजह से मधुमेह के 32 लाख यानी 14 प्रतिशत नये लोग शिकार बने| इस शोध के नतीजे स्वास्थ्य पत्रिका ‘लेंसेट प्लेनेटरी हेल्थ’ में प्रकाशित हुए हैं| इनमें बताया गया है कि वायु प्रदूषण के जिस स्तर को विश्व स्वास्थ्य संगठन सुरक्षित मानता रहा है, वह भी सेहत के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर रहा है| यह शोध इसलिए भी अहम है कि औद्योगिक विकास के पैरोकार जलवायु को बचाने के लिए लागू प्रतिबंधों को जरूरत से सख्त बताते रहे हैं| उनका तर्क है कि इन्हें सरल और लचीला बनाया जाना चाहिए, जिससे औद्योगिक विकास में कोई बाधा न आए|
पृथ्वी का पर्यावरण बचेगा तो ही उस पर जीवन रहेगा| जिस तेजी से उसका तापमान बढ़ रहा है, वह बहुआयामी संकट की दस्तक है| आहार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आश्रय सब कुछ पृथ्वी की सेहत पर निर्भर है| विशेषज्ञों ने बढ़ते तापमान की वृद्धि को 1.5 सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है| विश्व के साथ यह हमारी और सभी की जिम्मेदारी है कि पर्यावरण को बचाने के उपायों में सहभागी बनें और निजी लालच के कारण जलवायु को क्षति पहुंचाने वाले स्वार्थी तत्वों पर कठोर अंकुश लगाने की कार्रवाई करें|

दिल्ली से गुजरात तक
अरावली पर्वत शृंखला की तुलना अमेरिका के अल्पेशियन पर्वतों से की जाती है। यह संसार की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला है, जो राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में बांटती है। अरावली का सर्वोच्च पर्वत शिखर सिरोही जिले में गुरुशिखर है, जो माउंट आबू में है। अरावली पर्वत शृंखला की कुल लंबाई गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक 692 किलीमीटर है। इसका लगभग 80 फीसदी विस्तार राजस्थान में है। दिल्ली में राष्ट्रपति भवन जिस रायशेला पहाड़ी पर बना है, वह अरावली का ही हिस्सा है। इसकी कुछ चट्टानी पहाड़ियां दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक हैं। यह पर्वतमाला 2 भागों में विभाजित है। पहली सांभर-सिरोही पर्वतमाला- जिसमें माउंट आबू के गुरु शिखर सहित अधिकतर ऊंचे पर्वत हैं। दूसरी सांभर-खेतरी पर्वतमाला- जिसमें तीन विच्छिन्न क्षेत्र आते हैं। अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है। यह पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने का कार्य करती है।


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