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चुनावी साल की चुनौतियां

Posted On October - 25 - 2018

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को 4 साल पूरे हो गए हैं। इन 4 वर्षाें में सरकार ने कई सराहनीय काम किए तो कुछ फैसलों को लेकर विवादों में भी रही। बरवाला में बवाल, जाट आंदोलन, पंचकूला में डेरा समर्थकों की हिंसा ने प्रदेश को हिलाकर रख दिया। सरकार ने भर्ती में इंटरव्यू सिस्टम खत्म करने, पंचायतीराज संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों के लिए शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने, शिक्षकों की ऑनलाइन तबादला नीति बनाने जैसे साहसिक कदम भी उठाए, जो सफल रहे। सरकार के कार्यकाल का अब एक साल बचा है । इस आखिरी साल में उसके सामने अपने चुनावी वादों को पूरा करने के साथ-साथ अन्य सियासी चुनौतियां भी हैं, जिससे उसे पार पाना होगा।
दिनेश भारद्वाज की रिपोर्ट…
26 अक्तूबर। आम और खास के लिए बेशक, यह केवल एक तारीख है, लेकिन हरियाणा की भाजपा सरकार के लिए यह ऐतिहासिक दिन है। हो भी क्यों नहीं! ठीक 4 साल पहले यानी 2014 में इसी दिन हरियाणा में पहली बार भाजपा ने पूर्ण बहुमत से अपनी सरकार बनाई थी। अतीत में भी भाजपा ने सत्ता का स्वाद कई बार चखा, कभी इनेलो के साथ गठबंधन करके तो कभी बंसीलाल के नेतृत्व वाली हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) की बैसाखियां बन कर।
पहली बार खुद के 47 विधायकों के बूते चंडीगढ़ से सत्ता चला रही भाजपा चुनावी वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। अगला एक वर्ष भाजपा के मौजूदा कार्यकाल का आखिरी वर्ष होने के साथ-साथ पार्टी और सरकार के लिए चुनौतियों भरा भी है। प्रदेश की शीर्ष कुर्सी संभाल रहे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तमाम मुश्किलों, परेशानियों, रुकावटों, अपनों-परायों की नाराजगी और कई छोटे-बड़े आंदोलनों एवं हिंसा के बीच अपने कार्यकाल के 4 वर्ष पूरे करने में सफल रहे हैं। सत्ता के शुरुआती एक वर्ष बाद ही उनके नेतृत्व पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। विपक्षी दल तो क्या उनकी ही पार्टी के मंत्री और विधायकों ने किनारा करना शुरू कर दिया था। उन्हें बदलवाने की तमाम कोशिशें भी हुईं और इस तरह की चर्चाओं ने उनका पीछा भी नहीं छोड़ा। कहते हैं न, वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। खट्टर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आज हालात पूरी तरह से उनके पक्ष में हैं। बेशक, अंदरखाने कई मंत्रियों और विधायकों के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं एवं पुराने वर्करों की आंखों में वे आज भी खटकते हैं, लेकिन अब यह बात सभी अच्छे से समझ चुके हैं कि मुख्यमंत्री का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। वहीं, उनके अब तक के कार्यकाल में हुए ‘बदलाव’ पर खुद पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह से अपनी मुहर लगा चुका है।
सरकार के पहले वर्ष की बात करें तो यह मौजूदा सरकार के लिए ‘हनीमून’ कम, ‘ट्रेनिंग’ पीरियड अधिक रहा। इसी तरह से दूसरा वर्ष सरकार, सिस्टम, अधिकारियों और व्यवस्था को समझने में गुजर गया। तीसरे साल में सरकार ने प्लानिंग शुरू की और चौथे वर्ष में अपनी योजनाओं को सिरे चढ़ाने की कोशिश हुई। अब पांचवां और आखिरी वर्ष पूर तरह से चुनौतियों भरा होगा। बेशक, मौजूदा सरकार चुनौतियों का सामना पहले ही वर्ष से करती आ रही है।
शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद यानी 2014 के आखिर में सतलोक आश्रम, बरवाला (हिसार) के तथाकथित संत रामपाल की गिरफ्तारी ने सरकार को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। इस मामले में सरकार की खूब किरकिरी हुई। इसके बाद, हालात को जैसे-तैसे पटरी पर लाया गया तो फरवरी-2016 में जाट आरक्षण आंदोलन शुरू हो गया। आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, लूटपाट और आगजनी की वारदातों ने सरकार की मुश्किलें पूरी तरह से बढ़ाने का काम किया।
