भगौड़े को पकड़ने गयी पुलिस पर हमला, 3 कर्मी घायल !    एटीएम को गैस कटर से काट उड़ाये 12.61 लाख !    कुल्लू में चरस के साथ 2 गिरफ्तार !    बारहवीं की छात्रा ने घर में लगाया फंदा !    नेपाल को 56 अरब नेपाली रुपये की मदद देगा चीन !    इस बार अब तक कम जली पराली !    पीएम की भतीजी का पर्स चुरा सोनीपत छिप गया, गिरफ्तार !    फरसा पड़ा महंगा, जयहिंद को आयोग का नोटिस !    महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में प्रचार करेंगी मायावती !    ‘गांधीजी ने आत्महत्या कैसे की?’ !    

संस्कृति के सहारे राजनय की राह

Posted On May - 23 - 2017

12305cd _modi_7594दुनिया भर के मनुष्य मन की शांति की तलाश में हैं। सांप्रदायिक उन्माद की हिंसा-प्रतिहिंसा में झुलसते देशों को दरकिनार कर दें और आतंकवाद जनित रक्तपात को भी अनदेखा कर दें, तब भी हत्याओं, आत्महत्याओं और अपराधों ने हताशा का जो परिवेश बना दिया है, मानव उससे मुक्ति का मार्ग खोज रहा है। आज विश्व में अकाल मौंतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है आत्महत्या। विश्व भर के मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक आत्महत्याओं की असंख्य घटनाओं के अध्ययन-विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दुख को सह पाने में असमर्थ पलायनवादी व्यक्ति को त्वरित और आसान मार्ग दिखता है आत्महत्या।
बौद्ध दर्शन की बुनियादी मान्यता यह है कि जीवन में दुख अनिवार्य है। मनुष्य की मुक्ति उससे पलायन में नहीं, उसे सहने और उससे जूझने में है। उन्होंने कहा था कि जूझने की अक्षय शक्ति अपने भीतर है। उसको जाग्रत करिए। दृढ़ निश्चय से सकारात्मक ऊर्जा के द्वारा समस्त चुनौतियों का सामना करिए। बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है असीम करुणा, अदम्य साहस और अविचल विवेक। इनके समन्वय से मनुष्य वैसा ही बन जाता है, जैसा बनने की वह निरंतर सोचता रहता है।
गौतम बुद्ध बौद्ध जगत में शाक्य मुनि के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके जीवन दर्शन को उनके ‘कमलसूत्र’ के माध्यम से जाना और समझा जाता है। बुद्ध का जन्म 623 ईस्वी पूर्व नेपाल के लुम्बनी के शाक्य वंश में हुआ था। वह अयोध्या के इक्ष्वाकु (सूर्य पुत्र) वंश की एक शाखा थी, वह क्षेत्र शाल के वृक्षों से परिपूर्ण था। शाल को शाक्य भी कहा जाता है। इसीलिए वे शाक्य मुनि कहलाए। उन्हें बुद्धत्व भारत में बोद्धि वृक्ष के नीचे साधना के दौरान प्राप्त हुआ था। परंतु उनके हवाले से चीन, जापान एवं अन्य देशों में यह मान्यता प्रचलित है कि वे ‘बुद्ध’ तो बहुत पहले ही हो चुके थे। उनकी शिक्षाओं से जो जीवन-दर्शन विकसित हुआ वह विभिन्न उपासना पद्धतियों के मानने वालों को इसलिए प्रभावित करता है क्योंकि वह सबको जीवन जीने की कला सिखाता है। उस कला का मर्म है आत्मविश्वास।
ज्ञात हो कि जब बुद्ध शरीर त्याग रहे थे तो उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा-भगवन, आपके जाते ही सर्वत्र अंधकार हो जाएगा। तब हमें मार्ग कौन दिखाएगा?” बुद्ध का संक्षिप्त उत्तर था, ”अप्प दीपो भव।” (अपना दीपक स्वयं बनो)। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक चरण में जब हिंदू समाज के दलित वर्ग को कुटिल रणनीति के द्वारा बार-बार धर्म परिवर्तन कर समाज में बराबरी के हक हासिल करने के लिए उकसाया और भरमाया जा रहा था तो डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने उन्हें बौद्ध हो जाने के लिए प्रेरित करते हुए ”अप्प दीपो भव” का मूलमंत्र आत्मसात करने को कहा था। स्वतंत्र भारत में वही समाज अब ज्ञान, विज्ञान, राजनीति और उद्यम में किसी से पीछे नहीं है।
गत दिनों श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में गौतम बुद्ध के जन्म और निर्वाण के पवित्र दिवस बुद्ध पूर्णिमा को दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय ‘वेसाक महोत्सव’ का भव्य आयोजन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्य अतिथि की आसंदी प्रदान कर भारत को विशेष महत्व दिया गया। उस महोत्सव में विश्व के बौद्ध मतावलम्बी देशों के साथ ही उद्विग्न यूरोप, अमेरिका, लेटिन अमेरिका तथा एशियाई एवं अफ्रीकी देशों के वे प्रबुद्धजन भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे, जो मानते हैं कि वर्तमान समय में अशांति और हताशा के कोहरे में भटकती मानव जाति की मुक्ति बुद्ध दर्शन की शरण में जाने में ही है। नास्तिक भी उस विश्व महोत्सव में ‘बुद्धं शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि ‘ के समवेत उच्चार में सम्मिलित पाए गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चतुर राजनेता की भांति ‘वेसाक महोत्सव’ भारतीय संस्कृति में रचे-बसे शाक्य मुनि के कमलसूत्र को अपने राजनय की छतरी बना कर भारत के अनेक हितों को साधने में आरंभिक सफलता प्राप्त की। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के साथ दोनों देशों में मैत्री की सहमति विकसित की। कोलंबो में चीन ने भारी निवेश के द्वारा अपने सामरिक अड्डे बनाने की जो शुरुआत महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में की थी, उसमें थोड़ा विराम लगा है।
इस दौरान श्रीलंका ने फिलहाल चीन की पनडुब्बी कोलंबो बंदरगाह में तैनात करने को टाल दिया था। राजपक्षे के कार्यकाल में भारतीय मूल के तमिलों का जो भीषण नरसंहार हुआ था, उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, परंतु तमिल बहुल क्षेत्रों में जो विध्वंस हुआ था, वहां पुनर्निर्माण और पुनर्वास कार्यों को भारत की सहायता से गतिशील किया जाएगा। यानी जख्मों पर मरहम लगाने का काम शुरू होगा।
सामरिक रणनीति की दृष्टि से त्रिंकोमाली में तेल टैंकों के भंडारण और संयुक्त परिवहन पर हुआ अनुबंध भारत के हित में है। इनके अलावा श्रीलंका को समुद्र में केबल डालकर भारत विद्युत की आपूर्ति करेगा। भारत पहले ही नेपाल, बंगलादेश और भूटान को विद्युत आपूर्ति कर रहा है। भारत-श्रीलंका में समुद्री मार्ग से परिवहन को बढ़ावा दिया जायेगा। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा दोनों देशों में नौकायन सेवाएं शुरू करने में रुचि दिखाई जा रही है। भारत और श्रीलंका के बीच 26 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन बिछाने का निर्णय अंतिम चरण में है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में तमिल चीतों के साथ ही जिन लगभग 40,000 भारतीय मूल के तमिलों का नृशंस संहार हुआ था, उनके परिजनों और स्वजातीय समूहों के घाव इतने गहरे हैं कि उन्हें सहज ही भरा नहीं जा सकता। उनके परिवारों के जो व्यक्ति शेष रह गये हैं, उनके पुनर्वास और श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए भारत को खुले हाथ से सहायता देनी होगी।
स्थायी शांति की बहाली के लिए गौतम बुद्ध के जीवन-दर्शन का भावनात्मक महत्व हो सकता है। तमिलों और सिंहलियों में हिंसक टकराव की चार-पांच दशकों की पृष्ठभूमि सर्वज्ञात है। एक बार राजपक्षे ने चीन की सामरिक मदद से उसे कुचल अवश्य दिया, परंतु उससे समस्या

