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नये विमर्शों की तलाश

Posted On May - 20 - 2017

अनंत विजय
इन दिनों साहित्य के दायरे का विस्तार हुआ और कई अन्य तरह का लेखन भी साहित्य के केंद्र में आया। सिनेमा, खेल आदि पर लेखन शुरू हुआ। परंतु अब भी कई क्षेत्र हैं, जिन पर लिखा जाना शेष है। हिंदी में साइंस फिक्शन की तरफ अभी भी लेखकों की ज्यादा रुचि दिखाई नहीं देती। साहित्य को लेकर हिंदी में लंबे समय से कोई विमर्श भी नहीं हुआ। इसके स्वरूप और प्रकृति को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने और पश्चिम के आलोचकों, लेखकों ने भी उस पर लंबे समय तक विचार किया था। उन्होंने साहित्य क्या है, साहित्य की प्रकृति क्या हो, कविता क्या है, कहानी कैसी हो, कहानी और उपन्यास में क्या अंतर होना चाहिए, उपन्यास का महाकाव्यत्व क्या हो, साहित्य का व्याकरण क्या हो, पर अपनी राय रखी थी। समकालीनों से संवाद किया और अपने पूर्ववर्ती लेखकों के विचारों से मुठभेड़ की थी। गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ने साहित्य की सामग्री और साहित्य का व्याकरण जैसे लेख लिखे। हिंदी में यह अवधारणा बहुत चल नहीं पाई और मुख्य विधाओं को ही साहित्य माना जाता रहा। उसमें से कई युवा लेखकों ने प्रयोग किए। कई युवा साहित्यकारों ने पहले किसी अन्य विधा के लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाई और फिर उन्होंने अपने लिए नया रास्ता चुना।
उदाहरण के तौर पर देखें तो यतीन्द्र मिश्र का आगमन साहित्य में एक कवि के तौर पर हुआ था और उन्हें कविता का प्रतिष्ठित ‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ भी मिला था लेकिन अब उनको साहित्य में कवि के रूप में कम और संगीत अध्येता के रूप में ज्यादा जाना जाता है। उन्होंने ‘अक्का महादेवी’ से लेकर ‘लता मंगेशकर’ पर गंभीरता से लिखकर अपनी तो नई पहचान स्थापित की ही, साहित्य का दायरा भी बढ़ाया। इसी तरह से एक दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है। अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई। उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम-कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसी तरह से अगर देखें तो रत्नेश्वर सिंह ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के तौर पर स्थापित की लेकिन बाद में ‘जीत का जादू’ जैसी बेहतरीन किताब लिखकर मोटिवेशनल गुरु के तौर पर खुद को स्थापित किया। रत्नेश्वर को उनकी कहानियों और मीडिया पर लिखी दर्जनों किताबों से ज्यादा पहचान ‘जीत का जादू’ ने दिलाई। अब रत्नेश्वर का नया उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ प्रकाशित होने वाली है, जिसके लिए प्रकाशक ने उनके साथ पौने दो करोड़ रुपए का कांट्रेक्ट किया है। यह स्थिति साहित्य के लिए बेहतर मानी जा सकती है।


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