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भीतर की बेचैनी से भाषा में हड़बड़ी

Posted On May - 19 - 2017

शंभूनाथ शुक्ल

11905cd _AAEAAQAAAAAAAANpAAAAJDcxN2Y2NDdiLThmZWQtNGIxZS04NjVkLTVkYTc2NGI4ZTVlNwसोशल मीडिया ने भाषा को भ्रष्ट किया है। इस भ्रष्ट भाषा के चलते हर भाषा अपनी अस्मिता खोती जा रही है और उसमें लालित्य की बजाय एक तरह की हड़बड़ी आ गई है, जिसमें न तो चिंतन है, न मनन और न ही संस्कार। यह भाषा नहीं, एक तरह की उत्तेजना है जिसे रोड रेज की तरह माउथ रेज कहा जा सकता है। जैसे रोड रेज में हर गाड़ी वाले को आगे निकलने की हड़बड़ी होती है। इस कारण वह अंटशंट बकने लगता है। ठीक उसी तरह सोशल मीडिया में भी आदमी अपनी सारी मर्यादाएं भूलकर ऐसी हड़बड़ी करने लगता है।
जैसे कि रोड रेज होता है, ठीक वैसे ही माउथ रेज भी होता है। यानी हमें कुछ न कुछ ठोक देना है, भले हम सामने वाले की बात का आशय समझे हों अथवा नहीं। कई बार तो कोई और बोले, इसके पहले ही हमें बोल देना है ताकि पता चल सके कि हम नादान नहीं हैं। हिंदी में इसके लिए सभ्य शब्द तो कोई नहीं है पर हम अपनी सुविधा के लिए इसे बकलोली कह सकते हैं। यानी बिना कुछ समझे-बूझे बोल देना।
इस बकलोली में पहले अड्डेबाजी हुआ करती थी और अब फेसबुकबाजी या ट्विटरबाजी। भले यहां बोलने की बजाय लिखा जाए लेकिन कुछ भी लिखकर समाज के अंदर फैलाने से जिस तरह की खुशी होती है वह बकलोली से कम तो नहीं। बोलने अथवा लिखने में है बस शब्दों का ही कमाल। पर यह कमाल दिल से ज्यादा निकलता है बजाय दिमाग इस्तेमाल करने के। चूंकि सोशल मीडिया में बहुत कुछ वैसा सुनने व पढ़ने को मिलता है जो आमतौर पर लीक से हटकर होता है, इसलिए प्रतिक्रिया में अकसर नहले पर दहला मार दिया जाता है बगैर यह सोचे कि इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। इस बकलोलबाजी से असहनशीलता बढ़ने लगती है और यह असहनशीलता बढ़ते हुए समाज में नासूर की तरह फैल जाती है। बनारस में एक मोहल्ला है असी। इस असी में असी घाट के नजदीक पप्पू चाय की दुकान है जहां चाय पीते हुए बकलोली करते आज भी युवाओं से लेकर किशोरों तक को देखा जा सकता है। कोई भी विषय हो, इस चाय की दुकान में हर समस्या का समाधान है।
कई बार तो लगता है कि भांग के नशे में आदमी क्या का क्या बोल देता है। ठीक वैसा ही नशा सोशल मीडिया का है। फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स अप ने एक ऐसा हथियार आदमी को मुहैया करा दिया है कि वह अपनी सारी भड़ास इसी माध्यम से व्यक्त करने लगा है। बोला हुआ शब्द चाहे कम मार करे पर लिखा हुआ शब्द ज्यादा तीखी मार ही नहीं करता बल्कि ऐसी मार करता है, जिसका असर तात्कालिक ही नहीं, सालों तक दीखता है। आप कुछ भी ऐसा लिखिए जो लीक से हटकर हो तो पता चलता है कि तत्काल सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। कोई आपको देशद्रोही, धर्मद्रोही और जातिद्रोही बताने में लग जाता है तो कोई आपको प्रतिक्रियावादी, रूढ़िवादी और लकीर का फकीर बताने में। मजे की बात कि लिखा हुआ मैटर एक ही लेकिन प्रतिक्रिया भिन्न स्रोतों से अलग-अलग। यानी कोई भी विवेकपूर्ण बात सुनने की या पढ़ने की क्षमता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। हमारे कान बस वही सुनना चाहते हैं जो हमें पसंद हो अथवा जो हमारी रुचि के अनुसार लिखा गया हो।
हर समाज की संस्कृति उसके उत्पादन के साधन और उसकी भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होती है। अब भौगोलिक स्थिति तो अचानक बदलती नहीं पर उत्पादन के साधन जरूर तेजी से बदल जाते हैं। आज जिस तरह मध्य वर्ग को अपनी लाइफ स्टाइल और मूल्यों को बनाए रखने के लिए दिन-रात जूझना पड़ता है और परिवार के हर सदस्य को आय का जरिया तलाशने पर जोर देना पड़ता है, उस वजह से उसकी आंतरिक खुशी में कमी आई है। सुबह उठकर आफिस के लिए घर से निकलने से लेकर शाम जल्द घर पहुंचने तक वह बस एक ही चीज देखता है भीड़ और भागते हुए लोग। यह भीड़ और भागमभाग उसके जीवन से विवेक छीन लेती है।
इसमें उसके अपने वैल्यूज होते हैं और अपनी तरह के तमाम ईगो और टैबू। वह कुछ भी अलग हटकर सोचना बंद कर देता है तथा ऐसी हर बात को खारिज कर देता है जो उसके वैल्यूज और भ्रमों को तोड़ती हो। इससे एक तरह की जड़ता आती है और एक ही समझ विकसित होती है। यह जड़ता और एकरस समझ उसे कुछ भी भिन्न देखते ही प्रतिक्रिया करने पर प्रेरित करती है और नतीजा होता है उत्तेजना।


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