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दोस्ती की डील

Posted On October - 12 - 2018

पुष्परंजन

एस-400 मिसाइल सिस्टम

एस-400 सबसे बड़ी डील थी, जो चुपचाप हुई। 5 अक्तूबर को भारत-रूस शिखर बैठक के बाद पुतिन और मोदी की साझा प्रेस कांफ्रेस में इस सौदे की चर्चा तक नहीं हुई। पत्रकार ढूंढ़ते रहे, एमओयू में एस-400 है कहां? आधे घंटे बाद जब हार्ड काॅपी मिली तो 53वें नंबर पर एस-400 दिखा। 5 अरब 40 करोड़ डाॅलर का सौदा खुदरा खाते में यूं पड़ा दिखा, जैसे इसकी कोई अहमियत ही न हो। निश्चित रूप से ऐसा जानबूझ कर किया गया, जिससे ट्रंप प्रशासन को ताव न आए। और दूसरी-तीसरी वजह थी, इसकी क़ीमत व अनिल अंबानी को लाभ पहुंचाने को लेकर राफेल जैसा बवाल देश में न मचे।
एस-400 ट्रायंफ डिफेंस सिस्टम के छह सेट की कीमत चीन ने मात्र तीन अरब डाॅलर अदा किये। भारत पांच सेट प्राप्त करेगा और क़ीमत दोगुनी। क्यों और कैसे हुआ? इस पर न तो विपक्ष सवाल कर रहा है, न ही सरकार इस बारे में कुछ बताने की ज़रूरत समझ रही है। हमारे यहां रक्षा सौदे की कीमत को लेकर भयानक गोपनीयता बरती जाती है। चीन के हर खास और आम आदमी को पता है कि एस-400 की डील तीन अरब डाॅलर की है। इस डील को भारत की प्रतिरक्षा संकलन समिति (डिफेंस एक्वीजिशन काउंसिल) दिसंबर 2015 में हरी झंडी दिखाई तो इसकी कीमत थी 4.5 अरब डाॅलर। 23-24 दिसंबर को मास्को में बताया जाता है कि एस-400 पर समझौता हो गया। अक्तूबर 2016 में गोवा में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की उपस्थिति में एस-400 की डील पर फिर बात हुई थी। क्या इस सौदे का कोई कालक्रम है?
रूसी मीडिया पुष्टि कर रहा है कि यह सौदा 5.4 अरब डाॅलर का है, जिसमें एस-400 की पांच रेजीमेंटल सेट को 2020 तक भारत निर्यात किया जाना है। जैसा कि राफेल की कीमत के बारे में सरकार का तर्क था कि कई सारे आयुद्य अलग से लगाने की वजह से कीमतों में फर्क है। यही तर्क एस-400 के साथ फिट होना संभव नहीं है। चीन ने जिस एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली को रूस से लिया है, उसे उन्नत तकनीक से लैस न होने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। समाचार एजेंसी तास ने रूसी अधिकारी के हवाले से 3 अप्रैल, 2018 को खबर दी थी कि लेनिनग्राद के उत्सलुग पोर्ट से ‘एस-400‘ मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली की जो पहली खेप चीन के लिए रवाना की गई थी, वह उसे प्राप्त हो गई।
चीन दुनिया का पहला देश है, जिसे रूस ने एस-400 ट्रायंफ सिस्टम दिया है। चीन ने रूस से एस-400 का सौदा 2014 के आखिर में किया था। 4 साल में चीन ने एस-400 हासिल कर खुद को परमाणु हमले से अभेद कर लिया। भारत ने एस-400 आयात की बातचीत चीनी समझौते के प्रकारांतर शुरू की थी। फिर हम क्यों पीछे रह गये? यह सवाल राष्ट्र के प्रति चिंता व्यक्त करने वालों को अवश्य पूछना चाहिए। सबकी जिज्ञासा है कि इतनी छुप्पन-छुपाई के बाद अमेरिका रूस से हुए एस-400 सौदे पर प्रतिबंध लगाता है, या नहीं? इस समय ट्रंप प्रशासन में वैसे लोग एक के बाद एक करके निपट रहे हैं, जो पर्दे के पीछे से भारत की पैरोकारी करते थे। इनमें से एक नाम भारतीय मूल की अमेरिकी डिप्लोमेट निकी हेली का आता है, जिनका इस्तीफा ट्रंप ने स्वीकार कर लिया है। निकी हेली यूएन में अमेरिका की दूत थीं, वह भी नहीं चाहती थीं कि भारत पर ‘काटसा‘ जैसा प्रतिबंध लगाया जाये।
ट्रंप के सत्ता में आने के कई महीनों बाद, अमेरिकी संसद ने रूस पर प्रतिबंध लगाने के वास्ते काटसा (काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट) पारित किया था। ‘काटसा‘ के अनुच्छेद 231 के ज़रिये अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह 12 प्रकार के प्रतिबंधों में से 5 को जब चाहे लागू कर सकता है। इस आधार पर ट्रंप प्रशासन ने 2 अगस्त 2017 को रूस, ईरान और उत्तर कोरिया पर ‘काटसा‘ लगा दिया था। इससे जुड़े दो सवाल हैं। पहला, भारत ‘काटसा’ मानने को बाध्य क्यों हो? दूसरा, 2 अगस्त 2017 से पहले भारत ने रूस, ईरान से जो समझौते किये, वह क्यों रद्द किए जाएं?
