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लालाजी की ‘माया’

Posted On October - 4 - 2018

भाजपा के दिल्ली वाले ‘लालाजी’ इन दिनों प्रदेश में पूरे सक्रिय हैं। उनके कंधों पर प्रभार ही ऐसा है। दिल्ली से सटा होने की वजह से हरियाणा में राजनीतिक गतिविधियां वैसे भी अधिक रहती हैं। साथ ही, सियायी उठापठक के लिए भी यह प्रदेश चर्चाओं में रहा है। इन दिनों सेठजी लोकसभा क्षेत्रवार पार्टी पदाधिकारियों एवं वर्करों की बैठकें ले रहे हैं। बताते हैं कि मिशन-2019 के लिए ‘भावी सांसदों’ का चयन करने का जिम्मा उन्हें सौंपा हुआ है। अब जब ऐसी बात होगी तो अपने मौजूदा भाई लोगों यानी सांसदों की परेशानी तो बढ़ेंगी ही। वैसे हरियाणा के दो सांसद तो खुद ही चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं। दो-तीन के हालात वैसे ही सही नहीं दिख रहे। ऐसे में ‘लालाजी’ के सामने विकल्प खुले हैं। सो, साहब की कोठी पर भी इन दिनों ‘परिक्रमा’ करने वाले बढ़ गए हैं।

केजरीवाल का हरियाणा प्रेम
हरियाणा मूल के सेठजी और अपने दिल्ली वाले प्रधानजी यानी सीएम अरविंद केजरीवाल हरियाणा को लेकर कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं। न तो हरियाणा आने का कोई मौका छोड़ते हैं और न ही यहां से दिल्ली जाने वाले लोगों से मुलाकात में कोई कंजूसी दिखा रहे हैं। अब तो प्रचार की भी पूरी रणनीति बना चुके हैं। पंजाब में हुई चूक और भूल को दोहराना नहीं चाहते। सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से लोगों में पैठ बना रहे हैं। अब राजनीतिक कार्यक्रमों का भी पूरा रोडमैप बना चुके हैं। दिवाली के तुरंत बाद वे दिल्ली से अधिक हरियाणा में सक्रिय दिख सकते हैं। सेठजी का क्या होगा, यह तो अभी कह नहीं सकते, लेकिन इतना जरूर है कि वे अपने कांग्रेस व भाजपा वाले कई भाई लोगों की राहें जरूर मुश्किल कर सकते हैं।

चौटाला की दुविधा
इनेलो वाले ‘बड़े साहब’ 14 दिन की फरलो पर तिहाड़ से बाहर आ चुके हैं। बाहर आते ही उनका पहला कदम पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में पड़ा। गोहाना रैली में उनकी रौबदार आवाज लोगों को सुनने को मिल सकती है। अकसर यह कहा जाता है कि चौटाला का बाहर आना कई जाट नेताओं के लिए बड़ी परेशानी से कम नहीं है। अब अपने ‘बड़े साहब’ बाहर वालों से तो जैसे-तैसे निपट भी लें, लेकिन इन दिनों घर में जो ‘संग्राम’ चल रहा है, उससे कैसे निपटेंगे, इस पर सभी की नजरें हैं। वैसे इनेलो सुप्रीमो काफी सुलझे हुए और अनुभवी हैं। फिर भी ‘बाहरी’ पंचायतों में मामले निपटाना अलग बात है। असल परीक्षा तो अब होगी जब घर में छिड़ी ‘महाभारत’ को हल करेंगे।

काका की धार्मिक यात्रा
मनोहर काका वैष्णों देवी में मत्था टेकने के बाद कुरुक्षेत्र के 48 कोस की परिक्रमा पूरी कर चुके हैं। डेढ़ दर्जन से अधिक धार्मिक स्थलों पर पूजा-पाठ के बाद एक गुरुद्वारे के कार्यक्रम में शामिल नहीं होने को लेकर बवाल मच गया। कहने वाले कह रहे हैं काका ने अच्छा ही किया जो इस आयोजन में नहीं गए। अगर चले जाते तो और भी बखेड़ा खड़ा हो सकता था। गुरुद्वारे में जरनैल सिंह भिंडरांवाला की फोटो जो लगी थी। यह तो खुफिया एजेंसियों ने काका को पहले ही आगाह कर दिया। सो, काका ने भी तुरंत कार्यक्रम में बदलाव कर डाला। वैसे काका के इस फैसले को लेकर लोगों में चर्चाएं हैं।

