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मैनचेस्टर का सबक

Posted On May - 24 - 2017

ईमानदार समन्वित संघर्ष जरूरी

Edit-1आतंकवाद के सबसे बर्बर चेहरे आईएसआईएस द्वारा मैनचेस्टर ब्लास्ट की जिम्मेदारी लेने तथा सोशल मीडिया पर उसके समर्थकों की प्रतिक्रियाओं से इस कायराना करतूत के पीछे की हिंसक नफरत वाली मानसिकता साफ-साफ उजागर हो जाती है। बेशक मजहब के नाम पर निर्दोषों की हत्याओं का यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है, लेकिन इससे सही सबक शायद अभी भी सीखना शेष है। यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला कर चुके ब्रिटेन के तीसरे बड़े शहर मैनचेस्टर में एक आत्मघाती हमलावर ने तब खुद को विस्फोटक से उड़ा लिया, जब वहां मशहूर अमेरिकी पॉप गायिका अरियाना ग्रैंड का कार्यक्रम समाप्त हुआ ही था। स्वाभाविक ही तब दर्शक, जिनमें किशोर और युवा बड़ी संख्या में थे, आयोजन स्थल से निकलने की कोशिश कर रहे थे। आईएस और उसके समर्थकों ने 22 निर्दोषों की जान ले लेने वाले इस ब्लास्ट को मोसुल में ब्रिटिश एयरफोर्स द्वारा की गयी बमबारी में बच्चों की मौत का बदला बताया है। मोसुल और मैनचेस्टर की इस तुलना पर बहस का स्वीकार्य निष्कर्ष आसान नहीं, लेकिन दोनों के चरित्र में फर्क कर पाना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। मोसुल में आतंकी ठिकानों पर बमबारी अमेरिका और उसके मित्र देशों द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध अभियान का हिस्सा है, जबकि मैनचेस्टर की घटना विशुद्ध आतंकी हमला।
आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि चुनाव से कुछ ही पहले ब्रिटेन में हुए इस आतंकी हमले के बाद राजनीतिक दलों ने प्रचार अभियान स्थगित कर दिया है। हालांकि 12 साल के अंतराल के बाद ब्रिटेन में यह बड़ा आतंकी हमला हुआ है, लेकिन जरूरत इस जांच की भी है कि निगरानी में होते हुए भी सलमान आब्दी इसे कैसे अंजाम दे पाया? लीबिया मूल के शरणार्थी आब्दी ने ब्रिटिश नागरिकता ली हुई थी। जाहिर है, इससे शरणार्थियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उसके गिरफ्तार साथी से कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं मिल सकती हैं, लेकिन जरूरत इस दिनोंदिन गहराते खतरे की असल चुनौतियों को समझने और उनसे निपटने की कारगर व्यावहारिक रणनीति बनाने की है। ऐसा तभी संभव हो पायेगा, जब दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली आतंकी घटना को समान गंभीरता से लिया जायेगा और आतंकवाद को प्रोत्साहन-संरक्षण देने वाले देशों पर भी नकेल कसी जायेगी। कहना नहीं होगा कि एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी आतंकवाद विरोधी अभियान के वांछित परिणाम न निकलने का एक बड़ा कारण इसके स्वयंभू अगुवाओं की कथनी-करनी में बड़ा अंतर भी है।


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