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‘लाटसाहब’ की विदाई

Posted On August - 23 - 2018

आखिरकार मध्यप्रदेश वाले ‘ठाकुर साहब’ की राजभवन से ‘विदाई’ हो ही गई। संकेत सबको था। वरना क्या कारण कि ‘मनोहर काका’ ने महीनेभर से राजभवन के अधिकांश कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी। विदाई के कारण तमाम हैं, जिनमें सियासत भी है, जातिगत समीकरण भी और नयी सरकार की ट्रेनिंग भी। जितने मुंह, उतनी बातें। चूंकि प्रदेश चुनावी वर्ष में बढ़ रहा है तो राजभवन में ‘दलित चेहरा’ पार्टी की मदद करेगा, ऐसी आलाकमान की सोच है। पड़ोस वाले राजभवन में भी क्योंकि राजस्थान वाले ठाकुर साहब विराजमान हैं। ऐसे में एक ‘ठाकुर’ को तो जाना ही था। मामले में तड़का कुलपतियों की नियुक्ति का भी लग रहा है। संघी भाई कुछ पॉजिटिव हैं। कहते हैं, तबादला बड़ी बात नहीं है। त्रिपुरा के युवा सीएम को मार्गदर्शन के लिए ‘खाटी तजुर्बेकार’ की जरूरत थी। सो, ठाकुर साहब को ‘नयी-नवेली’ सरकार की ‘ट्रेनिंग’ के लिए भेजा गया है। भाई लोग प्रदेश के राजभवन की पृष्ठभूमि को भी जोड़ रहे हैं, जहां पिछले कुछ दशकों से दलित चेहरों का ‘साम्राज्य’ रहा है। फिर यह क्यों भूलें कि हरियाणा में इनेलो-बसपा गठबंधन की काट भी तो सोचनी थी। राजभवनों से किसी वर्ग के कितने वोट बदले हैं, यह सोचना आपके जिम्मे।
नौकरशाहों का पुनर्वास
जीवन पर्यन्त सरकारी सुविधाएं भोगने वाले प्रदेश के आला नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद ‘पुनर्वास’ के मामले में देशभर में अव्वल रहे हैं। ना उनकी किसी सियासी दल से शत्रुता रहती है और न ही मित्रता। सही मायनों में वे अब तक पुनर्वास के मामले में ‘राज के पूत’ यानी जिसकी सरकार उसके पूत की परिभाषा को चरितार्थ करते आए हैं। मामला चाहे सूचना आयोग का हो, सेवा आयोग का या फिर हरेरा का। बोलबाला इन्हीं भाइयों का है। अब हरियाणा सूचना आयोग में विज्ञापित तीन पदों के लिए भाई लोगों में जबरदस्त लॉबिंग चरम पर है। इनमें पंचकूला फेम पुलिस प्रमुख, बहादुरगढ़ वाले बड़े साहब, झज्जर वाले अफसर-कम-गायक महोदय, उड़ीसा वाले बड़े पंडितजी, पशुओं वाले बड़े डॉक्टर और न जाने कितने ही ‘राज के पूतों’ की लार टपक रही है। अभी तक इस आयोग में सरकार 6 की भर्ती कर चुकी है और तीन और की तैयारी है। इस तरह से काका के ‘नवरत्न’ आयोग में होंगे। फिर आरटीआई आवेदकों का क्या है। सूचना ही तो लेनी है, संघ कनेक्शन से ले लेंगे। आप भी यूं ही हर चीज में कानून और योग्यता की बात करने लगते हैं।
एयरपोर्ट पर दीपू भाई
खेल और खिलाड़ियों के प्रति कांग्रेस और इनेलो के युवा नेतृत्व का प्रेम जग-जाहिर है। लेकिन इस बार बाजी मारी है अपने रोहतक वाले दीपू भाई ने, जो कुश्ती में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे बजरंग पूनिया की अगवानी के लिए मंगलवार शाम दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंच गए। बजरंग चूंकि झज्जर के हैं, सो दीपू भाई को देखते ही गदगद हो गए। दोनों ने जादू की झप्पी भी पा दी। यही नहीं, बजरंग की स्वर्णिम सफलता से गदगद रोहतक वाले सांसद ने बजरंग के गले में पड़े गोल्ड मैडल को भी लोगों को दिखाया और फोटोबाजी हुई। सियासत तो यही है, जो मारे सो मीर। लगे रहे दीपू भाई।
बॉर्डर पार फायरिंग
