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बेबाकी और फकीरी के कवि नागार्जुन

Posted On May - 27 - 2017

शशिधर खान
12705cd _nagarjun_babaहिन्दी में ‘नागार्जुन’ और मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से शिखर की प्रसिद्धि पाने वाले पं. वैद्यनाथ मिश्र साहित्य जगत के एकमात्र हस्ताक्षर हैं। जिनका न केवल संस्कृत बल्कि बंगला में भी हिन्दी के समान अधिकार था। उम्र ढलने से पहले ही नागार्जुन ‘बाबा’ के नाम से मशहूर हो गए थे। चूंकि वे हिन्दी साहित्य के एकमात्र औघड़ थे, इसलिए बाबा कहने से ही लोग समझ जाते थे कि किस साहित्यकार की बात हो रही है। बाबा के जीवन जीने के स्टाइल में और लिखने के अंदाज में सबसे ज्यादा कबीर का प्रभाव मिलता है, इसलिए उन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है।
बाबा नहाते नहीं थे, न ही कभी दांत साफ करते थे और सुविधा सम्पन्न जिंदगी से उन्हें नफरत थी। वे उन्हीं गरीब, उपेक्षित आम लोगों के बीच उठना-बैठना पसंद करते थे, जिन्हें उन्होंने अपनी रचनाओं का पात्र बनाया। दिल्ली जैसे महानगर की चकाचौंध बाबा को कभी आकर्षित नहीं कर पाई। उनका बुढ़ापा भी युवावस्था की तरह ही घूमते-फिरते गुजरा, मगर ज्यादा समय दिल्ली के स्लम इलाके में गुजारते थे। पहले टैगोर पार्क में रहे और फिर बाद में सादतपुर (करावल नगर) में रहने लगे।  कहा जाता है कि बाबा के पास इतने पैसे ही नहीं होते थे कि वे बेहतर स्थिति में रहे सकें, मगर सच्चाई यह है कि बाबा की सारी जिन्दगी समाज के छिद्रों को खुरचने के लिए समर्पित थी। उन्होंने ऐशो-आराम की कभी चाहत नहीं की।
जिस ऐश के लिए राजनीति में जाने का इन दिनों फैशन है, उसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को बाबा ने बख्शा नहीं। वो चाहे जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, जयप्रकाश नारायण हों अथवा कम्युनिस्ट लोग हों। विचारों से थोड़ी कम्युनिस्ट सोच बाबा की जरूर थी और वो कुछ दिनों तक बौद्ध भिक्षु की तरह भदन्त आनंद कौसल्यायन तथा राहुल सांकृत्यायन के संसर्ग में आने के कारण हो सकती है, मगर वे कम्युनिस्ट नहीं बने। बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद जहां ईश्वर के अस्तित्व को नकारा गया है, लेकिन उन्होंने नास्तिकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। हां, पूजा-पाठ के नाम पर कायम हिन्दू समाज की कुरीतियों को दर्शाने वाले कथानक उनकी कृतियों के मुख्य विषय रहे। कम्युनिस्ट नेता और वामपंथी रुझान वाले साहित्यकारों ने जब बाबा को कम्युनिस्ट के रूप में प्रचारित कर दिया तो उन्होंने ऐसे लोगों को जमकर लताड़ा तथा ‘प्रगतिशील’ शब्द पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका मानना था कि जनता के बीच रहकर जनसाधारण के हित में काम करने के लिए किसी वाद को अपनाने की जरूरत नहीं है। दरअसल उन्होंने निम्न और मध्य आय वर्गीय जिन्दगी को काफी करीब से महसूस किया। नागार्जुन का साहित्य संसार बताता है कि एक ओर जहां उन्होंने अपने समय की तमाम समसामयिक घटनाओं पर तीखी, खुरदरी टिप्पणियां कीं और इतनी की कि उनकी छवि ऐसे ही साहित्यकार के रूप में बन गई, वहीं दूसरी ओर तुलसी व कालिदास की शैली में विशुद्ध साहित्यिक पद्यों की रचना करके बाबा ने अपनी विद्वता की धाक जमाई।
