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दलितों का आक्रोश

Posted On May - 23 - 2017

सवर्णों की दबंगई की प्रतिक्रिया

रविवार को देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीम आर्मी के झंडे तले एक ऐसे गैर सियासी दलित संगठन का उदय होते देखा, जिसका मायावती तथा उनकी दलित हितैषी पार्टी बसपा से कोई नाता नहीं। 30 वर्षीय वकील चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली इस भीम आर्मी के सात राज्यों में 40,000 के करीब कट्टर सदस्य हैं, जिनमें से अधिकांश पश्चिम उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं। जंतर-मंतर पर नीली टोपी पहने लगभग 6000 दलितों के इस जमावड़े ने अपने पारंपरिक तथा सभ्रांत नेतृत्व को यह कहकर हाशिए से परे धकेल दिया कि इस नेतृत्व का निचले तबके के लोगों से संपर्क टूट चुका है तथा दलित अगड़ी जातियों की मनमानियों और अराजकता का लगातार शिकार हो रहे हैं। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद ये जुल्म और भी बढ़े हैं। भीम आर्मी का कहना है कि बहनजी (मायावती) हमारी नेता थीं, लेकिन अब हमारे नेता भैया (चंद्रशेखर) हैं। हालिया हिंसक वारदातें जिनमें सहारनपुर के नजदीक शब्बीरपुर में ठाकुरों द्वारा कथित तौर पर दलितों के घरों में आग लगाने जैसी घटनाएं शामिल हैं, अम्बेडकर तथा महाराणा प्रताप जयंती पर निकाले गए जुलूसों के दौरान ठाकुरों व दलितों के बीच हुई झड़पों पर भी मायावती की चुप्पी इस भीम सेना के सदस्यों को अखरी। कुछ ज्यादा बड़बोले दलित नेता तो कुछ पाने की आस में भाजपा में शामिल हो गए हैं।
भीम आर्मी का दुराव नेताओं और  हिंदू धर्म के उन ठेकेदारों से भी है जो उन्हें आज भी हेय समझते हैं। मोदी के शासनकाल में दलितों से हुई धक्केशाही की यह तीसरी वारदात है। इससे पूर्व हैदराबाद में इसी अराजकता के चलते रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। गुजरात के उना इलाके में हुई घटना भी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। भाजपा का संघ वाला हिंदू एजेंडा किसी से छिपा नहीं है। यह पार्टी सरेआम बहुसंख्यकवाद की राजनीति खेल रही है, जिससे स्वयंभू गोरक्षकों द्वारा अल्पसंख्यकों पर आक्रमण की घटनाएं  बढ़ी हैं। खासकर भाजपा शासित उ.प्र., हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों में तो मुस्लिम आतंकित हैं। भीम आर्मी मुस्लिमों के अलावा यादवों, वाल्मीकियों तथा शेष ओबीसी से भी सहयोग प्राप्त करने में कोई गुरेज नहीं कर रही है। दरअसल असमानता व भेदभाव का दंश इन्हें जोड़ता है।


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