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‘चौधरी’ को चुनौती

Posted On October - 18 - 2018

जिन कानों को ऊंची तो क्या, जरा सी तेज आवाज भी रास नहीं आती थी। आज वही कान पूरे जमाने की सुन रहे हैं। हम बात कर रहे हैं इनेलो सुप्रीमो और बड़े चौधरी ओमप्रकाश चौटाला की। दूसरे के घरों के झगड़े निपटाने में ‘पंचायती’ होना अलग बात है, लेकिन असल परीक्षा तो तब होती है, जब अपने ही घर के बर्तन आपस में बज रहे हों। इस पारिवारिक झगड़े का क्या होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि चौधरी ने पिछले दो सप्ताह में
वह कुछ सुन लिया, जिसका 10 प्रतिशत सुनना भी उनकी आदत नहीं रही। वैसे कहने और सुनाने वाले भी गैर नहीं हैं। वे अगर चौधरी को कोई बात कह रहे हैं तो इसमें भी पार्टी और परिवार की भलाई होगी। अब यह तो चौधरी को ही तय करना है कि उनके लिए सर्वोपरि क्या है।
स्वामीनाथन की ड्यूटी
बादली वाले ‘छोटे स्वामीनाथन’ इन दिनों आपे से बाहर हैं। हो भी क्याें ना, इन दिनों साहब की पूरी हवा है। सांपला की रैली में पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना पुराना संघर्ष का साथी जो कह दिया। इससे कई भाजपाइयों की हालत टाइट है। वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। अब इन बातों से कुछ होता होगा, हमें तो यह नहीं लगता। फिर भी कुछ भाई लोगों को खुश होने तो कुछ को कोप भवन में जाने का मौका मिल गया है। रही-सही कसर अपने खट्टर काका ने पूरी कर दी। सरकार की वर्षगांठ के मौके पर सभी 22 जिलों में रैलियां करने का ऐलान सरकार ने किया है। इन रैलियों का संयोजक ‘छोटे स्वामीनाथन’ को बनाया गया है। अब ‘छोटे स्वामीनाथन’ खुश तो हो सकते हैं, लेकिन उनके सामने चुनौती भी है। यही नहीं, 31 अक्तूबर को ‘स्टेच्यु ऑफ यूनिटी’ के उद्घाटन पर गुजरात में समर्थकों को लेकर जाने की तैयारी भी वे कर रहे हैं। सरकार ने तो उन्हें रैलियों का संयोजक बनाकर अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया है। अब भीड़ जुटी तो सरकार की बल्ले-बल्ले और कुछ कमी रह गई तो जिम्मेदारी छोटे स्वामीनाथन की।
बदलते मिजाज
इंडियन नेशनल लोकदल के वोट बैंक को परंपरागत और स्थायी माना जाता है। धारणा रही है कि इनेलो अकेला ऐसा सियासी दल है, जो प्रदेश के किसी भी हिस्से में हजारों लोगों को एक आवाज पर जुटा सकता है। लेकिन समय बदल रहा है, साथ ही बदल रहा है लोगों का मिजाज। अब पिछले दिनों जींद में हुई इनेलो की बैठक के एक किस्से को ही लें। पार्टी सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला बैठक में मौजूद थे। तभी चौधरी के पुराने साथी सुनहरा सिंह ने दो-टूक कह दिया, मेरे घर में सात वोट हैं। मेरा वोट तो आपको मिलेगा, बाकी छह वोट दुष्यंत के हैं। जब चौधरी ने रूठों को मनाने की बात कही तो एक पुराने साथी ने कह दिया वर्करों को तो बाद में भी मना लेंगे, पहले अपने घर के झगड़े को निपटा लें। अब वर्करों के ये बदले मिजाज कुछ तो नया होने की ओर संकेत कर रहे हैं।
सैनी का कैप्सूल