पिछले वर्ष यानी सरकार के चौथे वर्ष के कार्यकाल के दौरान अगस्त माह में पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की सीबीआई की विशेष कोर्ट में पेशी के दौरान हुई हिंसा भी किसी बड़ी विफलता से कम नहीं रही। सरकार भले ही राम रहीम को कोर्ट तक पहुंचाने के लिए खुद की पीठ थपथपाती रही, लेकिन पंचकूला में लगे लाशों के ढेर का हिसाब अभी बाकी है। इन 4 वर्षों में शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता होगा, जब प्रदेश में आर्मी और पैरा-मिलिट्री फोर्स न आई हो।
दर्जनों बार तो प्रदेश में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं। जाट आरक्षण आंदोलनकारियों ने तो पहले ही दिन से सरकार की नाक में दम करके रखा। जाट और गैर-जाट जैसे मुद्दे भी प्रदेश की सियासत में छाये रहे।
जहां प्रदेश के खिलाड़ियों ने राज्य का नाम दुनियाभर में रोशन करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीं प्रदेश में बेटियों के साथ रेप और गैंगरेप के मामलों से राज्य की बदनामी भी कम नहीं हुई। अपराध की बढ़ती दर को रोकने के लिए दावे तो खूब हुए, लेकिन क्राइम पर ठीक से कंट्रोल नहीं हो सका। शायद, यही कारण रहे होंगे कि सरकार पर अभी तक भी यह आरोप लग रहे हैं कि वह अफसरशाही को कंट्रोल करने में नाकाम रही।
बहरहाल, अब मनोहर सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल के आखिरी पड़ाव में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में अब चुनौतियों का सामना तो करना ही होगा, साथ ही आगामी चुनावों में फिर से सत्ता वापसी की रणनीति भी तय करनी होगी। इसलिए, संभव है कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह मौजूदा सरकार भी अपने आखिरी साल में घोषणाओं की झड़ी लगाए। अपने उन वादों को भी पूरा करने की कोशिश करे, जो पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किए थे।
सियासी चैलेंज
अंदर का संग्राम
बेशक, पीएम मोदी का समर्थन और आशीर्वाद खट्टर के साथ है, लेकिन पार्टी के अंदर के संग्राम से उन्हें खुद ही निपटना होगा। मंत्रियों, सांसदों व विधायकों के बीच अंदरूनी कलह से निपटना होगा। सरकार की कार्यशैली से नाराज चल रहे पदाधिकारियों व वर्करों को अगर आखिरी वर्ष में भी खुश नहीं किया गया तो यह चुनाव में परेशानी का सबब बन सकता है।
गठबंधन
प्रदेश में इनेलो और बसपा का गठबंधन होने के बाद भी राजनीतिक हालात बदले हैं। इनेलो को वर्ग विशेष की पार्टी माना जाता है और मायावती दलित वोटों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में इनका यही समीकरण चुनाव में भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है। बेशक, चौटाला परिवार में उभरे मतभेदों का पटाक्षेप होने के बाद हालात और बदलेंगे, लेकिन मौजूदा हालात भाजपा के लिए सही नहीं कहे जा सकते।
कांग्रेस इफेक्ट
बेशक, कांग्रेसियों के बीच आपस में टकराव चल रहा है, लेकिन कांग्रेस को कमजोर नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा भले ही अपने पत्ते अभी तक नहीं खोले गए हैं, लेकिन लगातार 10 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस की रणनीति को भी भाजपा को बारीकी से समझना होगा। पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा की जनक्रांति रथयात्राओं के अलावा पार्टी के दूसरे नेताओं अशोक तंवर, किरण चौधरी व रणदीप सुरजेवाला की सभाओं में जुट रही भीड़ को नज़रअंदाज करना भाजपा के लिए महंगा पड़ सकता है।
आप कनेक्शन
इधर, दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की हरियाणा में बढ़ी सक्रियता पर भी भाजपा को नजर रखनी होगी। दिल्ली के स्कूलों एवं अस्पतालों के सुधार को कहीं आप हरियाणा में अपना हथियार न बना ले। दिल्ली में बिजली-पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में केजरीवाल द्वारा किए गए कार्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। केजरीवाल धीरे-धीरे हरियाणा में पैठ बना रहे हैं।
इन पर रखनी होगी नजर
