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शब्दों में ढले भीड़ के स्वर

Posted On May - 27 - 2017

फूलचंद मानव
12705cd _Image_ 00 (48)दोहा, ग़ज़ल और कविता कहने वाले पंजाब के हिंदी रचनाकारों में शशिकांत उप्पल का अपना एक स्तर और अलग स्वर भी है। ‘आम आदमी की कविता’ और ‘शब्द सफर में है’ काव्य संग्रह एवं ग़ज़ल गुलजार ग़ज़ल संग्रहों के साथ हिंदी, पंजाबी व उर्दू के संकलनों में भी शशिकांत की रचनाएं शामिल होकर पाठकों तक गई हैं।
वैचारिकता, रचनात्मकता को आधार बताकर इधर जिन कवियों ने हिंदी साहित्य में योगदान किया, सोच को भी शुमार करता कवि डॉ. शाशिकांत उप्पल उन्हीं में से एक है। मोगा, पंजाब या प्रवास में रहता कवि मन कलरव सुनता, गुनता और उसे अर्थ देने का अभ्यस्त है। भारत हो या विदेश शब्द और अर्थ का दामन वह नहीं छोड़ता और विचारों की उधेड़बुन में जो रचता है, काव्य हो जाता है।
‘भीड़ के स्वर’ सुनी-अनसुनी आवाजों के ऐसे बोल हैं जहां स्पंदन, एहसास, शिद्दत या गहराई नये रूपाकार ग्रहण करती है। ‘कुछ ऐसा करें’ से लेकर शंखनाद तक कुल नब्बे से से ऊपर इन लघु, छोटी कविताओं का फलक सचमुच बड़ा ही कहा जाएगा। वैचारिकता का सूत्र, बीज रूप में प्रस्फुटित हो और कविता कहलाए, यह शशि उप्पल की कोशिश रही है। आसरा, सहारा, संबल या मुस्कान बांटना चाहता  है कवि।
कविता चिंता का विषय, खोज रहा हूं, हारा हुआ आदमी, मैं नहीं जानता, उन लोगों के नाम, ‘कुछ भी नहीं हूं’ से शुरू करें तो अपना ही मजा है, मेरा इंतजार करना, कहां आ गए हो, कोई नहीं है, अस्तित्व के नाम पर या मंजिल आएगी जरूर तक बीसियों काव्य स्तर हैं, जहां मनुष्य का स्वर भीड़ में कवि सुनता, उसे खोलता, बिछाता, दिखाता और बतलाता चला है। वह दिखा जाता है कि रिश्ते सार्थकता से कोसों दूर होकर भी आवश्यकता जितने निकट होते हैं।
हर युग में हरे स्वप्न देखे हैं मेरी आंखों ने बंजर जमीन पाकर भी। एक पत्ता हवा से टूटकर अटक गया है पेड़ पर ही, हवा घूर रही है उसे, दरख्तों के नीचे बिखरे सूखे पत्ते गल-सड़ रहे हैं और खुश हैं, आखिर खाद बनना है उन्हें चूंकि मजबूत करनी है जड़ें उन्हीं दरख्तों की, जिनसे टूटे हैं वे।
बाजारवाद, भूमंडलीकरण के दौर में सपाट आदमी मोटा सोचता, गति से होड़ लेता, जहां फिसल रहा है, भीड़ में स्वर का कवि शशिकांत नही मौलिकता का संवाहक होकर पाठकों के सामने आया है। चेतना, प्रतीक्षा, रोको, आधार, उत्तर साजिश, आकृति, उपकार, विडम्बना ही नहीं, विश्वास समझौता, प्यास, यह दौड़ गुहार, परामर्श, आईना से आगे भी अन्य दर्जनभर कविताओं में शशि को कवि इन्हीं शब्दों को परिभाषित भी करता चला है। शैली, शिल्प, बिंब, प्रतीक का सहारा लेकर और इनसे अलग भी जहां से रचनाकार प्रेरित-प्रोत्साहित हैं, उन्हीं सार्थक छवियों को रचना में ढालकर मूर्त रूप दिखाता, अर्थों को चरितार्थ कर जाता है।
‘जिज्ञासा’—मुझे बताओ/ वो तीर/ जो मुझे भेदकर निकल गया/ तुम्हारे तरकश में/ लौटकर आया कि नहीं।
आशा, आस्था और विश्वास का कवि शशिकांत उप्पल एक प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में ‘भीड़ के स्वर’ मुखरित करता है। यहां सन्नाटे में चीख है और शोर में चुप्पी भी विसंगतियां कवि को विचलित करती हैं, तो ‘लौट आया’, ‘अनकहे शब्द’, मोरपंखी बादल, चाहता हूं, ये कविताएं सरीखे काव्य विस्तार कवि की कलम उगलती है। स्वदेश हो या विदेश, कवि मन प्रवासी कहलाता भी भारतीयता से मुक्त नहीं हो पा रहा और अपने शब्दों से मानचित्र में निजी शिद्दत बयान करता है। ‘अखबार के पहले पन्ने पर, औंधा गिरा पाया मैंने वही पेड़/ वह घना पेड़/ जिसकी टहनियों में आश्रय लेते थे/ सैकड़ों पंछी, मेरा प्रेरणास्रोत रहा बरसों/ लेकिन पिछली रात तेज आंधी ने, उखाड़ कर रख दी उसकी जड़ें/ एक ही पल में/ और आज सुबह…।
यों शशिकांत उप्पल, भीड़ के स्वर दोहराते मुख्य काव्यधारा में शामिल हो रहे हैं।

0पुस्तक : भीड़ के स्वर 0लेखक :         डॉ. शशिकांत उप्पल 0प्रकाशक : यूनिस्टार, मोहाली     0पृष्ठ     संख्या : 106 0मूल्य : ~ 195.


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