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दुविधा में ‘बड़े चौधरी’

Posted On October - 12 - 2018

हरी पगड़ी वाले ‘बड़े चौधरी’ साहब इन दिनों दुविधा में हैं। ये वही चौधरी हैं, जिनके एक इशारे से हजारों की भीड़ शांत हो जाती थी। अब हालात बदले तो ऐसे कि न इशारों का असर हो रहा है और न ही कड़क और दबंग आवाज का प्रभाव दिख रहा है। एक कहावत है- ‘इंसान दुनिया की हर मुश्किल से लड़ सकता है, लेकिन घर में आकर ‘हार’ जाता है।’ इन दिनों ‘बड़े चौधरी’ के घर में ही ‘कोहराम’ है। इसलिए, अब करें तो क्या, इस पर ही मंथन चल रहा है। पुराने लोग चौधरी साहब की इस दुविधा को अच्छे से समझ सकते हैं। अब पुराने और नये ‘खून’ के जोश में अंतर होना स्वाभाविक है। ‘बड़े चौधरी’ ने अपने पोतों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके यह संकेत दिया है कि ‘दबाव’ की राजनीति में वे नहीं आएंगे। फिर नतीजे चाहे जो हों।

कुर्सी के लिए कुछ भी
‘अफसर अगर चाहे तो हथेली पर सरसों हरी कर दें’। ब्यूरोक्रेसी के बारे में यह कहावत ऐसे ही नहीं बनी है। अब गाने-बजाने के शौकीन आईएएस महोदय को ही ले लें। साहब ने मोदी की सांपला रैली के लिए ऐसा गीत लिखा कि सरकार बाग-बाग हो गई। खुद खट्टर काका ने इस गीत को सुना और रैली में बजाने की झंडी दे दी। ये वही गायक महोदय हैं, जो अकसर मंच पर रागनी और गीत गाते दिखते हैं। अब साहब की रिटायरमेंट नजदीक है, इसलिए फिर से ताजपोशी का प्रबंध तो करना ही होगा। साहब राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बैठने के सपने पाल रहे हैं। बताते हैं कि अभी तो खट्टर काका पर गीत लिखा है। ‘मोदी चालीसा’ लिखने पर काम चल रहा है। हालात ये हैं कि सुखना लेक पर भी माॅर्निंग वॉक के दौरान साहब सत्ता के बड़े चेहरों को अपने लिखे गीत सुनाने से पीछे नहीं हटते। लेकिन इन साहब की वजह से कैथल वाले ‘रॉकस्टार’ भाई खुद को असहज महसूस करने लगे हैं।

वायरल वीडियो
इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में अब कुछ भी इतिहास नहीं रहा है। पुरानी से पुरानी चीजें कभी भी ताजा हो सकती हैं। कड़क और दबंग आवाज के धनी पूर्व सीएम ओपी चौटाला के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उनका एक वीडियो इन दिनों यूट्यूब, फेसबुक व व्हाट्सएप पर वायरल है। इसमें चौधरी साहब कह रहे हैं- ‘अधिकार मांगने से नहीं मिलते, छीनने पड़ते हैं।’ गोहाना रैली में हुई हूटिंग के बाद लोग बार-बार वीडियो देख रहे हैं और चौधरी साहब के बोल को सुन रहे हैं। अब किसी की जुबान को तो कोई रोक नहीं सकता। कहने वाले कह रहे हैं कि अब दुष्यंत भी चौटाला परिवार के ही हैं। अधिकार मांगने से नहीं मिलेंगे तो वह अपने दादा के दिखाए मार्ग पर चल भी पड़ें तो इसमें गलत क्या है।

पुरानी दोस्ती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुराने दोस्तों व चाहने वालों को भूलते नहीं। सांपला रैली में उन्होंने फिर से यह बात साबित कर दी। सीएम की पीठ थपथपाते हुए वे खट्टर काका को खुला ‘आशीर्वाद’ दे गए। साथ ही, लम्बे समय तक किसान मोर्चा की बागडोर संभालने वाले राज्य के कृषि मंत्री ओपी धनखड़ को संघर्ष का पुराना साथी बताकर उनका कद बढ़ा दिया। ‘छोटे स्वामीनाथन’ तो इस घटना के बाद से काफी उत्साहित हैं। वैसे ऐसे मौकों पर अकसर उनका मन नाचने को करता है, लेकिन इस बार वे खुद को रोके हुए हैं। भाजपा प्रदेश मुख्यालय में कार्यरत कर्मचारी दीपक से गले मिलकर अपनेपन का अहसास भी मोदी ने कराया। इससे पार्टी के कई धुरंधर बेचैन भी हैं। वैसे खट्टर काका अपने ‘राजनीतिक गुरु’ यानी मोदी की राह पर चलते हुए अब काफी एक्टिव हो गए हैं।

