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भावनात्मक रूप से जुड़ेंगे लोग

Posted On May - 24 - 2017

शहरी खेती

अभिषेक कुमार

खानपान की शहरी आदतों पर हमारी नजर तभी जाती है जब उससे जुड़ा कोई सर्वेक्षण-अध्ययन हमारे सामने आता है और यह बताता है कि ज्यादातर शहरियों को बीमार बनाने के पीछे उनका आरामतलब लाइफस्टाइल और जंक फूड से भरपूर भोजन है।

खानपान की शहरी आदतों पर हमारी नजर तभी जाती है जब उससे जुड़ा कोई सर्वेक्षण-अध्ययन हमारे सामने आता है और यह बताता है कि ज्यादातर शहरियों को बीमार बनाने के पीछे उनका आरामतलब लाइफस्टाइल और जंक फूड से भरपूर भोजन है।

खानपान की शहरी आदतों पर हमारी नजर तभी जाती है जब उससे जुड़ा कोई सर्वेक्षण-अध्ययन हमारे सामने आता है और यह बताता है कि ज्यादातर शहरियों को बीमार बनाने के पीछे उनका आरामतलब लाइफस्टाइल और जंक फूड से भरपूर भोजन है। इधर, ऐसी एक चिंता अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा ढाई साल तक दिल्ली-एनसीआर के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले सात हजार बच्चों के भोजन को लेकर किए गए व्यापक अध्ययन के नतीजों में की गई है। मुख्य चिंता इसे लेकर है कि ज्यादातर बच्चे एक तो जरूरत से ज्यादा खा रहे हैं और उसमें भी फल-सब्जियां उनके भोजन का हिस्सा नहीं हैं बल्कि उनकी प्राथमिकता में बर्गर, पिज्जा एवं समोसा जैसे जंक फूड हैं।
इस समस्या का एक रोचक संकेत यह है कि चूंकि शहरों में फल-सब्जियों की पैदावार नहीं हो रही, वे उस मात्रा में लोगों को नहीं दिखतीं, जितनी कि जरूरत है। इसलिए उन्हें लेकर बच्चों और युवाओं में कोई प्रेरणा नहीं जगती। शहरी लोग खेत और खेती के बारे में भूल गए हैं। इस समस्या का एक माकूल समाधान यह है कि शहर अपने भीतर सब्जियों की पैदावार की अहमियत को समझें, तभी यह तस्वीर बदलेगी।
बहरहाल, सात हजार बच्चों पर हुए अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि सामान्य बच्चों के मुकाबले चार गुना ज्यादा भोजन करने वाले ये बच्चे मोटापे और डायबिटीज जैसी बीमारियों की जद में आते जा रहे हैं जो बेहद चिंताजनक बात है। सबसे अहम बात यह है कि दिल्ली ही नहीं, देश के ज्यादातर शहरों में अब फल-सब्जियां भोजन के एक प्रेरक तत्व के रूप में मौजूद नहीं हैं, जिससे लोगों में उन्हें लेकर कोई खास रुचि नहीं बची है। दुनिया के कुछ देश इस दिशा में काम कर रहे हैं कि शहरी लोगों का नाता फल-सब्जियों से बना रहे।
एक उदाहरण इस्राइल का है। खेती को तकनीक से जोड़ने में

मिसाल कायम कर चुके इस देश में शहरी खेती की एक नई अवधारणा का विकास किया गया है जो ग्रामीण खेती से अलग है। वहां यह साबित करने की कोशिश की गई है कि शहर का चाहे कोई भी कोना क्यों न हो, वहां खेती मुमकिन है जैसे छतों पर, दीवारों पर, सार्वजनिक भवनों और यहां तक कि सड़कों के बीच और रेलवे पटरियों के बगल में भी। बेशक, शहरी खेती किसी तरह से परंपरागत खेती की जगह नहीं ले सकती लेकिन इसकी पूरक बन सकती है। परंपरागत खेती की तुलना में शहरी खेती बहुत कम जगह लेती है। फसलों के विकास में कम समय लगता है। भारी उपकरणों के साथ काम की जरूरत नहीं है। इसकी उपज में वजन कम और मात्रा ज्यादा होती है।
खेती में इस्राइल में जो ज्ञान विकसित किया गया है, उसे तकनीक के साथ जोड़ा गया है। वहां शहरियों को इसके लिए प्रेरित किया गया है कि कैसे ऑटोमेशन के जरिये कोई व्यक्ति खुद बेहद आसानी के साथ सब्जियां उगा सकता है। वहां ऐसी तकनीक का विकास किया गया है, जिससे परंपरागत खेती के मुकाबले महज 10 फीसदी पानी का इस्तेमाल कर खेती की जा सके। यहां तक कि खारे पानी में भी खेती का इंतजाम किया गया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि ताजा फल और सब्जियों से ज्यादा पोषक तत्व मिलते हैं। जो आबादी हरी पत्तेदार सब्जियां ज्यादा उगाएगी, स्वाभाविक है कि वहां के बच्चे ये सब्जियां ज्यादा खाएंगे।
परंपरागत खेती की उपज और इसके उपभोग करने वालों में दूरी के कारण भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। किसानों की मेहनत की इज्जत नहीं होती। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि पश्चिमी यूरोप में परिवारों में 40% से अधिक भोजन फेंक दिया जाता है। इसकी वजह यही है कि वहां के शहरियों का भोजन से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है। ऐसे में शहरी खेती बदलाव का एक बड़ा आधार हो सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि शहरी खेती में कुछ ही घंटों में भोजन खेत से लेकर प्लेट तक की दूरी तय कर सकता है। इसे मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन चेन से नहीं गुजरना होगा। प्लांट्स की मौजूदगी से शहर के क्लाइमेट में भी बदलाव आएगा।
हमारे देश के शहरियों के फल-सब्जी से टूटते रिश्ते की एक झलक पिछले साल इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन के सर्वेक्षण से मिली थी, जिसमें बताया गया था कि दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहरों में लोग जरूरत के मुकाबले आधी या उससे भी कम फल-सब्जियां खा रहे हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक इसकी न्यूनतम खपत प्रति व्यक्ति पांच यूनिट होनी चाहिए, पर इन शहरों में यह औसत खपत 3.5 है। इसमें 1.5 यूनिट फल हैं और 2.5 यूनिट सब्जियां। हैरानी की बात है कि इस सर्वेक्षण में भी शहरों में फल-सब्जियों की कम उपलब्धता और कम लगाव की बात कही गई थी।


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