भाजपा को करीब-करीब अलविदा कह चुके कुरुक्षेत्र वाले सांसद राजकुमार सैनी के समर्थकों ने प्रचार का एक और नया तरीका निकाला है। लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी बना चुके सैनी समर्थकों ने भी दूसरे दलों की तरह सोशल मीडिया को प्रचार का माध्यम बनाया है। लाल और हरे रंग का एक कैप्सूल सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है। इस पर लिखा है, यह कैप्सूल कड़वा है, मगर 70 साल की बीमारियों को जड़ से दूर कर रहा है। जनहित में जारी इस कैप्सूल पर राजकुमार सैनी का नाम लिखा है। अब कहने वालों को कोई रोक नहीं सकता। एक साथी ने कटाक्ष करते हुए कहा, कैप्सूल तो सही है, लेकिन बिना एंटी-बायोटिक के काम नहीं चलने वाला।
लालाजी की सीडी
ये सीडी भी बड़ी जालिम है। कई बेहद ही ‘ईमानदार’ और ‘चरित्रवान’ लोगों की नौकरी खा चुकी है। अब अपने नारनौल वाले लालाजी को ही ले लो। ‘बेचारे’ बड़ी ‘साजिश’ का शिकार हो गए। वैसे लालाजी को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। इस सीडी के मारे उनके जैसे और भी कई हैं। ऐसे शोषित, प्रभावित और उत्पीड़न के शिकार कई भाई लोग ‘सीडी’ का नाम आते ही डर जाते हैं। कइयों का तो मंत्री पद तक सीडी ले चुकी है। अब तो नेता चाहे सत्तासीन हों या फिर सत्ता से बाहर वाले, सभी की एक ही डिमांड है – सीडी सिस्टम को बंद किया जाए, पुराने वाले वीडियो प्लेयर ही सही थे। इसमें कम से कम इतनी जल्दी सीडी बनने का डर तो नहीं था। वैसे भाई लोगों की इस डिमांड बारे सरकार को सोचना चाहिए!
मंदिरों में दुष्यंत
दादा के ‘प्रकोप’ को झेल रहे हिसार सांसद दुष्यंत चौटाला धार्मिक आचार-विचार वाले हैं। पहले नयी दिल्ली में वर्करों की बैठक ली| इसके बाद हिसार, भिवानी और महेंद्रगढ़ में पिता अजय चौटाला के समर्थकों से मुलाकात की। भिवानी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर के अलावा हिसार के मंदिर में भी दुष्यंत ने माथा टेका। इस घटना के बाद वे राजस्थान स्थित सालासार बालाजी धाम भी पूजा-अर्चना को गए। बताते हैं कि दुष्यंत की मां नैना चौटाला भी दक्षिण भारत में पूजा-अर्चना के लिए गई हुई हैं। अब पूजा-अर्चना का कितना फायदा होगा, यह तो कह नहीं सकते, लेकिन इतना जरूर है कि ये धार्मिक विचार जरूर चर्चाओं में आ गए हैं।
काका के तेवर
खट्टर काका इन दिनों कड़े तेवर अपनाए हुए हैं। अब वे किसी के दबाव में आने वाले नहीं हैं। रोडवेज कर्मचारियों ने भी जब काका की बातों को नहीं माना तो सीधे एक्शन मोड में आ गए। एक साथ सैकड़ों को बाहर का रास्ता दिखा गया। किराये पर प्राइवेट बस चलाने के फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। आमतौर पर चुनावी वर्ष में सरकार कर्मचारियों ही नहीं समाज के हर वर्ग को खुश करने की कोशिश में रहती है। मगर अपने काका हैं कि उन्हें वर्ग विशेष से ज्यादा अपने फैसले की चिंता है। लाखों लोगों को ट्रांसपोर्ट सेवाओं के लिए एक बार फैसला लिया तो अब उस पर अडिग हैं। वैसे काका का यह स्टाइल पसंद भी किया जा रहा है। अब विरोध करने वाले तो हर जगह हैं।

-दिनेश भारद्वाज


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