ट्रंप प्रशासन ऐसा कुछ भारत के खिलाफ करता है तो सबसे अधिक ठंडक पाकिस्तान के कलेजे को पहुंचेगी, ऐसा साफ-साफ दिखता है। एस-400 सौदे से न सिर्फ अमेरिका असहज है, पाकिस्तान भी तनाव में है। पाकिस्तान को चीन मिसाइल ट्रैकिंग सिस्टम देने का वादा कर चुका है, जिससे शायद, उसकी सरहदों की थोड़ी-बहुत रक्षा हो सके। आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए मुश्किल यह है कि वह एस-400 मिसाइल पाने की हैसियत में नहीं है। पाकिस्तान बात-बात में भारत को धमकाता था कि हम भी नाभिकीय हथियार संपन्न देश हैं। 2020 के बाद पाकिस्तान की बोलती बंद हो जाएगी, जब भारत इससे लैस होगा।
पाकिस्तान इस समय रूस की निंदा करने की हालत में भी नहीं है। इस समय पाकिस्तान के प्रेक्षक अपनी ही सरकार को कोस रहे हैं कि इमरान खान सऊदी की यात्रा से पहले मास्को क्यों नहीं चले गये। इससे एक तीर से दो शिकार होने संभव थे। अमेरिका ने जिस तरह से पाकिस्तान पर दबाव बना रखा है, उसका यह जवाब हो सकता था, साथ ही भारत से चल रही प्रतिरक्षा डील में कुछ गलतफहमी की गुंजाइश पीएम इमरान खान बना आते।
वैसे, यह दिलचस्प है कि अगस्त 2017 में ‘काटसा’ प्रतिबंध के बाद से रूस ने 53 देशों से हथियार निर्यात के वास्ते समझौते किये। ‘रोसोबोरोन एक्सपोर्ट’ के डाटा बताते हैं कि 53 देशों से आर्म्स एक्सपोर्ट डील की वजह से रूस की आय में 15 अरब डाॅलर का इजाफा हुआ है। मतलब, अमेरिकी चौधराहट उन 53 देशों पर नहीं चली। ट्रंप यदि खुंदक में आकर भारत पर कोई प्रतिबंध लगाते हैं तो उस तरह का कदम खुद के पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
वैसे, भारत जैसे कुछे देशों को प्रतिबंध से बाहर रखने के लिए ‘काटसा वेवर’ प्रस्ताव को अमेरिकी कांग्रेस ने पास किया है, जिसपर राष्ट्रपति ट्रंप का हस्ताक्षर होना बाकी है। अमेरिका ‘सांप भी मरे और लाठी सलामत रहे‘ वाला उपाय नहीं ढूंढता है तो नुकसान उसी का होना है। भारत उसके लिए सोने की चिड़िया है, यह बात वहां सुरक्षा उद्योग से जुड़े लोग भी समझते हैं। ध्यान से देखें तो 2008 से लेकर 2017 तक अमेरिका सिर्फ आर्म्स डील में भारत से 15 अरब डाॅलर कमा चुका है। 2013-14 और 2015-16 में अमेरिका ने भारत से 13 सुरक्षा डील कीं, जिससे उसकी 4.4 अरब डाॅलर की कमाई हुई है।
अमेरिका धौंस जरूर देगा कि भारत, रूस से ऐसी डील रद्द करे। यह बात अमेरिका का हम प्याला-हम निवाला इस्राराइल भी समझता है कि भारत आज की तारीख में दुनिया का सबसे विशाल हथियार बाजार है। दोनों मित्र देश मिलकर भी भारतीय बाजार से रूस को उखाड़ नहीं पाये। स्टाॅकहोम स्थित इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट (सिपरी) के डाटा बताते हैं कि 2010 से 2017 तक रूस, भारत का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश रहा है। 2017 में भारत ने 68 प्रतिशत सैन्य सामान रूस से मंगाया।
ऐसा क्या हुआ कि अचानक से मोदी कूटनीति मास्को की ओर मुखातिब हो गई? क्या इस यू-टर्न के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से भी कोई निर्देश मिला है कि कूटनीति को व्हाइट हाउस की परिघि से बाहर निकालकर मल्टीपोलर कीजिए? कूटनीति में इस पैराडाइम शिफ्ट का असर क्या भाजपा की घरेलू राजनीति पर भी पड़ना है? सीआईए अब भी इस थ्योरी से इनकार नहीं करती कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने खेल किया था। चुनाव भारत में भी है तो क्या यहां भी सत्ता प्रतिष्ठान रूस को अपने प्रति सहानुभूति चाह रहा है? इन सवालों पर बहस तो होगी ही!

