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नयी राह नजर नहीं आई मध्य-पूर्व में

Posted On May - 28 - 2017

एस. निहाल सिंह
12705cd _23orb_master768बतौर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी पहली विदेश यात्रा में सबसे पहले मध्य-पूर्व एशिया गए। यहां उनका दौरा किसी तीखी नोक-झोंक के बिना सही-सलामत हो जाने पर खुद अमेरिका और शेष दुनिया ने भी चैन की सांस ली है। ट्रंप के संवाद का विषय अधिकतर इस्राइल-फिलीस्तीन समस्या का हल निकालने के इरादे के इर्द-गिर्द रहा, लेकिन अपने इस दौरे से ट्रंप शिया-बहुल ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के नेतृत्व में सुन्नी-अरब देशों की महापंचायत बनाकर पहले से जटिल समस्या में नया पेच जोड़ गए हैं।
फिलीस्तीन समस्या पर उनकी तरफ से किसी नए प्रस्ताव के अभाव में आखिर यह कैसे पता चलेगा कि वह अपने प्रयास में सफल होंगे या विफल? उन्होंने इस्राइल के सांसदों और विधायकों के प्रति गर्मजोशी दिखाई है। उनके साथ किप्पाह टोपी पहनकर ‘वेलिंग वॉल’ नामक यहूदी तीर्थ का दौरा किया। जिस प्रकार का उन्होंने इस्राइल-अनुकूल भाषण दिया, इसका मकसद इस्राइल को खुश करना ही था।
इस्राइल आने से पहले ट्रंप सऊदी अरब गए, जहां खुद सुल्तान सलमान ने उनकी अगवानी की। किंग सलमान ने ट्रंप के इस दौरे को भुनाने के लिए अपने यहां अन्य सुन्नी मुस्लिम देशों के नेताओं को बुला रखा था ताकि लगे हाथ अमेरिका-इस्लामिक देश शिखर सम्मेलनों की पहली कड़ी आयोजित की जाए। ट्रंप ने भी खुले दिल से मुस्लिम नेताओं से निजी मुलाकात की और एक ऐसी मुलाकात मिस्र के राष्ट्रपति अल-सिस्तानी से भी की। सऊदी अरब को यह जानकर राहत महसूस हुई कि ट्रंप अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति ओबामा जैसे नहीं हैं, जिनके साथ अरब जगत के रिश्ते बनिस्बत ठंडे ही रहे थे। बदले में ट्रंप ने भी अतिथि-धर्म निभाते हुए इन मुल्कों में हो रहे मानवाधिकार हनन के मुद्दे को नहीं छेड़ा।
फिलीस्तीनियों को ट्रंप की इस यात्रा से मायूसी ही हुई है क्योंकि ले-देकर उन्होंने यही पाया कि इस्राइल से शांति बनाने की बातें तो कही जा रही हैं लेकिन इस ध्येय को प्राप्त कैसे किया जाए, इस बारे में कोई संकेत नहीं दिया गया। फिलीस्तीन प्रशासनिक प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास की ट्रंप से मुलाकात पहले भी व्हाइट हाउस में हो चुकी है। इस बार इन दोनों की भेंट में भी कुछ खास नहीं निकल पाया।
अपने दौरे में पहले सऊदी अरब और बाद में इस्राइल में दिए भाषणों में ट्रंप ने ईरान को आड़े हाथों लिया है। ऐसा करके राष्ट्रपति और उनके सलाहकारों ने शिया-सुन्नी के बीच की रार को और भी ज्यादा चौड़ा कर दिया है। इसके नतीजे आने वाले समय में अच्छे नहीं रहेंगे। ट्रंप और सुन्नी-जगत के लिए ईरान अब टारगेट नंबर 1 की जगह पर है। विडंबना यह है कि ईरान के सुधारवादी नेता कहे जाने वाले हसन रूहानी का फिर से चुनकर आना शेष दुनिया को शांति के प्रति ईरानी लोगों के रुझान का संकेत है। खुद रूहानी का भी कहना है कि ‘यह ईरान का संसार के लिए आगे बढ़ाया गया दोस्ती का हाथ है।’
अनेक कारणों से ईरान के साथ सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता काफी समय से चली आ रही है। इनमें पहला यह है कि साथ लगते यमन में ईरान-समर्थित विद्रोही हुतियों के खात्मे के लिए सऊदी अरब की सेना लड़ रही है। दूसरा, इराक में पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन को उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिकी हमले के बाद उपजी परिस्थितियों में वहां सत्ता में शिया बहुल आबादी का बोलबाला हो गया है। तीसरा, लेबनान में हिजबुल्लाह नामक शिया गुट की मदद और समर्थन ईरान करता आया है और चौथा, सीरिया में सुन्नी विद्रोहियों को कुचलने में वहां शिया अल्पसंख्यकों के दबदबे वाली सरकार का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार की सहायता भी ईरान कर रहा है। इसी वजह से सुन्नी देशों का सिरमौर कहे जाने वाले सऊदी अरब को ईरान से बहुत द्वेष है।
