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स्वार्थ का दान

Posted On May - 19 - 2017

एकदा
विख्यात संत जुन्नैद अपनी मस्ती में इधर से उधर घूमा करते थे। उनकी ख्याति सुनकर एक बार नगर के एक जाने-माने धनी सेठ भी उनके दर्शनों के लिए आ पहुंचे। पर्याप्त उपहारों के अलावा उन्होंने अपने साथ लाई स्वर्ण मुद्राओं की मखमली थैली भी संत के चरणों में रख दी। मुद्राओं से भरी थैली पर नज़र डालकर जुन्नैद ने सेठ से पूछा-क्या इसके अतिरिक्त और धन भी है तुम्हारे पास या यही समस्त पूंजी है तुम्हारी? सेठ बोला-मेरे पास इससे कई गुना अधिक धन-संपत्ति है। यह तो कुछ अंश मात्र ही है। इस पर संत ने पूछा-क्या तुम और धन की इच्छा रखते हो। सेठ ने जवाब दिया-इतने धन से होता ही क्या है। अगर इसमें कुछ और धन मेरे धन में जुड़ जाए तो बात ही कुछ और होगी। जुन्नैद सेठ को दयनीय दृष्टि से देखते हुए बोले-तब तो यह स्वर्ण मुद्राएं भी तुम ही रख लो क्योंकि मुझसे ज्यादा तुम्हें इनकी ज़रूरत है। जिसके पास सब कुछ होते हुए भी और अधिक की चाह हो तो उसका दान भी स्वार्थ के लिए किया गया दान ही सिद्ध होता है।                                                 प्रस्तुति : मुकेश जैन


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