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संवाद-विकास का सेतु

Posted On May - 28 - 2017

सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति भी
Edit-1राजग सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम-अरुणाचल की जनता को देश के सबसे लंबे पुल की सौगात दी है जो किसी हद तक समावेशी विकास यानी सबका साथ-सबका विकास के लक्ष्य को भी पूरा करता है। सदियों से असम के ढोला व अरुणाचल के सादिया के लोग नाव के जरिये आपस में जुड़ते थे, वो भी केवल दिन में। बरसात में तो ब्रह्मपुत्र नदी कहर बरपाती रही है। अब इस पुल के बनने से जहां यात्रा में दस से अधिक घंटे कम लगेंगे, वहीं रोज दस लाख रुपये के ईंधन की बचत होगी। सामरिक दृष्टि से संवेदनशील अरुणाचल को जोड़ने में इतनी देर क्यों हुई, सत्ताधीशों को देश की जनता को जवाब देना चाहिए। बहरहाल, प्रतीकों के जरिये जनता से संवाद करने में माहिर प्रधानमंत्री द्वारा सादिया में जन्मे लरजती अावाज के गायक भूपेन हजारिका का नाम पुल को दिये जाने से क्षेत्र की जनता इससे जुड़ाव महसूस करेगी। ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी लोहित की लहरों की गरज हजारिका के गीतों में अकसर उभरती रही है। महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि चीन की आंखों की किरकिरी बने अरुणाचल तक इस पुल के जरिये टैंक व अन्य भारी भरकम हथियारों को जरूरत पड़ने पर पहुंचाया जा सकेगा। महत्वपूर्ण यह  भी है कि पूर्वोत्तर भारत देश की मुख्य धारा से जुड़ रहा है। पुल के बनने से न केवल भौगोलिक बाधाएं ही दूर होंगी बल्कि क्षेत्र का अर्थ तंत्र भी तेजी से बदलेगा। इससे पूर्वोत्तर व अरुणाचल के पर्यटन उद्योग को भी आशातीत सफलता मिल पायेगी। सही मायनो में क्षेत्र के सर्वांगीण विकास का सपना आजादी के सात दशक बाद पूरा होने जा रहा है।
मोदी सरकार की इस बात के लिये सराहना की जानी चाहिए कि विकास की जड़ता तोड़ने के लिये उसने सार्थक प्रयास किये हैं। हालांकि कई योजनाएं यूपीए सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई थीं, मगर उनकी विसंगतियां दूर करने और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था देने का प्रयास राजग सरकार के दौरान हुआ। इसने देश में नये सपने जगाये और उस दिशा में तेजी से बढ़ने का साहस भी दिखाया। आज भी कई दुर्गम इलाके देश की मुख्यधारा से कटे हुए हैं जो सामरिक दृष्टि व नागरिक सुविधाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पिछले दिनों जम्मू व कश्मीर के बीच बनी लंबी भूमिगत सुरंग क्षेत्र के विकास को नये आयाम देने वाली साबित होगी। अभी भी इस दिशा में बड़े कदम उठाने की जरूरत है। ऐसे दौर में जब साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिये चीन भारतीय सीमा से लगे इलाकों में सड़क, रेल व पुलों का जाल बिछा रहा है, हमें अपनी सामरिक योजनाओं के क्रियान्वयन में तनिक भी विलंब नहीं करना चाहिए। विकास प्राथमिकता होनी चाहिए मगर सामरिक लक्ष्य बिल्कुल नजरअंदाज नहीं होने चाहिए। यह ध्यान में रखते हुए कि बासठ की लड़ाई के जख्म अभी भरे नहीं हैं। सही मायनो में नयी योजनाएं शुरू करके विकास की जड़ता पर प्रहार करने की जरूरत है। यह ध्यान रखते हुए कि पुल व सड़कें जहां लोगों में संपर्क व संवाद को बढ़ावा देती हैं वहीं देश की आर्थिक समृद्धि में भी बड़ा योगदान देती हैं। दरअसल बदले हालात में विकास का नया मुहावरा गढ़ने की जरूरत है ताकि समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके। लोग न केवल मोदी सरकार की ओर उम्मीदों से देख रहे हैं बल्कि उनकी हर मुहिम में कदमताल करने को तैयार हैं। जिसको मोदी सवा करोड़ देशवासियों को अकसर नमन करके जताते भी हैं।


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