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बुद्धिमान सलाहकार मित्र हो राष्ट्रपति

Posted On May - 19 - 2017

हरीश खरे
11905cd _18 may 5अगले दो सप्ताह बाद 2017 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए कवायद शुरू हो जाएगी। हालांकि कुछ राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों ने प्रणब मुखर्जी का उत्तराधिकारी चुनने के लिए पहले ही दांवपेच लगाना व परिश्रम शुरू कर दिया है। इससे किसी को आश्चर्य नहीं होगा कि राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल से ही अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की भांति प्रणब मुखर्जी की भी इच्छा होगी कि वे दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाएं। लेकिन ऐसा होने की संभावना लगभग नहीं है। अपने 5 साल के कार्यकाल में उन्होंने सत्तासीन दल को उपकृत करके खुद को उनका प्रिय बनाए रखने के लिए पर्याप्त कवायद नहीं की, जिससे कि अगले 5 साल तक उन्हें राष्ट्रपति भवन में और जगह मिल सके। विपक्ष में भी उनको लेकर मिलाजुला सम्मान ही है। इस सबसे इतर वह राजेन्द्र बाबू नहीं हैं।
अब ऐसी स्थिति में नये राष्ट्रपति की तलाश करनी है। और यह मुश्किल तलाश है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह काफी अहम पद है। निस्संदेह भारत का राष्ट्रपति सिर्फ गणतंत्र का औपचारिक प्रमुख ही नहीं है, यकीनन उनकी शक्ति का वास्तविक स्वरूप और सीमा स्थापित प्रस्थापना से बहुत दूर है। 1967 की शुरुआत से ही भारत के राष्ट्रपति को ब्रिटेन के संसदीय मॉडल की तुलना में ज्यादा सक्रिय राजनीतिक खिलाड़ी बनाने की कवायद की गई है।
1967 में भारत के प्रधान न्यायाधीश, बेवजह और अक्षम्य रूप से राजनीतिज्ञों के बीच उलझ गए, जब उनके सामने राष्ट्रपति भवन पहुंचने का विचार आया। प्रधान न्यायाधीश सुब्बाराव स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ की ओर से राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनने को तैयार हो गए। उस समय कांग्रेस ने लोकप्रिय व सम्मानित डॉ. जाकिर हुसैन को प्रत्याशी के रूप में उतारा। जाकिर साहब आराम से बड़े बहुमत के साथ चुनाव जीत गए, लेकिन न्यायपालिका ने संस्था के रूप में पार्टी से ऊपर रहने की छवि व सम्मान गंवा दिया। उसके बाद 1969 में जाकिर साहब के असामयिक निधन के बाद एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जरूरी हो गया। इसके बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के प्रमुखों ने इंदिरा गांधी के पर कतरने की कवायद की, जिनका मानना था कि उनका कद बहुत बड़ा होता जा रहा है। इस हिसाब से 1967 और 1969 के राष्ट्रपति चुनाव ने बुरी धारणा को दृढ़ किया।
उसके बाद से ही राजनीतिक वर्ग के एक धड़े ने समय-समय पर अपने पक्षपातपूर्ण झगड़े में राष्ट्रपति भवन को शामिल करने की कवायद शुरू की। राजीव गांधी-जैल सिंह का विवाद संवैधानिक रूप से गलत कदम का अध्ययन करने वाले हर छात्र के लिए अहम बना हुआ है। और इसके विपरीत राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का मामला है, जब भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर 6 दिसंबर 1992 में बड़ा हमला हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव इस मसले पर चुप्पी बनाए रहे, लेकिन शर्मा ने इस मसले पर बयान दिया।
इसके बाद के राष्ट्रपति के.आर. नारायणन राजनीतिक निष्पक्षता और संवैधानिक नैतिकता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 1997 में इंद्र कुमार गुजराल सरकार द्वारा कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश लौटा दी थी। कभी-कभी राष्ट्रपति की ऊर्जा बहुत लाभदायक साबित होती है।
फिर भी, इसे स्पष्ट रूप से और बार-बार दोहराए जाने की जरूरत है कि राष्ट्रपति भवन को सत्ता प्रतिद्वंद्वी केंद्र नहीं होना चाहिए और न ऐसा बनने की उसे अनुमति दी जानी चाहिए। राष्ट्रपति भवन में “एक्टिविस्ट” राष्ट्रपति के लिए कोई जगह नहीं है। राष्ट्रपति का काम लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री की राह में बाधा बनना नहीं है। राजनीतिक शक्तियां प्रधानमंत्री में निहित होती हैं और उसकी ताकत लोकसभा में उसके बहुमत से है। प्रधानमंत्री लोकप्रिय लोकतांत्रिक इच्छा का मूर्त रूप है। प्रधानमंत्री को भारत के संविधान के तहत देश को चलाने का अधिकार मिला हुआ है, न कि राष्ट्रपति को। हालांकि राष्ट्रपति पूरी तरह से विशेषाधिकारों और शक्तियों से रहित नहीं है लेकिन वह देश नहीं चलाता है। संरक्षण, शक्ति, नीतियां और पहल सब कुछ प्रधानमंत्री के कार्यक्षेत्र में आता है।