बाबा के व्यंग्य का खुरदरापन उनके हर काम से झलकता था। बात 1992 की है, जब बिहार सरकार ने बाबा को राजेन्द्र शिखर सम्मान से सम्मानित किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सम्मान प्रदान करने के साथ-साथ बाबा को च्यवनप्राश का एक डिब्बा यह कहते हुए भेंट किया—‘मैं अपनी मां के लिए ला दिया करता था। रौआ के हम मरे ना देब, रौआ के जियाबे के बा (आपको हम मरने नहीं देंगे, आपको जिलाना है)।’ पुरस्कार समारोह की समाप्ति के बाद पर्यटन विभाग के होटल के कमरे में च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खाते हुए बाबा ने कहा—‘च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, मगर इसका तो मजा ही कुछ और है, सरकारी है न इसलिए। गजब का स्वाद है प्यारे। अभिनय में शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है लालू, देखना, इसकी नटलीला इसे दुबारा मुख्यमंत्री बना देगी।’ बाबा का कहना सही निकला।
कस्बानुमा शहर दरभंगा के अस्पताल में उचित चिकित्सा और देखभाल के अभाव में बाबा अंतिम सांस लेने के दिन से कई महीने पहले अधमरे हो गए थे। लेकिन जिस बिहार को बाबा ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दी, वहां की सरकार का कोई व्यक्ति उनका कभी हालचाल लेने नहीं गया, न ही कोई आर्थिक मदद पहुंचाई। बिहार के कुछ साहित्यकारों द्वारा काफी शोर-शराबा किए जाने के बाद बड़ी मुश्किल से सरकार ने बाबा के इलाज के लिए दो हजार का चेक काटा लेकिन ट्रेजरी में पैसे न होने के कारण चेक भुनाया नहीं जा सका। ये 1992 के उस समय की बात है जब बाबा अपने जिले (दरभंगा) के अस्पताल में बिल्कुल संज्ञाहीन बेजान की तरह बिस्तर पर पड़े रहते थे। न सुन पाते थे, न ही किसी परिचित को गौर से देखने के बाद भी पहचान पाते थे। शुक्र है, मध्यप्रदेश सरकार का, जिसने बिहार सरकार का रुख जानने के बाद बाबा के इलाज का सारा खर्च अपने जिम्मे ले लिया। मुझे बचपन से ही बाबा का सान्निध्य मिला। बाबा ने जनकवि बनने के लिए वैसी भाषा और बोली का इस्तेमाल किया जो कबीर व तुलसी ने अपनायी थी।
‘भस्माकुर’ काव्य तुलसीदास के ‘बरवै रामायण’ की तर्ज पर लिखी हुई है। बाबा के संस्कृत श्लोकों में वर्णित शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग पढ़ते समय लगता है कि मानो कालिदास का ‘कुमारसंभवम‍्’ सामने हो। कर्मकांडी ब्राह्मण कुल में पैदा होने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा संस्कृत माध्यम से हुई। प्राकृत, पालि, बंगला और अंग्रेजी उन्होंने अपने हुनर से सीखी। उन्हें नौजवानों के बीच रहना बहुत भाता था। नागार्जुन की लेखनी में सांप की फुफकार जैसा दंश था।
बुढ़ापे में भीड़भाड़ में ट्रेन में चढ़ने-उतरने में बाबा को काफी दिक्कत होती थी। इसलिए उन्होंने पीवी नरसिंह राव के शासनकाल में रेलमंत्री सी.के. जाफर शरीफ से प्रथम श्रेणी के पास की गुहार की, मगर सर्वोदयी या फर्जी स्वतंत्रता सेनानी वाला नहीं, एक ऐसे साहित्यकार के रूप में जिसकी रचनाएं देश के 18 विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल है। साहित्य अकादमी द्वारा नवरत्न में शामिल किए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया में बाबा ने कहा था—‘मुझे सम्मान की नहीं, पैसे की जरूरत है।’ हमेशा यह डर मन में रहता है कि जिस दिन लेखनी बंद हो जाएगी, खाने के लाले पड़ जाएंगे। मैंने 1996 में साहित्य अकादमी के सचिव के. सच्चिदानंदन से बाबा के लिए कुछ विशेष आर्थिक सहायता के प्रावधान का आग्रह किया। अकादमी इस पर विचार करती रह गई, बाबा दुनिया से चले गए।
2011 में बाबा की जन्मशती उनके अपने ही राज्य बिहार में बिल्कुल फीकी रही। महात्मा गांधी हिन्दी यूनिवर्सिटी, वर्धा से नागार्जुन प्रेमियों ने पटना आकर तीन दिनों की बाबा संगोष्ठी आयोजित की।


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