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इन 10 रावणों को कहिए ‘ना’

Posted On October - 18 - 2018

आलोक पुराणिक
अद्भुत मुल्क है, अभी एक नजारा देखा। गणेशजी पीपल के पेड़ के नीचे उदास बैठे हुए थे, कोई भक्त छोड़ गया था। गणेशोत्सव के दौरान पूजा की गणेशजी की, फिर भक्त को आलस आ गया, कौन जाये विसर्जित करने, यहीं पीपल के पेड़ के नीचे छोड़ दो। गणेशजी अकेले पड़े हैं पीपल के पेड़ के नीचे। पीपल है, गणेश हैं, भक्त गायब हैं। भक्त वैसे सब तरफ गायब से ही होते जा रहे हैं। दशहरा के नाम की भी सेल है और दीवाली के नाम पर भी सेल है। अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां बता रही हैं कि इन दिनों की सेल में इस बार पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी बिक्री हुई है। पब्लिक खरीदे जा रही है। खरीदे ही जा रही है। एक के साथ एक फ्री, एक के साथ फ्री का सबसे क्लासिक उदाहरण वैसे रावण है, एक के साथ नौ फ्री आते थे। एक के साथ नौ फ्री जैसे साहसिक ऑफर तो आज भी कोई नहीं देता। वैसे आज के दौर में जिन रावणों से पार पाने की जरूरत है, वे इस प्रकार हैं-
भ्रष्टाचार
रावण के पहले क्या था-भ्रष्टाचार, रावण के बाद क्या रहा- भ्रष्टाचार। गौर से देखें, तो पूरी दुनिया ही एक भ्रष्टाचार की उपज लगती है। परमात्मा के दफ्तर से आदेश आया कि सेब खाने की मनाही है। आदम ने सेब खा लिया, इस करप्शन की सजा उसे स्वर्ग निकाला के तौर पर मिली। आदम नीचे गिरे तो दुनिया बनी। फिर रावण, विभीषण और कुंभकर्ण भी बने। रावण तो इस तरह से बने कि हर साल बन ही रहे हैं। रावण बनाना-फूंकना महंगा हो गया है। नौकरी पेशा वाले के चंदे से तो रावण के दो सिर ही बन सकते हैं। दो नंबर की कमाई वाले दस क्या बीस सिर बना देते हैं। मेरे मुहल्ले के लाला सट्टोमल कमरे में जुआ खिलाते हैं, नोट कमाते हैं और रामलीला का चंदा जमकर देते हैं, रामलीला में मुख्य अतिथि लोकल थानाध्यक्ष होते हैं। भ्रष्टाचार का रावण पुलिस और कारोबारियों तक ही सीमित नहीं है। यह हर दफ्तर, बड़े संस्थान में बैठा है। हम इसे चाहते हैं, इसलिए यह दिन-ब-दिन बड़ा होता जाता है, रावण की तरह। अब जरूरत है इसका दहन करने की।
बेरोजगारी
बेरोजगारी समस्या नहीं है, इस मुल्क में। रोजगार हरेक को है इस मुल्क में। एमटेक बंदा दस हजार की नौकरी के लिए काल सेंटर में काम कर रहा है। बीटेक बंदा दस हजार की क्लर्की करने को तैयार है। देश में इंजीनियरिंग की डिग्री का हाल कुछ यूं हो गया है कि बंदा बताते हुए शरमाता है। यहां रोजगार के वादों पर सरकारें बनती हैं, लेकिन रोजगार नहीं आते। इसका हल निकलना चाहिए, हालांकि निकलना आसान नहीं है। लेकिन एक कोशिश तो की जा सकती है।
महंगा इलाज और अस्पताल
देश में सरकारी अस्पताल बदहाल हैं। जहां सौ का इलाज हो सकता है, वहां हजार घुसे पड़े हैं। निजी अस्पताल इस कदर लुटेरे हैं कि पुरुष अपना ब्लड प्रेशर चेक कराने जाये तो उसके सारे टेस्ट कर डालें, प्राॅफिट के टारगेट जो पूरे करने हैं। बंदा सरकारी अस्पताल की बदहाली में मरे या फिर निजी अस्पताल के बिल देखकर मरे, इतनी चाॅइस अब इस देश में हो गयी है। सरकार गरीबों के इलाज के लिए ‘आयुष्मान’ भारत योजना लेकर आई है। इसमें हर परिवार को 5 लाख का मेडिकल बीमा मिलेगा। अब इसमें यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पहले तो सभी जरूरतमंद इस योजना में शामिल ही हो जाएं और अगर शामिल भी हो गए उन्हें इलाज समय पर मिले।
महंगाई