इसके बावजूद राष्ट्रपति सिर्फ रबर स्टैंप नहीं है, न तो श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने ऐसा किया, न श्रीमती सुमित्रा महाजन ऐसा करेंगी। राष्ट्रपति भवन ऐसे लोगों को उपकृत करने की जगह भी नहीं है, जो अपने दल की सेवाओं के लिए जाने जाते हैं। और निश्चित रूप से यह रायसीना हिल्स पर स्थित ऐसी हवेली भी नहीं है, जहां न्यायाधीश को बिठा दिया जाए या ताकतवर राजनीतिक व्यक्ति को यह जगह दे दी जाए।
इस पर सहमत होना शायद आसान होगा कि कोई पुरुष (या महिला) जो राष्ट्रपति भवन में रहे, उसका विशिष्ट व्यक्तित्व होना चाहिए। कुल मिलाकर राष्ट्रपति पद पर विराजमान होने के लिए उसकी उम्मीद के मुताबिक कद जरूरी है। राष्ट्रपति पद का औपचारिक हिस्सा अपने आप में गरिमा और शिष्टाचार की मांग करता है। शारीरिक रूप से दुरुस्त होना और चुस्ती न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए। और शायद बौद्धिक सहनशक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में देखें तो राष्ट्रपति का बौद्धिक होना व उसकी बौद्धिक उपलब्धियां उस समय महत्वपूर्ण नजर आती हैं, जब वह वैश्विक नेताओं से मुलाकात करता है। राष्ट्रपति के.आर. नारायणन इस मामले में असाधारण उदाहरण रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं की संख्या कमोबेश राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पक्ष में हो गई है। ऐसे में प्रधानमंत्री व उनके सलाहकार यह गलती नहीं कर सकते कि राष्ट्रपति किसी तरह से प्रतिपक्ष का हो। संविधान राष्ट्रपति भवन से टकराव के पक्ष में नहीं है। ठीक इसी समय संभ्रांत नागरिक यह भी अपेक्षा रखते हैं कि जिस व्यक्ति का चयन अंतिम रूप से किया जाए, उसका व्यक्तित्व विशाल हो और वह कुछ मौकों पर प्रधानमंत्री को समझदारीपूर्ण सलाह देने का स्रोत भी बने।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों को यह कानूनी अधिकार है कि वे राष्ट्रपति चुनाव में एकजुट होने की हरसंभव कवायद करें और इस मौके का इस्तेमाल समान विचारधारा वालों को एकजुट करने में करें। अगर विपक्षी दल किसी एक पुरुष या महिला को चुनाव में उतारने और प्रत्याशी के साथ खड़े होने में सक्षम होते हैं तो सत्तासीन दल को भी यह कवायद करनी होगी कि अपने चयन में वह उसी कद के व्यक्तित्व को उतारे।
यह अनुमान लगाना कठिन या कहें कि असंभव है कि राष्ट्रपति किस तरह से निकलकर सामने आएगा। एक भव्य एवं शानदार इमारत, एक व्यापक और औपचारिक सजावट के साथ महामहिम का भारी भरकम व खूबसूरत कलगी के साथ एडीसी के अलावा तमाम और सांकेतिक वैभव और समारोह “ताकत” का झूठा एहसास देते हैं। और इसके बाद कभी-कभी परिवार के सदस्य भी अलग विचार वाले होते हैं और विद्रोही के रूप में सामने आते हैं। साथ ही चालाक सहयोगियों को भी नहीं भुलाया जा सकता जो लुभावने षड‍्यंत्र का शिकार हो सकते हैं।
परिपक्व राजनीति इस तरह के गलत अनुमान व संकट पर बहुत गंभीरता से नजर रखती है। इन चीजों पर नजर रखकर व्यक्ति का चुनाव करने और सीख लेना गणतंत्र के लिए अनिवार्य है। देश का प्रमुख बनने पर राष्ट्रपति गणतांत्रिक गुणों और उसकी शक्तियों का संरक्षक भी होता है। देश के नागरिक उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रपति चल रही घटनाओं पर सावधानीपूर्वक नजर रखेगा। नागरिक, खासकर मध्य वर्ग के लोग यह आश्वासन चाहते हैं कि नीतियों में संविधान की अपेक्षाएं नजर आएं। दूसरे शब्दों में कहें तो फखरुद्दीन अली अहमद की तरह रीढ़हीनता न हो। बगैर कोई संवैधानिक असंतुलन पैदा किए अगला राष्ट्रपति संतुलन साधने में सफल होना चाहिए।
(लेखक ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।)


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