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मनोभावों को स्पर्श करती कहानियां

Posted On May - 27 - 2017

कृष्णलता यादव
10605cd _image_ 00 (41)ʻस्याही में सुर्खाब के पंखʼ अल्पना मिश्र की सात कहानियों का संकलन है। लेखिका ने सामाजिक मनोविज्ञान को अपने अनुभव के पैमाने पर माप-तराश कर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। दुनियावी सम्बंधों के उतार-चढ़ाव की ये कहानियां मानव मन की कमियों-खूबियों, पात्रों के त्याग-संघर्ष, राजनैतिक भ्रष्टाचार के चित्र पेश करती चली हैं। स्त्री जीवन की चिंता इन कहानियों का मूल स्वर है।
ʻस्याही में सुर्खाब के पंखʼ शीर्षकधर्मा सुदीर्घ कहानी अभिव्यक्ति का विशेष कौशल लिए हुए है। स्त्री जीवन की विवशताओं का वर्णन मार्मिकता लिए हुए है जहां लड़कियों द्वारा प्यार किया जाना अपराध की श्रेणी में गिना जाता है वहां विधवा सोनपती बहनजी अपनी चार पुत्रियों को अनुशासन में रखने के लिए माचिस की तीली से उनके पैरों पर बिंदी लगाती है और कसम रखवाती है कि कितना भी बांका, दिलकश नौजवान हो, उन्हें प्रेम के चक्कर में नहीं आना है। अन्तत: एक दिन चारों पुत्रियां जल मरती हैं।
इस कहानी में लेखिका ने समानान्तर घटनाक्रम की एक और कहानी को स्वाभाविकता से उभारा है। चेयरमैन का बेटा अपने पिता के राजनैतिक कद के बलबूते मनमानी करता है और कानून से साफ बच निकलता है। खमियाजा भुगतती है वह लड़की जिसके पास राजनैतिक संबल नहीं है। कहानी का अंत अति मार्मिक है और एक जोरदार अपील भी करता है कि महिलाओं को एकजुट होना होगा, किसी एक बिन्दु पर मिलना होगा ताकि जीवन की त्रासदियों से मुक्ति मिल सके अन्यथा कदम-कदम पर भेदिए होंगे, जो कहीं भी स्त्री को नारकीय स्थितियों में धकेलते रहेंगे और उसकी विवशताओं से रस प्राप्त करते रहेंगे।
लीक से हटकर लिखी गई चीन्हा-अनचीन्हा में स्पष्ट किया गया है कि संसार की लीला निराली है। यहां स्थायी तौर पर कुछ भी चीन्हा या अनचीन्हा नहीं है। हर घटनाक्रम पर समय परिवर्तनशीलता का ठप्पा लगाता चलता है। सुनयना, तेरे नैन बड़े बेचैन कहानी स्त्री-जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराती है। कहानी ध्यान चाहती है कि सुनयना के नैनों का चैन किसने चुरा लिया? क्यों स्त्री केवल औरों के हित जीती रहती है? औरतें क्यों भूल जाती हैं कि उन्हें कैसा होना चाहिए? क्यों वे नींद भर नहीं सोतीं, चैन भर नहीं देखतीं, पेट भर नहीं खातीं और मन भर नहीं जीतीं? उनके पाले हुए लड़के भी उन्हें छोड़कर उनके आकाओं के पाले में जा खड़े होते हैं। भला क्यों? क्यों?
राग-विराग कहानी का पूर्वार्द्ध सरकारी योजनाओं की विफलता का कारण बताता है वहीं उतरार्द्ध मानव स्वभाव की उत्कृष्टता तथा सहृदयता से भरपूर है। इस प्रकार कहानी में सामाजिकता का जगमगाता टापू भी है जिसकी कौंध दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का संदेश मुखरित करती है। इन दिनों कहानी दाम्पत्य जीवन की परिक्रमा-सी करती है जिसमें गृहस्थ जीवन का स्वाभाविक व व्यंग्यपूर्ण चित्रण है। जिंदगी रूपी नदी का पाट सदा सरसीला नहीं होता। यह सत्य उजागर करती नीड़ कहानी पढ़कर मुख से यही निकलता है–जिंदगी, तेरे रूप अनेक। आकुलता तेरे अंग-संग बसी है और तू वैसी नहीं, जैसी दिखाई देती है।
कहानियों के पात्र त्याग व संघर्ष की जिंदगी जीते हुए जीवटता का संदेश देते हैं। भाषा अनावश्यक आलंकारिकता के बोझ से मुक्त किंतु प्रसंगानुकूल, सरस व दृश्यांकन करने में सक्षम है। कहानियां आत्मकथात्मक, वर्णनात्मक, संवादात्मक व चेतन प्रवाह शैली में हैं। पाठक एक बार कहानी पढ़ना शुरू करता है तो पढ़कर ही दम लेता है।
0पुस्तक : स्याही में सुर्खाब के पंख 0लेखिका : अल्पना मिश्र 0प्रकाशक : राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली 0पृष्ठ     संख्या : 128 0मूल्य : ~ 125.   


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