भगौड़े को पकड़ने गयी पुलिस पर हमला, 3 कर्मी घायल !    एटीएम को गैस कटर से काट उड़ाये 12.61 लाख !    कुल्लू में चरस के साथ 2 गिरफ्तार !    बारहवीं की छात्रा ने घर में लगाया फंदा !    नेपाल को 56 अरब नेपाली रुपये की मदद देगा चीन !    इस बार अब तक कम जली पराली !    पीएम की भतीजी का पर्स चुरा सोनीपत छिप गया, गिरफ्तार !    फरसा पड़ा महंगा, जयहिंद को आयोग का नोटिस !    महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में प्रचार करेंगी मायावती !    ‘गांधीजी ने आत्महत्या कैसे की?’ !    

रिश्तों की गरिमा का रचनाकर्म

Posted On May - 20 - 2017

बलराम
12005cd _suresh uniyalउत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 4 फरवरी, 1947 को जन्मे सुरेश उनियाल की कहानियों में अनुभव और पर्यवेक्षण की रचनात्मक समृद्धि के साथ मानवीय संबंधों की गरिमा अपनी उपस्थिति दर्ज कराती चलती है। फंतासी रचने में इनका कोई जवाब नहीं। नेशनल बुक ट्रस्ट के यूनेस्को कूरियर जैसे अंतर्राष्ट्रीय पत्र से शुरू होकर सारिका, दिनमान और सांध्य टाइम्स तक विविध विषयक पत्रकारिता करने वाले सुरेश उनियाल ने कई दर्जन किताबों के अनुवाद तो किए ही, सत्तर से अधिक यादगार कहानियां भी हिंदी को दी हैं। पांच कहानी संग्रहों में से ‘यह कल्पना लोक नहीं’ के लिए इन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली ने सम्मानित किया है। पेश है उनसे हुई वार्ता।
आपको लेखक बनना है, यह निर्णय लेने की घड़ी कब और कैसे बनी?
लेखक बनने का विचार मेरे मन में पहले से नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद एक लंबा अरसा बेरोजगारी में गुजरा। पिता का निधन हुए काफी समय गुजर चुका था। मां किसी तरह गृहस्थी की गाड़ी खींच रही थी। मजबूरी में उसे नौकरी करनी पड़ रही थी। महिलाओं का नौकरी करना आज आम बात है, लेकिन उन दिनों देहरादून जैसे छोटे शहर में पहाड़ी समाज के निम्नमध्यवर्गीय परिवारों में ऐसा नहीं होता था। उन हालात में सबकी निगाहें मुझ पर थीं और मुझे नौकरी नहीं मिल पा रही थी। चीन और पाकिस्तान से हुए युद्ध के बाद भारत आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। नौकरियों का जैसे अकाल पड़ गया था। परिचितों में से जो भी मुझे मिलता, उसका हर सवाल मेरी नौकरी को लेकर होता। इन सवालों से बचने के लिए उन दिनों मैंने अपने आपको एक तरह से घर में बंद कर लिया था। मेरे लिए राहत की बात यह थी कि मां ने कभी मेरे ऊपर नौकरी के लिए दबाव नहीं डाला, क्योंकि अपना खर्चा निकालने के लिए ग्रेजुएशन के समय से ही मैं ट्यूशन पढ़ा रहा था। खाली वक्त में किताबें पढ़ा करता। बेरोजगारी और दूसरों के तानों से भीतर की तकलीफें बढ़ीं। जब उन्हें रिलीज किया जाना जरूरी लगा तो उन्हें कागज पर उतारने लगा। दिल्ली में चाचा जी रहते थे। कृषि मंत्रालय की पत्रिका के संपादक थे। वे देहरादून आए तो मैंने उन्हें अपनी कहानियां दिखाईं। वे उन्हें अच्छी लगीं। तब लगा कि मैं भी लिख सकता हूं। उनके माध्यम से ही देहरादून के साहित्यिकों की छोटी-सी दुनिया से मेरा परिचय हुआ।
उस समय के साहित्यिक वातावरण के बारे में कुछ बताएंगे?
