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कश्मीर की कसौटी

Posted On May - 24 - 2017

शांति और विवेक को प्राथमिकता दें

कश्मीर में पत्थरबाज़ों से निपटने के लिए एक युवक को जीप से बांधकर मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करने वाले मेजर गोगोई को सेना प्रमुख का प्रशंसा-पत्र, उनका संवाददाता सम्मेलन और अनुमानत: पाकिस्तानी सेना की अग्रिम चौकियों पर धावा बोलना, कश्मीर में अशांति से निपटने के मोदी सरकार के दृष्टिकोण की पूर्ति नहीं करते। सामाजिक संघर्ष और सीमा पार से घुसपैठ के प्रयासों के प्रतिकार के प्रारंभिक हथियार खबरों पर पूर्ण नियंत्रण और सरकार का वर्चस्व ही होने चाहिए। परन्तु न्यूज स्पेस पर करीब-करीब पूर्ण नियंत्रण के सिवाय, सरकार तीन साल के दौरान कश्मीर में अशांति से कारगर तौर पर निपटने में विफल ही रही है। सर्जिकल स्ट्राइक, प्रधानमंत्री की बलूचिस्तान चाल और उड़ी घटना के बाद मुठभेड़ों में बड़ी तादाद में घुसपैठियों के मारे जाने से वाहवाही तो खूब हुई परन्तु यह दुखद है कि जमीनी हकीकत अभी भी बदली नहीं है। कमजोर दिल समझी गयी कांग्रेस सरकारों ने भी यही दृष्टिकोण आजमाया। सुरक्षा बलों को तब खुली छूट दी गयी थी। इसके बावजूद, हमारे सैनिकों की जानें गयीं। सुरक्षा बलों का हौसला बनाये रखने के लिए खजाने के मुंह खोल दिये गये। कश्मीरी संतप्त बने रहे। वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान के साथ शांति की जो पहल की, उसका नतीजा यह हुआ कि 1989 के बाद पहली बार सीमा पर गोलीबारी बंद हुई। उनके ‘इनसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ वाले दृष्टिकोण की बदौलत घाटी में मतदान प्रतिशत बढ़ा।
इसके बाद जो सरकार सत्ता में आयी, उसने सुरक्षा कार्रवाइयां भी कीं और राजनीतिक तौर पर भी हालात संभाले। 2008 के मुंबई प्रकरण के बाद पाकिस्तान को बैकफुट पर आना पड़ा। वरिष्ठ अफसरों के प्रशंसा-पत्र के बाद मेजर गोगोई की भूल को अब कर्तव्य के प्रति समर्पण के भाव के तौर पर देखा जाने लगा है। मंगलवार को सीमा चौकियों को ध्वस्त करने का जो वीडियो जारी किया गया, उससे गोगोई को प्रशंसा-पत्र देने की चूक पर पर्दा डल सकता है। परन्तु जैसी कि लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग ने टिप्पणी की है “सेना भी देश की भावनाओं से प्रभावित हो गयी है।” कश्मीर में शांति की संभावनाओं और एक प्रतिष्ठान के तौर पर सेना को जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई होने में समय लगेगा। टीवी स्टूडियो में दर्ज जीत क्षणिक है।


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