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वाटर फुटप्रिंट से आंकिए पानी की खपत

Posted On May - 23 - 2017

संकट की आहट

शशि शेखर
12305cd _Water_Footprint_1024x768दो आंकड़े हैं। एक 1951 का और दूसरा 2001 का। भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता जहां 1951 में 14180 लीटर थी, वो अब 5120 लीटर हो गई है। साल 2025 तक यह उपलब्धता घट कर करीब 3 हजार लीटर रह जाएगी। तो सवाल है कि फिर क्या होगा? दुनिया भर में कार्बन की खपत की मात्रा क्या है, इसकी जानकारी के लिए दुनिया भर में कार्बन फुटप्रिंट का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, मानवीय हस्तक्षेप के कारण पानी की खपत कहां और कितनी हो रही है, इसे जानने के लिए आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में है, जिसका नाम है वाटर फुटप्रिंट। वाटर फुटप्रिंट बताता है कि आप अपनी जिन्दगी में हर दिन किन स्रोतों से कितने पानी की खपत कर रहे हैं।
पिछले बीस सालों में भारत में बोतलबन्द पानी के व्यापार में जो तेजी और तरक्की आई है, वो आश्चर्यजनक है। क्या आपको पता है कि जब आप एक बोतल पानी खरीद कर पीते हैं, तब आप उस पानी को कितनी कीमत पर खरीदते हैं और आप कितना लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं। मसलन, एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है। एक डाटा के मुताबिक दुनिया भर में साल 2004 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया था। भारत में भी ऐसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया। यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से लेकर केरल के गांव वाले इन बोतलबन्द कंपनियों और कोला कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।
कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा का इस्तेमाल होता है। घरेलू इस्तेमाल में पानी का सिर्फ 5 फीसदी ही खर्च होता है। इसके अलावा, भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700 लीटर पानी खर्च होता है। यानी, अगर हमारे परिवार में एक दिन में एक किलो गेहूं की खपत होती है तो हम उसके साथ करीब 1700 लीटर पानी की भी खपत करते हैं। एक कप कॉफी के साथ हम असल में 140 लीटर पानी भी पीते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर। इसे आप आभासी खपत कह सकते हैं।
आज, मिस्र दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जो गेहूं आयात करता है और चीन भी अब खाद्य उत्पादों का बड़ा आयातक बन गया है। सवाल है कि चीन या मिस्र ऐसा क्यों कर रहे हैं। जवाब बहुत ही साधारण है। इन दोनों देशों ने ऐसी सभी फसलों का उत्पादन बहुत ही कम कर दिया है, जिसमें पानी की खपत सबसे ज्यादा होती है। कोई देश पानी बचाने के लिए फसल ही न उगाएं और उसकी जगह उसे दूसरे देशों से आयात करें तो इससे समझा जा सकता है कि जल संकट को लेकर दुनिया में क्या चल रहा है।
भारत के सन्दर्भ में इसे ऐसे समझ सकते हैं।  साल 2014-15 में भारत ने करीब 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया। अब 37 लाख टन बासमती चावल उगाने के लिए 10 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च हुआ। इसे अब ऐसे भी बोल सकते हैं कि भारत ने 37 लाख टन बासमती के साथ 10 ट्रिलियन लीटर पानी भी दूसरे देश में भेज दिया, जबकि पैसा सिर्फ चावल का मिला।
वाटर फुटप्रिंट है क्या? लोग पीने, खाना पकाने और कपड़े धुलने के लिए पानी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, इससे अधिक पानी वे अनाज उपजाने, कपड़े का निर्माण करने, कार बनाने और कम्प्यूटर बनाने में करते हैं। वाटर फुटप्रिंट ऐसे ही हर एक उत्पाद और सेवा, जिसका हम उपभोग करते हैं, उसमें इस्तेमाल किए गए पानी की गणना करता है। वाटर फुटप्रिंट हमारे सामने कई सारे सवाल उठाता है। जैसे किसी कंपनी में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी का स्रोत क्या है? इन जल स्रोतों की रक्षा के लिए क्या उपाय हैं? क्या हम वाटर फुटप्रिंट घटाने के लिए कुछ कर सकते हैं?
वाटर फुटप्रिंट के तीन घटक हैं। ग्रीन, ब्लू और ग्रे। एक साथ मिलकर ये घटक पानी इस्तेमाल की असल तस्वीर दिखाते हैं। मसलन, इस्तेमाल किया पानी बारिश का पानी है, सतह का पानी है या भू-जल है। वाटर फुटप्रिंट किसी प्रक्रिया, कंपनी या क्षेत्र द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पानी की खपत और जल प्रदूषण को बताता है। ग्रीन वाटर फुटप्रिंट मिट्टी की परत में छुपा पानी है, जिसका इस्तेमाल कृषि, हार्टिकल्चर या जंगल द्वारा होता है। ब्लू वाटर फुटप्रिंट ग्राउंड वाटर है। इसका इस्तेमाल कृषि, उद्योग और घरेलू काम में होता है। ग्रे वाटर फुटप्रिंट ताजा जल (फ्रेश वाटर) की वह मात्रा है जिसकी जरूरत प्रदूषक हटा कर जल की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए होती है।
पानी का संकट आज वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी संबंधित है। कई देशों ने तो अब अपने वाटर फुटप्रिंट को कम करने के लिए ऐसे उत्पादों को दूसरे देश से मंगाना शुरू कर दिया है, जिसके उत्पादन में पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है। तो क्या अब यह जांचने का वक्त नहीं आ गया है कि हमारा वाटर फुटप्रिंट क्या है? क्या हम भी अपना वाटर फुटप्रिंट नहीं घटाएंगे?


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