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कलम, दवात…कहां अब वह बात

Posted On May - 19 - 2017

अभिषेक ओझा

कुछ दिन पहले किसी को फाउंटेन पेन से लिखते देखा। घुमावदार लिखावट, कैलीग्राफी जैसी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, इससे पहले मैंने ऐसी लिखावट कब देखी। कई पुरानी बातें याद आयीं। ग्यारहवीं कक्षा। केमिस्ट्री के एक प्रोफ़ेसर मोल कॉन्सेप्ट पढ़ाते थे। उनसे जुड़ी दो बातें याद हैं-उनकी बंधी हुई चुटिया और लिखावट। ब्लैक बोर्ड पर जब वो लिखते तो उनके हाथों में एक थिरक होती। दूसरी ये कि लिखते समय उनके हाथ और उनकी चुटिया के हार्मोनिक मोशन की फ्रीक्वेंसी समान होती। बोर्ड पर उनका लिखा हुआ मिटते देख ऐसे लगता जैसे किसी ने खूबसूरत रेत मंडल बनाकर मिटा दिया हो।
ये शब्दों से साथ छूटने की उम्र थी। लिखावट की जगह घसीट कर कम से कम लिखने और ज्यादा से ज्यादा समझने के दिन थे। कागज पर अक्षर की जगह तीर, गोलाई और रेखा चित्रों की खिंचाई होती। हिंदी और अंग्रेजी की कक्षायें सिर्फ जरूरत की हाजिरी भर के लिए गए। हमारी पीढ़ी ने घोर परिवर्तन देखा है। गांव के स्कूल में लकड़ी की पटरी (तख्ती) और खड़िया पर मैंने लिखना सीखा। पटरी पर लाइन बनाने के लिए एक धागे को खड़िया के घोल में डुबाकर पटरी के दोनों छोरों पर रख खींच कर छोड़ा जाता। छींटे से लाइन बनती। शब्द लिखने के लिए सीधी लाइनें और गिनती लिखने के लिए ग्रिड। पटरी चमकाना एक झंझट होता।
बाद में स्याही से परिचय हुआ। पुड़िया घोल कर स्याही बनाना। हर कपड़े की जेब में स्याही लगती। स्कूल ले जाने वाले थैले में भी स्याही लगती। कलम सरकंडे से बनती, तेज धार वाले चाकू से छील कर कैलीग्राफी के निब जैसी। निब काटना कला थी। अच्छी नहीं कटी तो बेकार। फाउंटेन पेन बहुत बाद में हाथ लगी। इन दिनों फाउंटेन पेन के साथ होल्डर और निब से भी कुछ दिन लिखा। निब भी हिंदी के लिए अलग, अंग्रेजी के लिए अलग। कक्षा छह में तांबे के जी मार्का पिन को होल्डर में लगाना। लिखना सीखना शुरू ही किया था कि एक झटके से दूसरी दुनिया में प्रवेश हो गया।
टाट से बेंच। हरे रंग के शीशे के बोर्ड! पढ़ाने वाले सर और हम एक पीढ़ी फांदकर बॉल पॉइंट पेन पर आ गए। कई चीजें थीं जो अब लुप्त हो गयीं। अब तो स्याही न्यूज में सिर्फ तभी आती है जब किसी के चेहरे पर पोती जाती है! लिखावट एक प्राचीन और मरती हुई कला है। ये वो कला है जिसके आर्टिस्ट और आप में सिर्फ इतना फर्क होता है कि वो आर्ट बना देते हैं और आप सोचते तो हैं कि ये तो मैं भी बना सकता हूं पर आप कभी बनाते नहीं।
आपको लिखना आता है तो लिखिए। लिखना क्या बोलना भी हमारे ही जीवनकाल में खत्म हो जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी! जैसे चिट्ठियां ख़त्म हो गयीं। वैसे देखिये ना, हम भी टाइप करके कह रहे हैं कि लिखना चाहिए।
साभार : उवाच ओझा डॉट इन


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