मध्य पूर्व के देशों में मारधाड़ होती है, कच्चे तेल के भाव बढ़ते हैं। भावों के तीर वहां चलते हैं, धराशायी यहां होते हैं लोग। कच्चे तेल के भाव बढ़ना यानी यहां महंगाई बढ़ना है। यहां महंगाई बढ़ना यानी टमाटर, आलू, भिंडी के भाव बढ़ना। कच्चे तेल के भाव बढ़ने की तुलना तो ऐसे रावण से की जा सकती है, जो सौ मुंह वाला है। एक के साथ 99 आइटमों के भाव बढ़ जाते हैं। इस रावण को मारना जरूरी है। सबको और ज्यादा कारें चाहिए और बड़ी कारें चाहिए। बिजली से वाहन चलेंगे, ऐसी कल्पना है अभी। पर भारत में हर कल्पना विद्रूप हो जाती है। बिजली से कार चलाने के लिए बिजली की जरूरत होती है। बिजली यूं कागजों पर चौबीस घंटे आती है। सिर्फ बिजली पर भारत में कारें चलीं, तो इसका एक फायदा यह होगा कि चलेंगी ही नहीं। पर्यावरण मित्र होंगी, बिजली की कारें क्योंकि चल ही ना पाएंगी।
जाम
हरेक को कार ही नहीं, कई कारें चाहिए। और बड़ी कारें चाहिए। कारें बड़ी हो रही हैं। सड़कें छोटी हो रही हैं। मारधाड़ जगह को लेकर हो रही है। मैं अपने घर के सामने सूई की नोंक के बराबर भी जगह तुझे पार्किंग के लिए नहीं दूंगा। इस युद्ध घोष के साथ तमाम भवनों में मारधाड़ होने लगती है इन दिनों। जाम इतने लंबे-लंबे लग रहे हैं इन दिनों कि पुराने वक्तों में अगर इतने जाम लगते तो कई युद्ध होने से बच जाते। जीटी रोड पर बाबर की सेना जाम में फंसी रह जाती और राणा सांगा अपनी रणनीति बनाकर बाबर को वापस ढकेल देता। भारत का इतिहास कुछ और होता अगर पानीपत के पास ढंग के जाम लगे होते, कई शताब्दियों पहले। पानीपत के तीन युद्धों ने भारत का इतिहास बदला है। ये इतिहास कुछ और होता, अगर वहां ट्रैफिक जाम लगा होता। पर अब ट्रैफिक जामों के चलते पानीपत जैसा सीन लगभग हर महानगर में दिख रहा है। सड़कों पर वाहनों की रेलमपेल है। पहले से ज्यादा पुल बन गए हैं, पर वाहन हैं कि काबू नहीं आते। अब जरूरत है जाम के रावण के दहन की।
पराली प्रदूषण
पंजाब और हरियाणा की तरफ से पराली जलने का धुआं जब धावा बोलता है तो प्रदूषण से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सांसें रुक जाती हैं। दिल्ली का हाल आम पब्लिक सा है, जो चाहे जहां धावा बोल जाता है। हर साल का ड्रामा है। वो उससे बात करते हैं, वो उससे बात करने की बात करते हैं। वो उनसे बात कर लेते हैं और आखिर में बात यह होती है कि पराली प्रदूषण अपने चरम पर आ जाता है। पब्लिक परेशान हो जाती है। एक तरह से पराली प्रदूषण दिल्ली की पब्लिक को चाॅइस देता है इस बात की, अब चलो नये आइटम से परेशान हो लो। अब तक परेशान हो रहे थे चिकन-गुनियां और डेंगू से, अब थोड़ी परेशानी सांस लेने में उठा लो। इंडिया का आम आदमी बड़ा भोला है, वह परेशानी की वैरायटी में पुरानी परेशानी भूल जाता है। एक थानेदार मित्र हैं, परेशान थे कुछ दिन पहले उनके इलाके में चड्ढी-बनियान गैंग आ गया। लोग चेन स्नेचिंग की परेशानियां भूल गये। थानेदार मित्र ने अभी बताया कि स्थिति अब नार्मल हो गयी है सिर्फ चेन स्नेचिंग हो रही है। चड्डी-बनियान गैंग उन राज्यों में चला गया है, जहां नवंबर में चुनाव होने हैं। बड़े गैंग और छोटे गैंग साथ-साथ ऑपरेट कर लेंगे। यही हाल प्रदूषण का है। जब अक्तूबर में आसमान पर धुआं छाता है तो सरकारों को प्रदूषण याद आता है। ये रोक दिया जाता है, वह रोक दिया जाता है। गाड़ियां भी ईवन और ऑड हो जाती हैं। जरूरत है इस पर समय से चेतने की और कड़ाई से नियम लागू करने की।
ट्यूशन और कोचिंग
