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दर्द ने मुझे बेचैन बनाया

Posted On May - 27 - 2017

अरुण नैथानी
12705cd _kunwar bechain1रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन के दौर से कविता कर रहे प्रेम के उद्दात मूल्यों के कवि कुंअर बेचैन के मन में टीस है कि आज कविता के पहले जैसे रसिक नहीं रहे। श्रोता कविता में भी मनोरंजन की तलाश में रहते हैं। वे मानते हैं कि मनोरंजन के तमाम विकल्प उपलब्ध होने से लोग अब रातभर कवि सम्मेलनों में कविता नहीं सुनते। कविता में गहरे निहितार्थ होते हैं, जीवन के संदेश होते हैं, सामाजिक चेतना के स्वर होते हैं। वह मनोरंजन की वस्तु नहीं हो सकती। मेरी कविता दिल और आत्मा से जुड़ती है।
कुंअर बेचैन ने जीवन की तमाम उपलब्धियों के बावजूद अपना सरल-सहज स्वभाव नहीं खोया। उनके व्यक्तित्व की सहजता प्रभावित करती है। नारायण दास सक्सेना व श्रीमती गंगा देवी के पुत्र कुंअर बहादुर सक्सेना का जन्म 1943 में मुरादाबाद के उमरी गांव में हुआ।
तो फिर आप कुंअर बहादुर सक्सेना से कुंअर बेचैन कैसे हो गये? मैंने कक्षा नौ से कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। उस जमाने में कवि लोग उपनाम का प्रयोग करते थे। मैं उपनाम की तलाश में था। दरअसल शुरुआती जीवन बेहद मुश्किलों में बीता। जब मैं दो साल का था तो पिता चल बसे। फिर छह साल का था तो मां नहीं रही। बहन-बहनोई के यहां पला। दुर्भाग्य ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। 9 साल का हुआ तो बहन का भी देहांत हो गया। नौ साल की छोटी उम्र में घर की पूंजी-चाबी मेरे हाथ में आ गई। जीजा ने दूसरी शादी नहीं की। मुझे अपने बच्चे की तरह पाला। जीवन बड़ा संघर्षमय था। खुद खाना बनाया। पूरी कहानी दुख भरी थी। सोचता था कि अपने हालात के अनुरूप कोई उपनाम रखूं। अपनी सोच के अनुरूप उपनाम अश्रु शब्द डायरी में लिखा। ये मुझे पता था या फिर डायरी को। धीरे-धीरे नाम की तलाश की, मगर नाम फिट नहीं बैठा। उन दिनों हाई स्कूल में था। एक कविता लिखी :-
मुझे दिन रात राहत नहीं मिली,
मैं हूं बेचैन
चैन की आदत न मिली।
मुझे लगा मेरे नाम बेचैन होना चाहिए। मां सरस्वती ने इस पंक्ति में उपनाम दे दिया। ये पंक्ति आई तो मेरा नाम उपनाम के साथ हो गया कुंअर बहादुर सक्सेना बेचैन। फिर छोटी-मोटी पत्रिकाओं में कविता छपने लगी। इंटर मीडियट से कवि सम्मेलन में जाने लगा। लगा नाम लंबा है। फिर कुंअर बहादुर बेचैन से मैंने सक्सेना हटा दिया। फिर लगा कि नाम अब भी ज्यादा लंबा है। फिर कुंअर बेचैन नाम से लिखना शुरू किया।
अपने रचनाकर्म के बारे में क्या कहेंगे? अब तक 36 किताबें प्रकाशित हुई हैं। पिछले दिनों महाकाव्य प्रतीक पंचाली के नाम से प्रकाशित हुआ। प्रतीकात्मक रूप में द्रौपदी पर केंद्रित है। संदर्भ व प्रसंग आज के जीवन के हैं। लंबा समय लगा। 1976 से 2016 तक चालीस साल लगे। छंद विधा में महाकाव्य सरीखा। पहले उपन्यास व काव्य पर लिखा।
अापने इतनी विधाओं में लिखा। कौन-सी विधा आपके दिल के करीब है? दरअसल गीत मेरे दिल के करीब हैं। मैंने शुरुआत गीतों से की। बाद में ग़ज़ल, अतुकांत कविता हाईकु-संग्रह, दोहा संग्रह, दो उपन्यास भी प्रकाशित हुए।


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