कर्मचारी
यह ऐसा तबका है, जो सरकारें गिराता भी है और बनाता भी। आज यही कर्मचारी सड़कों पर हैं। रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल को अधिकांश विभागों व बोर्ड-निगमों के कर्मचारियों का समर्थन मिला। ऐसे में 3 लाख से अधिक कर्मियों की नाराजगी भारी पड़ सकती है।
युवा
2014 के चुनावों में युवाओं ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया था। वोट बैंक के लिहाज से युवा सत्ता का फैसला करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बेरोजगारी की वजह से युवाओं में नाराजगी है। उनके गुस्से से पार पाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी। नोटबंदी और जीएसटी की वजह से निजी सेक्टर में रोजगार कम हुए हैं। ऐसे में अब युवाओं की नाराजगी से निपटना खट्टर के लिए बड़ी चुनौती है।
ब्यूरोक्रेसी
भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्रित्व काल में भी अफसरशाही के हावी होने के आरोप सरकार पर लगते रहे, लेकिन मौजूदा मनोहर सरकार में ये आरोप कुछ ज्यादा ही खुलकर सामने आ रहे हैं। ब्यूरोक्रेसी में भी गुटबाजी है और आईएएस बनाम आईपीएस का विवाद भी छोटा नहीं है। खट्टर सरकार में जिस तरह से आईपीएस लॉबी को हवा दी गई है, वह भी आईएएस अधिकारियों में सरकार के प्रति नाराजगी का बड़ा कारण है। सीएम को इससे निपटना होगा।
एससी-बीसी
अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक प्रदेश की सियासत में अहम भूमिका निभाता है। अधिकांश राजनीतिक दलों की नज़रें इस वोट बैंक पर रहती हैं। बेशक, सरकारों में इन दोनों ही वर्गों के लिए योजनाएं बनती हैं, लेकिन पिछड़ा वर्ग को नौकरियों में पूरा आरक्षण और दलितों के बैकलॉग का मुद्दा आज भी खत्म नहीं हो पाया है। इन दोनों वर्गों को खुश किए बिना भी बात बनने वाली नहीं है।
जाट फैक्टर
प्रदेश के सबसे बड़े जाट वोट बैंक को रिझाने की तमाम कोशिश सरकार कर रही है, लेकिन जाटों का गुस्सा खत्म नहीं हो रहा। आरक्षण पर जाट लामबंद हैं। चौधरी सर छोटूराम की गढ़ी सांपला में प्रतिमा अनावरण के मौके पर खुद पीएम नरेंद्र मोदी किसानों व जाटों को रिझाने की कोशिश कर चुके हैं।
विवाद भी
विवादों में चयन आयोग
खट्टर सरकार ने सत्ता में आते ही हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग को भंग करके इसका नये सिरे से गठन किया। आयोग चेयरमैन भारत भूषण भारती सहित कई सदस्यों की नियुक्ति पर सवाल उठे। पुलिस भर्ती की तो आयोग विवादों में आ गया। इसके बाद प्रश्नपत्र में ब्राह्मणों व उनकी बेटियों पर अभद्र टिप्पणी का मामला उठा। जांच हुई, लेकिन चेयरमैन को क्लीन-चिट मिल गई। आयोग में नौकरियों के बदले पैसे लेने के आरोप भी लगे।
जांच पर यूटर्न
सीएम ने खुद विधानसभा में ऐलान किया कि रोहतक और सोनीपत के तथाकथित भूमि घोटालों की सीबीआई से जांच कराई जाएगी। रोहतक का तथाकथित भूमि घोटाला उदार गगन से जुड़ा था, जो भाजपा समर्थित राज्यसभा सांसद के पारिवारिक सदस्य की कंपनी है। खुद के फैसले पर यूटर्न लिया और सीबीआई जांच की बजाय एक रिटायर जस्टिस को जांच का जिम्मा सौंप दिया गया। सोनीपत के मामले की जांच पर तो बात ही नहीं हो रही।
सीएमओ में बदलाव
सत्ता में आते ही सीएमओ में भाजपा और स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों की धड़ाधड़ ताजपोशी हुई। इसके बाद एक-एक करके इन्हें सीएमओ से बाहर भी कर दिया गया। मौजूदा सरकार ने इस मामले में रिकार्ड कायम किया है। ओएसडी से लेकर प्रधान सचिव तक बदले गए।
पुलिस में प्रयोग
कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने का जिम्मा पुलिस का है। सरकार ने पुलिस विभाग को ही प्रयोगशाला बना डाला। सबसे पहले श्रीनिवास वशिष्ठ को डीजीपी पद से हटाया गया। इसके बाद संघ पृष्ठभूमि के यशपाल सिंघल को पुलिस की कमान सौंपी गई। जाट हिंसा के बाद उन्हें भी रुख्सत कर दिया गया। डॉ. केपी सिंह को डीजीपी बनाया तो वे भी सरकार को रास नहीं आए। उनकी जगह बीएस संधू को कमान दी गई। ऐसे ही बदलाव टॉप लेवल पर ही नहीं, बल्कि जिलों में भी खूब हुए हैं।