हमारे देश में ट्यूशन और कोचिंग एक फैशन बन गया है। इसके बिना लगता ही नहीं कि बच्चा पढ़ रहा है। कक्षा पांच में ट्यूशन, फिर कक्षा दस में सघन ट्यूशन, फिर कक्षा 12वीं में युद्ध स्तरीय कोचिंग फिर एडमिशन की मारामारी। बतौर स्टूडेंट जिंदगी भारत में बहुत मुश्किल है। हर एंट्रेस एग्जाम अपने आप में महारावण है। स्टूडेंट कुंभकर्ण होना चाहता है, आराम से सोना चाहता है। घरवाले उसे एग्जाम के रावण से भिड़ा देते हैं। एग्जाम, एग्जाम और लगातार एग्जाम। पुराने वक्तों में दो चार रावण होते थे बतौर एग्जाम छात्रों की जान को। कक्षा दसवीं, कक्षा 12वीं, स्नातक परीक्षा और फिर नौकरी का एग्जाम। अब तो कक्षा एक से ही टाॅप में आने की दौड़ शुरू हो जाती है। मम्मीजी को किट्टी पार्टी में बताना है, दादीजी को कीर्तन मंडली में बताना है कि हमारे घर का बच्चा टाॅप आया है। एक बच्चा जान को कितने रावण और कुछ रावण तो घरवालों की शक्ल में ही हैं। तो बच्चों को बचपन रूपी राम के दर्शन करने दीजिए, रावण तो उन्हें हर कदम पर मिलते रहेंगे।
नागिन, डायन के सीरियल
टीवी की टीआरपी का रावण कभी न निपट पाएगा। पहले डायन डरावनी होती थी। अब टीवी धारावाहिकों की डायनें चुड़ैलें इस तरह की बना दी गयी हैं कि लंपट पुरुष उनका इंतजार करते हैं और महिलाएं उनमें ये एंगल देखती हैं कि घर तुड़वाने की कौन सी नयी तकनीक लेकर आयी है ये चुड़ैल। लोग सारे भले हैं, शरीफ हैं पर पापुलर उनमें डायनें हो रही हैं। लोग सारे मानवीय संवेदना वाले हैं, पर इंसानों वाले सीरियल भले ही नाकामयाब हो जायें, नागिनों की टीआरपी में कोई कमी नहीं होती। संस्कार, आस्था सब गायब हैं, बस सास-बहू और नागिनें ही रह गई हैं टीवी पर ।
सेल का लालच
लोलुपता और लगातार लेते जाना है, लेते ही जाना है। यह मूलत: रावणीय वृत्ति है। करीब एक लाख का फोन जिस कंपनी ने पिछले ही साल लांच किया है, वही फिर इस बार भी लाख का फोन लेकर आ गयी है और फिर चिरौरी कर रही है, इश्तिहारों के जरिये कि इस फोन को लो। इस फोन को लो। इश्तिहारों के जरिये बतौर कस्टमर मेरे अंदर का रावण जगने लगता है, जो कहता है यह भी चाहिए, यह भी चाहिए। पुराना वाला बेकार हो गया है। नया ही चाहिए। मेरे अंदर के रावण को कई इश्तिहार जगा देते हैं। और मैं नया मोबाइल ले आता हूं, मेरा विवेक कहता है कि यह जरूरी नहीं है। पर उसे मेरे अंदर का लोलुप रावण चुप करा देता है कि चुप, यह बहुत ही जरूरी है। यही रावण अगले साल फिर जाग जाएगा, जब यही कंपनी फिर नया माॅडल ले आएगी। सेल का रावण नहीं मरता। मर नहीं सकता, कंपनी के पास लगातार मुनाफे बढ़ाने के टारगेट हैं। इसलिए कस्मटर टारगेट हैं। एक साल में पुराना फोन खराब नहीं हुआ है यह बात कंपनी को पता है। फिर भी नये फोन के पुराने टारगेट हैं। काश, सेल का रावण मरता नहीं तो कमजोर तो हो जाता। वह भी नही होगा। मेरे अंदर जब तक इश्तिहारों का आकर्षण है, लोलुपता है। सेल का रावण बहुत मजबूत होगा। जरूरी है इस लालच के रावण का मारना।
बढ़ते महिला अपराध
लड़कियों को छेड़ने वाले ऐसे छिछोरे टुच्चों को रावण से कम से कम एक मामले में शिक्षा लेनी चाहिए कि रावण भी कुछ मर्यादाओं का पालन करता था। सीता के अपहरण के बाद भी उसने एक न्यूनतम मर्यादा का पालन किया, जबरदस्ती नहीं की। रावण पर अपहरण का आरोप है, पर उसने उस तरह से ‘मी टू’ बाजी कभी नहीं की, जैसे आज दिखायी देती है। जिस तरह से लड़कियों के साथ गैंगरेप की घटनाएं सामने आ रही हैं, वह रावण को भी डराने वाली हैं। जरूरत है इनके खिलाफ खड़े होने की और इनसे लड़ने की।


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