रमेश नैयर

रमेश नैयर

का स्थायी समाधान नहीं हो पाएगा। दबे-कुचले तमिलों में क्षोभ और आक्रोश की चिंगारियां पूरी तरह से बुझ नहीं पाई हैं। इस दिशा में भी श्रीलंका को भारत के आर्थिक, राजनीतिक और राजनयिक सहयोग की आवश्यकता है। विश्वास किया जाना चाहिए कि भारत के तमिल राजनेताओं को विश्वास में लेकर प्रधानमंत्री निश्चय ही कोई सुविचारित नीति बना रहे होंगे। प्रधानमंत्री को तमिल मन की बुनावटों को भी समझना होगा।
जो हश्र तमिल आत्मघाती महिला दस्ते के हाथों राजीव गांधी का हुआ, उससे भी सबक लेना चाहिए। राजीव गांधी पर श्रीलंकाई सैनिक द्वारा किये गये हमले के प्रयास के 28 वर्षों के अंतराल के बाद 2015 में श्री मोदी ने श्रीलंका की यात्रा से टूटते हुए रिश्तों को जोड़ने का सार्थक प्रयास किया था। तब से दोनों देशों में संपर्क, संवाद और मेलजोल का सिलसिला बढ़ता गया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


Comments Off on संस्कृति के सहारे राजनय की राह
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.