भगौड़े को पकड़ने गयी पुलिस पर हमला, 3 कर्मी घायल !    एटीएम को गैस कटर से काट उड़ाये 12.61 लाख !    कुल्लू में चरस के साथ 2 गिरफ्तार !    बारहवीं की छात्रा ने घर में लगाया फंदा !    नेपाल को 56 अरब नेपाली रुपये की मदद देगा चीन !    इस बार अब तक कम जली पराली !    पीएम की भतीजी का पर्स चुरा सोनीपत छिप गया, गिरफ्तार !    फरसा पड़ा महंगा, जयहिंद को आयोग का नोटिस !    महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में प्रचार करेंगी मायावती !    ‘गांधीजी ने आत्महत्या कैसे की?’ !    

समाज की सोच बदलने की लड़ाई

Posted On May - 26 - 2017

12605CD _SAHARANPUR_VIOLENCE_620X400दलितों से भेदभाव

विश्वनाथ सचदेव
हरियाणा के एक गांव संजखास के संजय कुमार को इतना पीटा गया कि वह अस्पताल में इलाज करा रहा है। उसका अपराध यह था कि अपनी शादी की बारात में वह घोड़ी पर बैठा था। गांव की परंपरा के अनुसार दलितों को घोड़ी पर बैठकर बारात ले जाना अपराध है। राजस्थान के गुंडूसर गांव (जि. चुरु) का विजय कुमार लाउडस्पीकर लगाकर संगीत बजाते हुए बारात ले जा रहा था। उस पर और उसके परिवार के लोगों पर गांव के राजपूतों ने हमला कर दिया। उदयपुर में भी कैलाश मेघवाल घोड़ी पर चढ़कर बारात ले जा रहा था। उसकी भी पिटाई हो गयी। यहीं का चम्पालाल मेघवाल भी गाजे-बाजे के साथ बारात ले जा रहा था। उसे भी गांव के सवर्णों के गुस्से का शिकार होना पड़ा।
एक अखबार के अनुसार ये घटनाएं अप्रैल 2017 की हैं। और यह सिर्फ एक झांकी है इक्कीसवीं सदी के भारत में पल रही सोच की। ऐसी घटनाएं उस मानसिकता को उजागर करती हैं, जिसे सिर्फ अमानवीय ही कहा जा सकता है। मनुष्यता के खिलाफ होने वाले इस अपराध के लिए सज़ा का प्रावधान है हमारे यहां। इन सारे मामलों में भी पुलिस ने कार्रवाई की है। पर सारे अभियुक्त जमानत पर छूटे हुए हैं। कहीं-कहीं पुलिस की सुरक्षा में दलितों की बारातें निकली भी हैं।
करनाल जिले के एक गांव में तो मंत्रियों ने जाकर ऐसी एक बारात को संभव बनवाया था। वहां मंत्रियों के कहने पर सवर्णों ने माफी भी मांग ली। दलितों ने पुलिस में की गयी शिकायत वापस ले ली। पर दोनों पक्ष यह जानते-मानते हैं कि यह समझौता ज़्यादा चलेगा नहीं। गांव के दलितों का कहना है कि अगर सवर्णों का दूल्हा घोड़ी पर चढ़ सकता है तो दलित दूल्हा क्यों नहीं। वे कहते हैं कि हम अपने लिए नहीं लड़ रहे, अपनी आने वाली पीढ़ियों के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों में इस लड़ाई के चेहरे भले ही अलग-अलग दिखते हों, पर है यह लड़ाई एक मनुष्य के रूप में अपनी पहचान कराने की ही। वैसे तो सदियों से लड़ी जा रही है यह लड़ाई, लेकिन माना यह गया था कि स्वतंत्र भारत में बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में बने संविधान द्वारा दिये गये समता के अधिकार के बाद जनमानस अपने इस कर्तव्य को भी समझ लेगा कि समता का यह दर्शन हर उस व्यक्ति से सामाजिक विषमता की खाई को पाटने के कार्य में भागीदारी की मांग करता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
दलितों के नाम पर देश में बहुत कुछ हुआ है। बहुत कुछ हो भी रहा है। हर राजनीतिक दल दलितों के पक्ष में खड़ा होने के वादे और दावे करता है। वैसे तो दलितों के ‘अपने’ राजनीतिक दल भी बन गये हैं। दलितों के पक्ष में बहुत सारे कानून भी बने हैं। उनकी स्थिति में सुधार भी हुआ है। लेकिन, त्रासदी यह है कि आज भी हमारा समाज ‘हम’ और ‘वे’ में बंटा हुआ है। यदि ‘हम’ सवर्ण हैं तो ‘वे’ के पाले में वह सब आते हैं जिन्हें सदियों से मनुष्य के रूप में मिलने वाले समानता के अधिकार से वंचित रखा गया हैö।।
इक्कीसवीं सदी का दलित यह कह रहा है कि हम जो चाहते हैं, वह क्यों नहीं कर सकते? यह हमारा भी देश है। सब ताकत की भाषा समझते हैं…तभी हमारी स्थिति सुधरेगी। ये शब्द उस संजय के हैं जो कुछ पढ़ चुका है, कुछ बन भी चुका है और अब अपने साथी दलितों के लिए कुछ करना चाहता है।
पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ दलितों ने धरना दिया। ये युवा सहारनपुर में दलितों पर हुए अत्याचार के निषेध के लिए एकत्र हुए। उन्हें शिकायत उत्तर प्रदेश की नयी सरकार की उस कार्रवाई से भी है जो सहारनपुर के हमले के दोषियों के खिलाफ की जा रही है। अपर्याप्त लग रही है उन्हें सरकार की कार्रवाई और राजनीतिक दलों से भी उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रहीं। उन्हें लग रहा है कि सभी राजनीतिक दल चुनावी गणित के अनुसार कार्रवाई करते हैं। इन प्रदर्शनकारी युवाओं को यह भी लग रहा है कि हमारे राजनीतिक दल सत्ता की राजनीति में लिप्त हैं। एक नये युवा नेता के आह्वान पर हज़ारों दलित युवाओं का जंतर मंतर पर धरने के लिए पहुंचना इस बात का भी संकेत है कि देश के युवा दलित पारंपरिक राजनेताओं के सम्मोहन से मुक्त हो रहे हैं।
सवाल घोड़ी पर चढ़कर बारात ले जाने का नहीं है, सवाल उस बराबरी के हक का है जो जनतांत्रिक भारत में सबको मिलना ही चाहिए। और यह अधिकार कानूनों से सुरक्षित नहीं होगा, राजनेताओं के वादों से भी नहीं। यह समाज की सोच को बदलने की लड़ाई है। वंचितों को उनका देय मिलने का अर्थ है दलित और सवर्ण के बीच की दूरी को खत्म करना। यह दूरी मनों की है। मन बदलने होंगे।


Comments Off on समाज की सोच बदलने की लड़ाई
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.