छुपे रुस्तम प्रधानजी
साइकिल वाले प्रधानजी छुपे रुस्तम निकले। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के मासिक खर्चे बेशक मुश्किल से निकल रहे हैं, लेकिन प्रधानजी ने पानीपत की ‘पोल खोल-हल्ला बोल’ रैली में पैसों की नदियां बहा दीं। रैली में प्रबंधन से लेकर प्रचार-प्रसार में मोटा पैसा खर्चा। सबकुछ ‘मैनेजमेंट’ के जरिये हुआ। खुद को अपने विरोधियों से दो कदम आगे दिखाने की कोशिश में प्रधानजी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं है। अपने प्रधानजी को ‘गुरु’ बना लो, काफी कुछ ऐसे ही सीखने को मिल जाएगा। इस रैली के जरिये प्रधानजी ने वह कहावत भी चरितार्थ कर दी है – हींग लगे न फिटकरी, रंग होये चौखा।

भाजपाइयों पर ग्रह चाल
काका की खाकी इन दिनों मुश्किल में है। जहां कैप्टन साहब को मुट्ठीभर लोगों ने चुनौती दी है, वहीं कैप्टन साहब भी पूरे लाव-लश्कर के साथ गोहाना में समारोह तक पहुंचे। खूब गरजे तो चुनौती देने वाले भूमिगत हो गए। अपने धर्मक्षेत्र वाले सांसद पर भी कुछ लोगों ने जय-जयकार कर हमला बोल दिया। शीशे टूटने की नौबत आई। इधर, अपने काका के नजदीकी माने जाने वाले प्रदेश के राज्यमंत्री के फोन पर भी धमकी मिली। कथित गैंग का सदस्य बताकर यह धमकी दी गई तो तीन को रातों-रात गिरफ्त में ले लिया गया। श्राद्ध में भाजपाइयों पर ग्रह चाल टेढ़ी हो गई है।

दाढ़ी वाले बाबा का बल
अपने दाढ़ी वाले कामरेड बाबा यानी अनिल विज पर इन दिनों ‘परेशानियों’ का साया मंडरा रहा है। कभी विधानसभा में विपक्ष का जोरदार हमला तो कभी काका से रार। बेगाने तो बेगाने, अपने भी ‘गुर्राने’ लगे हैं। आंखें ऐसे दिखा रहे हैं मानो बाबा को हिमालय पर्वत पर पहुंचाकर ही दम लेंगे। बाबा के पास भी ऐसा ‘मायावी ताबीज’ है कि किसी को उनके सामने टिकने नहीं देता।

बाजरा बनाम खिचड़ी
श्राद्ध के दौरान सियासी गलियारों में बाजरा छा गया है। छाये भी क्यों नहीं। सरकार ने अबकी बार इसकी सरकारी खरीद का फैसला जो किया है। भाजपा सरकार विपक्ष के निशाने पर है। आरोप है कि बाजरा की न सही खरीद हो रही, न ही भाव मिल रहा। मानसून में घनी बरसात से बाजरे की फसल कई जगह काली पड़ गई है। मंत्री दाना-दाना खरीद का दावा कर रहे हैं, जबकि किसान दोराहे पर खड़े हैं। पहले किसे बेचें, फिर पैसे कैसे मिलेंगे। सरकार अबकी बार सर्दियों में बाजरा की खिचड़ी मिड-डे-मील के रूप में स्टूडेंट को परोसने का मन बना चुकी है। बाजरे की खिचड़ी तब बनेगी, जब यह समय रहते मंडियों में बिकेगा। चूंकि उत्पादन 6.29 लाख टन होना है, ऐसे में सरकार के लिए दाना-दाना खरीदना टेढ़ी खीर होगी।
-दिनेश भारद्वाज


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