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संविधान जो खुद को नहीं बचा सका वह देश को क्या बचायेगा

Posted On July - 31 - 2017

चंडीगढ़, 30 जुलाई (ट्रिन्यू)

चंडीगढ़ में रविवार को पंचनद स्टडी सेंटर द्वारा ‘भारत को चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में व्याख्यान देते भानु धमीजा।

चंडीगढ़ में रविवार को पंचनद स्टडी सेंटर द्वारा ‘भारत को चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में व्याख्यान देते भानु धमीजा।

पंचनद स्टडी सेंटर के चंडीगढ़ चैप्टर द्वारा ‘भारत को चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली’ विषय पर आज गोष्ठी आयोजन किया गया। गोष्ठी में अमेज़न बेस्ट सेलर पुस्तक ‘ह्वाई इंडिया नीड्स दि प्रेसिडेंशियल सिस्टम’ के लेखक भानु धमीजा ने ‘भारत को चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली’ विषय पर बोलते हुए कहा कि शासन व्यवस्था एक ऐसा मुद्दा है जो हर नागरिक को हर रोज़ प्रभावित करता है और इस पर खुली बहस की आवश्यकता है। हम एक जीवंत समाज हैं जो संविधान का सम्मान तो करते हैं पर उसे कुछ ऐसा विधान नहीं मानते जिसमें संशोधन, परिवर्तन या सुधार की गुंजायश ही न हो।
भानु धमीजा ने कहा अमेरिकी के 230 साल के इतिहास में एक भी अमेरिकी राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन पाया जबकि भारतीय संविधान के लागू होने के 25 साल के भीतर ही इसका अंगभंग हो गया। जो संविधान खुद को ही न बचा सका वह देश को क्या बचाएगा। उन्होंने इस धारणा का विरोध किया कि गरीबी अथवा अशिक्षा के कारण भारतीय समाज एक बेहतर संविधान के योग्य नहीं है।
धमीजा ने कहा कि अमेरिकी संविधान की सबसे बड़ी खासियत सरकार के सभी अंगों में शक्तियों का पृथकीकरण है। अमेरिकी कांग्रेस अपना काम करती है, राष्ट्रपति अपना काम करते हैं और न्यायपालिका अपना काम करती है। कोई किसी पर निर्भर नहीं है लेकिन सरकार का हर अंग दूसरे अंगों की निगरानी करता है और उस पर सीमित नियंत्रण भी रखता है। शक्तियों के संतुलन के इस शानदार समीकरण के कारण ही अमेरिकी समाज उन्नति कर रहा है जबकि गलत शासन व्यवस्था के कारण भारतीय समाज में पतनकारी और विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैं। अंत में पंचनद स्टडी सेंटर के चंडीगढ़ चैप्टर के सचिव दीपक वशिष्ठ ने भानु धमीजा और श्रोताओं का धन्यवाद किया।
राष्ट्रपति प्रणाली में गलतियों से बचना संभव
संसदीय प्रणाली को अकसर इसलिए बढ़िया माना जाता है क्याेंकि इसमें सरकार तेजी से काम कर सकती है और यह संसद के प्रति जवाबदेह है। अमेरिकी शासन प्रणाली में यह खासियत है कि वहां सरकार मनमानी नहीं कर सकती और उसे कदम-कदम पर संसद की सहमति लेनी होती है जिससे गलतियों से बचना संभव हो जाता है। भानु धमीजा ने श्रोताओं के प्रश्नों का भी खुल कर उत्तर दिया।
व्हिप प्रतिनिधि मर्जी से नहीं दे सकते वोट
धमीजा ने कहा कि यह भारतीय समाज ही था जिसने आपातकाल के बाद पहले ही चुनाव में इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाकर अपने विवेक का परिचय दिया था। धमीजा ने जोर देकर कहा कि सांसदों एवं विधायकाें को अपनी इच्छा से मतदान का अधिकार नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है कि हमारे प्रतिनिधि अपनी मर्जी से वोट नहीं दे सकते और उन्हें पार्टी व्हिप का पालन करना पड़ता है।


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