यहां भी अनिल अंबानी
अंडा पहले आया, या मुर्गी ? यह सवाल रक्षा सौदे के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। फ्रांस का राफेल और रूस का एस-400 ट्रायंफ सिस्टम, ये दो सौदे ऐसे हैं, जिनमें सरकारों के बीच एमएमयू पर हस्ताक्षर बाद में हुए, उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी को रख-रखाव का ठेका पहले मिला। एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के कल पुर्जे बनाने वाली रूसी कंपनी का नाम है ‘अलमाज़-ऐंटे’, जो रोसोबोरोन एक्सपोर्ट की अनुषंगी इकाई है। प्रधानमंत्री मोदी 23-24 दिसंबर 2015 को मास्को की यात्रा पर गए। उस समय मीडिया को यही बताया गया था कि प्रधानमंत्री मोदी नागरिक परमाणु सहयोग और प्रतिरक्षा सौदों पर हस्ताक्षर करेंगे। प्रधानमंत्री के साथ अनिल अंबानी भी थे। कर्ज से लदे उद्योगपति का यहां क्या काम? सरकार की ओर से यह नहीं बताया गया। 24 दिसंबर 2015 की प्रेस रिलीज में यह बताया गया कि 8 समझौते हुए हैं और दोनों देशों ने पांच अरब डाॅलर के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम पर दस्तखत किये हैं। अब सरकार ही बताये कि वह एमओयू रिलायंस डिफेंस को मिले ठेके के बारे में था या कि एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को हासिल करने के लिए। फिर 5 अक्तूबर 2018 को एस-400 पर कौन-सा समझौता हुआ? सूचनाओं का ऐसा गड़बड़झाला कि उसे कवर करने वाले पत्रकार कन्फ्यूज़ ही रहे कि कब क्या हुआ। रूस-भारत रक्षा सौदे से अलग, 24 दिसंबर 2015 को एक मीडिया रिलीज रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के लेटर हेड पर जारी किया जाता है, जिसमें बताया जाता है कि ‘अलमाज़-ऐंटे’ और रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के बीच ‘एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम‘ के रख-रखाव, रिपेयर, पार्ट्स सप्लाई, रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए छह अरब डाॅलर का करार हुआ है।

अमेरिका का डर
इस पूरी डील में जिस तकनीकी लोचे का डर है वह है अमेरिका। अगस्त 2018 के आखि़र में अमेरिका ने एक्सपोर्ट एडमिनिस्टेशन रेगुलेशंस (ईएआर) का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान की दो कंपनियों को प्रतिबंधित किया है। ये दोनों कंपनियां मिसाइल के आयात-निर्यात का कारोबार नहीं कर सकेंगी तो क्या ‘ईएआर’ का इस्तेमाल अनिल अंबानी की कंपनी पर भी होना संभव है?

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ एयर डिफेंस सिस्टम

  • रूसी एस-400 ट्रायंफ सिस्टम एक ऐसा परमाणु सुरक्षा कवच है, जो 32 जगहों से दागी मिसाइलों काे हवा में ध्वस्त कर सकता है।
  • चारों दिशाओं के लिए फिट एक यूनिट में 8 राकेट लांचर होते हैं, जो 400 किमी से दागे प्रक्षेपास्त्रों को हवा में नष्ट करते हैं।
  • इस सिस्टम से छूटे राॅकेट 27 किलोमीटर ( 88 हज़ार 582.7 फीट ) ऊंचाई तक लक्ष्य को भेद सकते हैं। एस-400 से निकलने वाले राॅकेट 4800 मीटर प्रति सेकेंड की गति से मार करते हैं। ऐसी मारक क्षमता की वजह से इसका नाम ‘एस-400‘ रखा गया है।
  • यह ‘एस-300‘ का अपडेट वर्जन है। रूस, सीरिया में एस-300 सिस्टम का सफल प्रयोग कर चुका है। रूस सीरिया को एस-300 सप्लाई भी कर रहा है।
    रूस ने सीरिया युद्ध में एस-300 का जितना सफल प्रयोग किया था, उसे  देखते हुए ‘द इकोनाॅमिस्ट‘ ने 2017 में ‘द बेस्ट एयर डिफेंस सिस्टम’ से विभूषित किया था।
  • रूस यहीं नहीं रुका है। मास्को, ‘नेक्स्ट जेनरेशन‘ प्रतिरक्षा कवच प्रणाली को तैयार करने में लगा हुआ है, जिसे ‘एस-500‘ के नाम से जाना जाएगा। एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम का ज़मीनी परीक्षण दक्षिणी रूस के अस्त्राख़ान में कापुस्तिन यार रेंज में 1999 से मई 2003 तक चलता रहा। 28 अप्रैल 2007 से ‘एस-400 ट्रायंफ सिस्टम’ रूसी सेना में शामिल किया गया। 6 अगस्त 2007 को इस सिस्टम के ज़रिये मास्को को सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।

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