उस समय देहरादून में हर महीने के पहले इतवार को साहित्य संसद की गोष्ठियां होती थीं जिसमें देहरादून के लगभग सभी लेखक आते थे। जाने-माने लेखकों में ब्रह्म देव, शशिप्रभा शास्त्री, हरिदत्त भट्ट शैलेश आदि प्रमुख थे। ब्रह्म देव का नाम लेखक की बजाय फोटोग्राफर के रूप में ज्यादा जाना जाता है। ये सभी लोग काफी वरिष्ठ थे। नए लेखकों को स्वीकार करना उनके लिए आसान न था, इसलिए कहानियों की जमकर खिंचाई हुई। यह एक तरह से अच्छा ही हुआ। मेरी पीढ़ी के मनमोहन चड्ढा, अवधेश कुमार और देशबंधु थे। कुछ समय बाद सुभाष पंत भी हमारी टीम में शामिल हो गए। साहित्य संसद के मुकाबले के लिए हमने संवेदना की गोष्ठियां शुरू कीं। उसमें कई नए लोग जुड़े—नवीन नौटियाल और शुभाशीष घोष तो थे ही, गुरदीप खुराना, जो नौकरी के कारण बाहर थे, लौटकर वह भी साथ आ गए।
पहली रचना कहां छपी?
पहली रचना कौन-सी थी, यह बता पाना तो संभव नहीं है। जो कुछ लिखा था, उनमें से ज्यादातर को तो खुद ही खारिज भी करता चला गया। छांटकर जो कुछ बचा, उन्हें कुछ पत्रिकाओं को भेजा। ज्यादातर लौट आयीं। पहली कहानी जो छपी, वह अनिश्चय थी, जिसे वाराणसी से कमल गुप्त के संपादन में निकलने वाली पत्रिका कहानीकार ने छापा था। उसे ही मैं अपनी पहली कहानी मानता हूं। उसी के आसपास शरद देवड़ा ने अणिमा और नरेंद्र कोहली ने अतिमर्ष में कहानियां छापीं थीं।
देहरादून से दिल्ली आना कैसे हुआ?
मैं देहरादून में ही नौकरी करना चाहता था, लेकिन वहां कोई नौकरी थी ही नहीं। छह साल की बेरोजगारी झेलने के बाद अंतत: दिल्ली आने का निर्णय लेना पड़ा। यहां चाचाजी थे ही। उन्होंने नौकरी तलाशने में मदद की और रमेश उपाध्याय की मदद से पर्सपेक्टिव पब्लिकेशंस की पत्रिका मुक्तधारा के संपादकीय विभाग में काम मिल गया। इसी प्रकाशन से अंग्रेजी में मेनस्ट्रीम निकलती थी। वहां कुछ महीने काम करने के बाद नेशनल बुक ट्रस्ट में नौकरी मिल गई। यहां रमेश बक्शी के मार्गदर्शन में यूनेस्को कूरियर के हिंदी संस्करण में काम करने का मौका मिला, जहां सन‍् 1977 में टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिका सारिका ज्वाइन करने तक रहा।
पहली किताब कब और कैसे छपी?
मेरी पहली किताब दरअसल सन‍् 1978 में सामयिक प्रकाशन से छपी थी। प्रकाशक जगदीश भारद्वाज से मुझे शेरजंग गर्ग ने मिलवाया था। मुलाकात तो सन‍् 1976 में हो गई थी और वे तभी किताब छापने के लिए तैयार थे, लेकिन उसी दौरान मुझे सारिका ज्वाइन करने के लिए मुंबई जाना पड़ गया। सन‍् 1978 में जब सारिका दिल्ली आ गई तो किताब छपने की बात आगे बढ़ी। यह भी संयोग रहा कि उसी साल सारिका के हम तीन लोगों की पहली किताबें छपीं—मेरा कहानी संग्रह दरअसल, रमेश बत्तरा का नंग-मनंग और अवधनारायण मुद्गल का कबंध।
फिल्म और खेल पत्रकारिता से क्या पाते रहे?
फिल्मों का शौक पुराना रहा है, बचपन के समय का ही, जब स्कूल से भागकर बहुत-सी फिल्में देखीं। मेरे दोस्त मनमोहन चड्ढा पुणे फिल्म संस्थान में काम करने लगे तो उन्होंने मुझे फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स करने की सलाह दी। उस दौरान फिल्म के इतिहास की जानकारी हुई। फिल्म को समझने का एक नजरिया मिला। लौटकर आया तो गंभीरता से फिल्मों पर लिखने लगा। सारिका के अलावा दिनमान में भी विनोद भारद्वाज के लिए के लिए काफी लिखा। सांध्य टाइम्स में आकर तो पाया कि वहां साहित्य तो है ही नहीं तो फिल्मों में ही शरण मिली। दस साल तक सांध्य टाइम्स के लिए फिल्म समीक्षाएं लिखीं। सन‍् 1930 और 1940 के दशक की फिल्मों पर एक किताब लिखी। जहां तक खेलों पर लिखने की बात है, दिनमान में खेलों का स्तंभ देखा करते थे योगराज थानी। उनके साथ खेलों पर खूब बात होती थी। एक दिन उन्होंने कहा कि जो कुछ कह रहे हो, वह लिख भी डालो। एक बार लिखकर दिया तो फिर वे लिखवाते रहे और मैं लिखता रहा।


Comments Off on रिश्तों की गरिमा का रचनाकर्म
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.