नहले पर दहला
‘खट्टर काका’ अब सियासत के सभी खेल समझ चुके हैं। यही नहीं अब वे ‘खेल’ करने से भी पीछे नहीं हटते। अपने सरिये वाले चौधरी साहब ने सर छोटूराम के जरिये बांगर के साथ देशवाली जाट बेल्ट में भी पैठ बनाने की कोशिश क्या की, उनका दांव उन पर ही भारी पड़ गया। चौ. छोटूराम के नाती होने के नाते वे पीएम मोदी को सांपला बुलाने में तो कामयाब हो गए, लेकिन सरकार ने उनके साथ बड़ा ‘खेल’ कर दिया। रैली का संयोजक ही कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को बनवा दिया। स्मारक बेशक, सरकार की संपत्ति है, लेकिन इस पर छोटूराम की 64 फुट ऊंची प्रतिमा भी जींद वाले चौधरी ने लगवाई और मोदी को भी वे लेकर आए, लेकिन श्रेय ले गई सरकार। मोदी का सांपला आने का कार्यक्रम तय होते ही यह भी फाइनल हो गया था कि मोदी अब पहली नवंबर को करनाल में होने वाली रैली में नहीं आएंगे। सो, सांपला में ही गेम कर दिया गया। इसे ही कहते हैं नहले पर दहला।

हूटिंग पर नजर
आजकल नेताओं की रैलियों में भी वीडियोग्राफी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल होने लगा है। इनेलो की गोहाना रैली में भी कई ड्रोन घूम रहे थे। रैली में हुई हूटिंग के बाद ड्रोन से हुई रिकार्डिंग को बार-बार देखा जा रहा है। इससे भीड़ का भी अंदाजा लगाया जा रहा है और यह भी समझा जा रहा है कि रैली में हूटिंग कहां-कहां से हो रही थी। युवा तो युवा, महिलाओं द्वारा हूटिंग करना पार्टी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। बड़े चौधरी से लेकर पार्टी के कर्ता-धर्ता इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि यह हुआ तो हुआ कैसे।

अम्मू की वापसी
पद्मावत फिल्म को लेकर हंगामा करने वाले भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता सूरजपाल अम्मू की ‘घर वापसी’ हो गई है। करीब 10 माह के बाद उनके इस्तीफे को पार्टी ने नामंजूर कर दिया। यही नहीं, अम्मू की दिल्ली में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बात हुई। फिल्म रिलीज के दौरान सीएम से लेकर पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां करने वाले अम्मू अब पार्टी के लिए काफी अहम हो चले हैं। अब कहने वाले कह रहे हैं कि राजस्थान में राजपूत समाज के वोट बैंक को देखते हुए भाजपा अम्मू जैसे ‘कद्दावर’ और ‘बड़े चेहरे’ को वहां भी आगे कर सकती है। चर्चा तो यह भी है कि भाजपा के सभी प्रवक्ताओं का ‘चीफ’ भी उन्हें बनाया जा सकता है। अब इतना बड़ा बलिदान करने वाले अम्मू के लिए इतना-सा काम तो करना भी चाहिए। सैनी साहब आप भी तैयार रहें।

आखिर में ग्रहचाल
चुनावी वर्ष में खट्टर काका किसी भी कोने से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। बात चाहे घोषणा करने की हो या फिर ‘ग्रहचाल’ की वे चारों तरफ शांति चाहते हैं। अब काका की धार्मिक यात्राओं को कोई कुंडली और ग्रहचाल से जोड़कर देख भी ले तो इसमें गलत भी क्या है। वैष्णों देवी के दर्शनों के बाद बद्रीनाथ पर मत्था टेक कर काका ने अपने धार्मिक होने का प्रमाण दे दिया है। वे कुरुक्षेत्र में 48 कोस की परिक्रमा भी करने में जुटे हैं। एक बड़े पंडित ने कहा, अगर बिना बताए या सुझाए भी धार्मिक यात्राएं की जाएं तो उनका भी थोड़ा-बहुत फायदा मिलता है।

-दिनेश भारद्वाज


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