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सीमा पर ‘वीडियो युद्ध’

Posted On May - 25 - 2017

झूठ बोलने पर आमादा पाक
Edit-1मंगलवार को भारतीय सेना ने नौशेरा सेक्टर में पाकिस्तान की अग्रिम चौकियों को ध्वस्त करने का वीडियो दिखाया तो बौखलाई पाकिस्तानी सेना ने भी अगले दिन ठीक उसी तर्ज पर भारतीय चौकियों को भारी गोलाबारी से उड़ा देने का वीडियो जारी कर दिया। सर्जिकल स्ट्राइक्स पर भारत-पाक के दावों और टीवी चैनलों पर दोनों तरफ से जवाबी हमलों के साथ अब ‘वीडियो युद्ध’ भी आ जुड़ा है। भारत के साथ कूटनीतिक व सैन्य स्तर पर पटखनी खाने के बाद, पाकिस्तान अब झूठ का सहारा लेने पर आमादा है। पाकिस्तान का यह दावा संयुक्त राष्ट्र ने तत्काल खारिज कर दिया है कि भारतीय सेना ने खंजर सेक्टर में संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों के वाहन को निशाना बनाया। परंतु, प्रासंगिक प्रश्न यह है कि सीमा पर बाड़ लगाने और विभिन्न सुरक्षा घेरों में लाखों सुरक्षा कर्मियों की तैनाती के 27 साल बाद भी घुसपैठ क्यों जारी है? बहाने कई हैं : बर्फबारी के दौरान बाड़ क्षतिग्रस्त हो जाती है, सीमा के आर-पार नदी-नालों पर बाड़ नहीं लगाई जा सकती और उग्रवादी घुसपैठ के लिए नये रास्ते खोज लेते हैं। मतलब यह कि घुसपैठ के रास्तों को स्थाई तौर पर बंद करना संभव नहीं। सैन्य कार्रवाइयों को सार्वजनिक करना अति-राष्ट्रवादी सरकार की शोहरत बटोरने की उत्कंठा को ही उजागर करता है। नयी दिल्ली पर अब पुरुषत्वहीनता के आरोप नहीं लगाए जा सकते। भाजपा जब विपक्ष में थी तो सत्तारूढ़ दल के खिलाफ इसी शब्द का इस्तेमाल करती थी। परंतु जल्दी ही वह एक और धर्म संकट का सामना करेगी। घुसपैठ जारी रहने के चलते, (15 सालों के दौरान पिछले वर्ष सबसे ज्यादा घुसपैठ हुई) मोदी सरकार का मतदाता वर्ग ताकीद करेगा कि ‘रोज-रोज की सिरदर्दी एक ही झटके में खत्म’ कर दो।
हम यह समझ नहीं पाते कि संक्षिप्त, निर्णायक युद्धों का दौर अब खत्म हो गया है। अमेरिका जैसा ताकतवर देश अफगानिस्तान और इराक में यह सबक ले चुका है। रूस यह समझ चुका है कि युद्ध की स्थिति में सीरिया एक दलदल साबित होगा। इसलिए वह सीरिया-संकट का हल बातचीत से निकालने के प्रयास कर रहा है। भारत यह मानता है कि उपद्रवी पत्थरबाजों और विदेशी समर्थन एवं पैसे के बलबूते बंदूकें लहराने वाले कुछ उग्रवादी ही कश्मीर समस्या की जड़ हैं। परंतु पाकिस्तान कश्मीर से भी आगे की सोचता है। भारत के आर्थिक और राजनीतिक अभ्युदय से इस्लामाबाद बेहद चिंतित है। एनएसजी की सदस्यता को ही ले लीजिए। चीन को छोड़ कोई भी देश पाकिस्तान को एनएसजी की सदस्यता दिये जाने का समर्थन नहीं करता। जबकि भारत के एनएसजी में शामिल होने से कई विकसित देशों के लिए व्यापार-कारोबार के नये अवसर सृजित होंगे। ऐसे में यह समझना बुद्धिमानी होगी कि सैन्य कार्रवाई में किसी तरह की तेजी सरकार के आर्थिक विकास के सपनों पर ही भारी पड़ेगी। पाकिस्तान के मंसूबे भी यही हैं।


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