यह हकीकत है कि यहूदी-विरोधी भाषणबाजी के बावजूद सुन्नी सल्तनतों के शासक समय-समय पर अंदरखाते इस्राइल के साथ संवाद करते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से फिलीस्तीनियों की जमीन को हड़पकर उन्हें अपने ही मुल्क में दोयम दर्जे का नागरिक बनने पर मजबूर किया गया है, यह जख्म चतुर कूटनीति और गुप्त लेन-देन से छुपाए नहीं छुपने वाला।
कालांतर में राष्ट्रपति ट्रंप खुद कहते आए हैं कि फिलीस्तीन-इस्राइली समस्या का हल एकल या फिर द्वि-राष्ट्र के फार्मूले से निकले। यहूदी लोगों के दिलों में इस डर ने घर कर रखा है कि यदि फिलीस्तिनियों को पूर्ण नागरिकता और मतदान का अधिकार दे दिया गया तो एकल-राष्ट्र व्यवस्था में वे खुद अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे। कब्जाई गई फिलीस्तीनी भूमि पर ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में यहूदियों को बसाने का मकसद ही 1967 की लड़ाई के बाद हथियायी जमीन में लगातार इजाफा करना है।
इस दौरे से ट्रंप को आखिर क्या हासिल हुआ है? अगर कहें कि बिना किसी खरोंच के वे सही-सलामत वहां से निकल आए, तो यह एक मामूली उपलब्धि कही जाएगी। ठीक इसी समय जब ईरान के साथ हुए एटमी-करार को फाड़कर फेंकने और उस पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए यदि ट्रंप के हाथों में खुजली हो रही है तो कहना होगा कि मध्य-पूर्व को वे और भी ज्यादा समस्याग्रस्त बना देंगे।
यह भी अभी तक साफ नहीं है कि ईरान पर उनका मौजूदा रुख क्या ‘कुख्यात ट्रंप-व्यवहार’ का एक नमूना है। इससे पहले भी ट्रंप ने मुख्य नीतियों जैसे कि ‘नाटो’ पर पलटा मारकर एकदम उलट लीक पकड़ी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भेंट में वह उन्हें देवता-सरीखा सम्मान देते पाए गए जबकि अपने चुनावी भाषणों में वे उन्हीं को खलनायक की तरह पेश करते थे। इन सबके मद्देनजर ट्रंप की विदेश नीति के बारे में कोई भी ठीक से नहीं कह सकता।
अपने दौरे के यूरोपीय चरण को पूरा करने के बाद जब ट्रंप स्वदेश लौटेंगे तो अनेकानेक समस्याएं मुंह बाए खड़ी होंगी। चुनाव प्रचार के दौरान रूस से कथित अंदरखाते मदद लेने के जो आरोप उन पर लगे थे, उसकी जांच एक विशेष अधिकारी की निगरानी में होगी। इस सिलसिले में बर्खास्त किए गए फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के अध्यक्ष जेम्स कॉमी ने भी संसदीय समिति के सामने अपनी बात रखनी है।
यह ठीक है कि मध्य-पूर्व के दौरे में राष्ट्रपति की गरिमा के मुताबिक व्यवहार करके ट्रंप ने अपने लिए सराहना बटोरी है, लेकिन इस्राइल और फिलीस्तीन में व्यावहारिक समझौता करवाने की प्रक्रिया शुरू करने में उन्हें अभी बहुत प्रयास करने होंगे। एक तरफ नए अमेरिकी राजदूत ने इस्राइल में अपना काम संभाला है वहीं दूसरी ओर जरूसलम शहर का अपना भविष्य अधर में लटका हुआ है। अमेरिकी दूतावास को राजधानी तेल अवीव से बदलकर जरूसलम ले जाने वाले अपने वादे को राष्ट्रपति ट्रंप ने फिलीस्तीनियों के गुस्से के मद्देनजर फिलहाल टाल दिया है। वैश्विक मामलों में ट्रंप की समझ सीमित है परंतु एक देश को चलाना व्यापारिक घराना चलाने से कहीं ज्यादा अलग होता है। यहां अकसर क्रिया की प्रतिक्रिया और नतीजे उठ खड़े होते हैं।
S.Nihal Singhयह सब इस्राइल-फिलीस्तीन गुंझल को कितना सुलझा पाएगा, इस बारे में कोई कयास नहीं लगाया जा सकता। इस दौरान इस्राइल की जेलों में भूख हड़ताल पर बैठे फिलीस्तिनियों और इस्राइली सैनिकों पर छुरेबाजी जैसी घटनाओं का सिलसिला जारी रहेगा। इस्राइल पूर्वी-जरूसलम को हड़पने के बाद अब पश्चिमी तट के बड़े इलाके पर यहूदी कालोनियां बनाने के काम में जुटा है। केवल समय पर छोड़ देने से इस समस्या का हल नहीं निकलने वाला।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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