अपने दाढ़ी वाले ‘कामरेड बाबा’ यानी अनिल विज को कांग्रेस को घेरने का एक और मौका मिल गया है। अमरेंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ-ग्रहण समारोह में क्या पहुंचे, बाबा ने यहां बैठे-बैठे बॉर्डर पार ‘फायरिंग’ शुरू कर दी। ट्विटर वार के जरिये बाबा ने सिद्धू ही नहीं, अमरेंद्र सिंह और राहुल गांधी तक को निशाने पर ले लिया। अब वापस लौट आए सिद्धू भले ही खुद को शांति दूत बता रहे हैं और इस मुलाकात से दोनों मुल्कों के बीच बातचीत की नयी शुरुआत होने का दम भर रहे हैं, लेकिन इस मामले में उनकी ही सरकार के मुखिया भी अलग खड़े दिख रहे हैं। वैसे बाबा को एक ही मुद्दे पर बार-बार ट्वीट करना भारी भी पड़ा। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने बाबा की भी खिंचाई कर डाली।
साइकिल संग रथ
अपने साइकिल वाले प्रधानजी अब जाटलैंड के सोनीपत में साइकिल लेकर उतरे हुए हैं। पहले ही दिन साहब इतने उत्साहित हुए कि पीछे फंसी एम्बुलेंस का भी ख्याल नहीं रहा। साथ चलने वालों को नंबर बनाने से फुर्सत मिले तो वे एम्बुलेंस को रास्ता भी देते। प्रधानजी के समर्थकों की ओर से सोशल मीडिया में पोस्ट किए जा रहे फोटो में साइकिल के साथ एक रथ भी नज़र आ रहा है। रथ कुछ वैसा ही है, जैसा अपने सांघी वाले ताऊ लेकर चलते हैं। अब बोलने वालों को कोई क्या रोकेगा। कहने वाले कह रहे हैं कि प्रधानजी साइकिल संग रथ भी लेकर चल रहे हैं।
सोशल मीडिया फोबिया
चुनावी वर्ष में सियासी दलों के लिए सोशल मीडिया किसी फोबिया से कम नहीं है। अपने ‘खट्टर काका’ के ‘नवरत्नों’ ने तो इसके लिए पूरी टीम बनाई हुई है। कभी किसी की एंट्री हो रही है तो कभी किसी की ‘घर वापसी।’ अब अपने बिल्लू भाई को भी सोशल मीडिया की जरूरत का अच्छे से अहसास हो चला है। विगत दिवस चंडीगढ़ में पार्टी विधायकों एवं प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में वे सोशल मीडिया के प्रभाव से चिंतित नज़र आए। अपने ही भतीजे दिग्विजय सिंह चौटाला को सोशल मीडिया पर वर्करों को एक्टिव करने का जिम्मा सौंप दिया है। वैसे अपने कांग्रेसी भाई-लोग अभी तक सोशल मीडिया को समझ नहीं पाए हैं। संभव यह भी है कि भाई लोगों को अपनी आपसी ‘जंग’ के चलते इस बारे में सोचने का वक्त ही न लगा हो।
काका के तेवर
अपने ‘खट्टर काका’ के तेवर लगातार बदल रहे हैं। अब उन्होंने ‘लगाम’ को पूरी तरह से खींच लिया है। अफसरों को भी आड़े हाथों ले रहे हैं। अपनों को भी नहीं बख्श रहे। पूरी तरह से चुनावी मोड में हैं। बैठकों का शेड्यूल भी लगातार बढ़ रहा है। ग्राउंड में भी पूरी मोर्चेबंदी पर हैं। एमएसपी पर पांच रैलियां करने के बाद अब वाजपेयी के नाम को भुनाने की कोशिश हो रही है। उनके नाम पर कई बड़े प्रोजेक्ट समर्पित हो सकते हैं। ‘बड़े साहब’ कोई ऐसा मौका नहीं चूकना चाहते, जिससे लोगों में यह संदेश जाए कि अधिकारियों पर ढीली पकड़ है। अब ऐसा रुख अपनाना भी पड़ेगा। तभी तो दिल्ली दरबार तक बात पहुंचेगी।
आखिर में भाई-बहन
अपने इनेलो वाले बिल्लू भाई ने भी आखिरकार बसपा सुप्रीमो कुमारी मायावती से राखी बंधवा ली है। रक्षाबंधन के दिन बाहर होने की वजह से उन्होंने चार रोज पहले ही दिल्ली पहुंच कर इस परंपरा को पूरा किया। राखी बांधते, तिलक लगाते और मिठाई खिलाने के दर्जनभर फोटो भी हाथोंहाथ सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। अब बसपा वाले भाईलोगों को भी तो लगना चाहिए कि गठबंधन अटूट है और लम्बा चलेगा।
-दिनेश भारद्वाज


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