नहर पर रार
हाईकोर्ट ने जब मार्केट रेट के हिसाब से भूमि का मुआवजा तय किया तो सरकार ने दादुपुर-नलवी नहर परियोजना को डि-नोटिफाई कर दिया। इस पर अब तक विवाद है। न तो किसानों ने जमीन वापस ली है और न ही किसानों को मुआवजा मिला है। हालात जस के तस हैं। बड़ी कानूनी पेचिदगियां हैं, लेकिन सरकार अपने फैसले पर कायम है।
वादे जो वफा न हुए
0 अतिथि अध्यापकों को नियमित करने का वादा किया था, लेकिन अब कानूनी पेचिदगियां बताकर इसे टरकाया जा रहा है।
0 कर्मियों को पंजाब के समान वेतनमान-भत्ते देने का वादा किया था। अब तक पूरा नहीं हुआ है।
0 गांवों में 24 घंटे बिजली देने का वादा था। अब ‘म्हारा गांव-जगमग गांव’ योजना की शर्तों को पूरा करने वाले गांवों को ही 24 घंटे बिजली मिल रही है।
0 विधवा व बेघर महिलाओं को 50 वर्गगज का प्लाट और निर्माण के लिए एक लाख रुपये देने थे। आज तक कोई योजना नहीं बनी हैै।
0 सफाई कर्मियों को 15 हजार रुपये न्यूनतम वेतनमान और महिला सफाई कर्मियों को नियमित करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ।
0 कर्मियों के बच्चों का शिक्षा भत्ता दोगुना करने और मकान भत्ता बढ़ाने का वादा भी अधर में है। एचआरए पर बनी कमेटी का फैसला नहीं आया।
0 सरकार की जमीन पर बने निजी अस्पतालों में 25 प्रतिशत मरीजों के फ्री इलाज पर कोई कदम नहीं उठाया गया।
0 उद्योगों में हरियाणा के युवाओं के लिए 25 प्रतिशत रोजगार सुनिश्चित करने की नीति भी सरकार नहीं बना पाई है।
0 10वीं और 12वीं के प्रतिभावान विद्यार्थियाें को लेपटॉप देने का वादा अधूरा है।
0 एम्स की तर्ज पर प्रदेश में दो बड़े मेडिकल संस्थान बनाने का वादा भी अभी हवा है।
0 पंचकूला या अम्बाला में गुरु गोबिंद सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी बनाने का वादा अभी सपना ही बना हुआ है।
0 दक्षिण या मध्य हरियाणा में हाईकोर्ट की खंड स्थापित करने के अपने वादे को भी भाजपा पूरा नहीं कर पाई।

1
सरकार ने तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में इंटरव्यू सिस्टम को खत्म किया । इन पदों के लिए 90 अंकों की लिखित परीक्षा और 10 अंक अनुभव व सामाजिक-आर्थिक मानदंडों के लिए तय किए गए। इनमें 5 अंक ऐसे उम्मीदवारों को, जिनके घर में कोई भी सरकारी रोजगार नहीं है। विधवा और विमुक्त जाति से संबंधित उम्मीदवारों को भी 5 अंक का प्रावधान किया।
2
हरियाणा पहला ऐसा राज्य बना, जहां पंचायती राज संस्थाएं ही नहीं, शहरी स्थानीय निकायों में भी पढ़े-लिखे जनप्रतिनिधि चुनकर आए। चुनावों के लिए शैक्षणिक योगयता तय करने का बोल्ड फैसला लिया गया। बेशक, विवाद सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचा, लेकिन जीत सरकार की ही हुई। पंचायतों को कई ऐसे चेहरे मिले, जो विदेशों से पढ़कर आए हैं। इनसे बदलाव भी आया।
3
शिक्षकों के तबादलों की सबसे अधिक मारामारी सरकारों में हुआ करती थी। सत्ता के शुरुआती दिनों में ही शिक्षकों के ऑनलाइन ट्रांसफर करने का निर्णय ऐतिहासिक साबित हुआ। उत्तर प्रदेश, पंजाब सहित कई राज्यों ने अपने यहां इस फैसले को लागू किया। सभी विभागों में 500 से अधिक काडर के पदों के ऑनलाइन तबादले की भी शुरुआत की। इससे बड़ा ‘खेल’ रुका है।
4
हरियाणा देश का पहला ऐसा राज्य है, जो पूरी तरह से कैरोसिन फ्री है। अप्रैल-2017 के बाद से केंद्र की ओर से प्रदेश में कैरोसिन की सप्लाई नहीं की गई है। कैरोसिन लेने वाले परिवारों को अब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिए गए हैं। 5 लाख 15 हजार 706 परिवारों को गैस कनेक्शन दिए जा चुके हैं।

5
हरियाणा को हरि की भूमि कहा जाता है, लेकिन गर्भ में बेटियों की हत्या के मामले में यह काफी आगे था। समाज की सोच में आए बदलाव के साथ ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के परिणाम सामने आए हैं। 3 दशकों बाद यहां लिंगानुपात सुधरा है। अब 1000 लड़कों पर 922 बेटियां हैं। 2001 में यह आंकड़ा 819 और 2011 में 830 था।


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