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समय बांचने की सिद्धि

Posted On May - 25 - 2017

तिरछी नज़र

मृदुल कश्यप
प्रत्येक नेता में समय को बांचने की अद‍्भुत क्षमता पाई जाती है। इसका उपयोग करके वह बतलाता रहता है कि किस कार्य के करने का सही समय क्या है। वह कुछ विशेष गणनाएं करके बतलाता है कि कौन-सा समय किस गतिविधि के लिए एकदम उपयुक्त है। इस मामले में वह आम और खास में कोई भेद नहीं करता। वह सभी को सच्ची राह दिखलाता है। यहां तक कि वह सरकार की बांह मराेड़ कर अंधेरी सुरंग से बाहर निकाल देता है।
जैसे कि चुनाव होने के ठीक पहले वह सबके सामने पार्टी का काला चिट्ठा खोल के रख देता है। और फिर आम जनता को बतलाता है कि अब समय आ गया है कि किस पार्टी के अनुचित कार्यों का जनता को जवाब देना चाहिए और जनता को किस पार्टी पर भरोसा करना चाहिये। वह कहता है कि इस समय को हाथ से जाने मत देना। इसी विशिष्ट सिद्धि के आधार पर गुरु लोग चुनाव से ऐन पहले पाला बदल लेते हैं। वे समझ जाते हैं कि कौन-सी पार्टी कल्याण करेगी। वह उसके साथ हो जाते हैं।
देश में किसी आतंकी घटना के सफलतापूर्वक घट जाने के बाद वह बतलाते हैं कि अब समय आ गया है कि इसका माकूल जवाब दिया जाए। भारत-पाक सीमा पर पाक द्वारा की गई अमानवीय कार्रवाई के बाद वह पाक को उसी की भाषा में जवाब देने की मांग करने लगते हैं। हमारे देश में भाषा की समस्या अंग्रेजों के जमाने से ही चली आ रही है। अंग्रेजों की भाषा अलग थी, गांधी जी की भाषा अलग। गांधी जी ने अंग्रेजों को उनकी भाषा में जवाब नहीं दिया, फिर भी उन्होंने अंग्रेजों को धूल चटा दी थी।
विभाजन से पहले भारत-पाक की एक ही भाषा हुआ करती थी। अलग होते ही पाक की भाषा बदल गई। उसकी भाषा हम गांधी जी के चेलों के सर के ऊपर से गुजर जाती है। कई बार मुद्दा उठा पर भारत आज तक उसकी भाषा सीख नहीं पाया। इसलिए वह पाक को उसकी भाषा में जवाब नहीं दे पाता। इन दिनों पाक जिस भाषा में कार्य करता है, उसे सुनकर ही सिर शर्म से झुक जाता है। पर पाक उसी भाषा पर गर्व महसूस करता है, इठलाता फिरता है।
नेताओं की समय बांचने की सिद्धि तब तक ही काम करती है जब तक वे विपक्ष में होते हैं। विपक्ष में रहते हैं तो तीव्र अवस्था रहती है। सत्ता मिलते ही यह मंद पड़ जाती है और धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है। देश में एक ही ऐसे प्रसिद्ध नेता थे, जिनका सीना छप्पन इंच का था। वे भाषा के बड़े जानकार थे। सामने वाले को किस भाषा में जवाब देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी। वे बेहद सटीक भविष्यवाणी भी किया करते थे। बाद में वह उड़न खटोलों की दुनिया में रम गए। सिद्धि जाने कहां चली गई।


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