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एसवाईएल पर हो व्यावहारिक पहल

Posted On May - 25 - 2017

12505cd _SYLपिछले दिनों पंजाब और हरियाणा ने अपने बीच लंबे समय से चल रहे सतलुज-यमुना लिंक नहर विवाद को सुलझाने का ऐतिहासिक मौका हाथ से गंवा दिया। दिन था 12 मई का जब उत्तर-क्षेत्र मुख्यमंत्री सम्मेलन में पंजाब के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने अपनी ओर से इस विवाद को सुलझाने की खातिर समझौते की पेशकश की थी। हरियाणा सरकार को चाहिए था कि वह इस मौके को लपक लेती और वार्ता शुरू कर देती। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ऐसा नहीं हुआ। इसकी बजाय दोनों सरकारें अपने पुराने अड़ियल रवैयै पर लौट गईं और बातचीत के रास्ते फिर से बंद हो गए।
इस वक्त हरियाणा सरकार को लगता है कि उसे बातचीत में पड़ने की जरूरत इसलिए भी नहीं है क्योंकि कानूनन उसका पलड़ा भारी है। वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने एसवाईएल पर अपना अंतिम फैसला दिया था, जिसमें पंजाब को आदेश दिया गया था कि वह अपने क्षेत्र में पड़ने वाले एसवाईएल नहर के हिस्से का काम जल्द पूरा करे ताकि हरियाणा को उसके भाग का पानी मिल सके। इसके बाद वर्ष 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिया था कि अगर पंजाब अपना काम पूरा नहीं करता तो केंद्र सरकार को दखल देकर इसे पूरा करवाना चाहिए। सूबे में तब भी कांग्रेस की सरकार थी और उसने इसकी काट के लिए एक अजीबो-गरीब कानून विधानसभा में पारित करते हुए पानी पर हुए तमाम पिछले करार समाप्त कर दिए थे। इस कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की राय जानने के लिए प्रस्तुत किया गया। असहज करने वाले 12 वर्षों के अंतराल के बाद आखिरकार 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक ठहरा दिया था। तत्कालीन अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार ने फिर से इसमें अड़चन डालते हुए नहर के लिए जारी की गई अधिग्रहण-अधिसूचना को ही निरस्त करते हुए जमीन उसके मालिकों को लौटाने का फैसला विधानसभा में पारित करवा दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी इस बार हैरानीजनक रही।
अब हरियाणा सरकार ने क्रियान्वयन याचिका लगाई है ताकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले को मूर्त रूप में लागू करवाया जा सके। इसमें कोई शक नहीं कि इस कानूनी लड़ाई में हरियाणा का हाथ ऊपर है।
लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण और अदूरदर्शिता भरा रवैया है। हालांकि संभावना के मुताबिक हरियाणा को सुप्रीम कोर्ट से अपने पक्ष में फैसला मिल जाएगा लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि इसका क्रियान्वयन होना तब भी दूर की कौड़ी होगी। इस मुद्दे पर अपने राज्य के तमाम राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त किए हुए पंजाब सरकार एसवाईएल के निर्माण में हरसंभव देरी और हील-हुज्जत का उपाय करेगी। इससे दोनों राज्यों के बीच और ज्यादा कटु कानूनी और राजनीतिक संघर्ष बढ़ जाएगा। पहले ही 40 से ज्यादा साल गुजर चुके हैं जब केंद्र सरकार ने उत्तरी राज्यों में जल बंटवारे को लेकर अपना पहला फैसला दिया था। हरियाणा सरकार द्वारा चुना गया मौजूदा रास्ता इस राह को और ज्यादा लंबा कर देगा। अगर हरियाणा अपने मंतव्य में सफल हो भी गया तो दोनों सूबों के लोगों के बीच बेमतलब की कटुता पैदा हो जाएगी।
दरअसल पंजाब-हरियाणा के बीच पानी का विवाद बहुत ही मामूली झगड़ा है और इसे आसानी से हल किया जा सकता है और यह समाधान उस गुंझल से कहीं ज्यादा सरल है जो इन दोनों सरकारों के वकील हमें दिखाने की कोशिश करते हैं। इस समस्या को संविधान के दायरे में रहकर राजनीतिक समझौता-वार्ता से सुलझाया जा सकता है। जाहिर है मेरे इस तरह के प्रस्ताव को दोनों पक्ष कुछ का कुछ समझेंगे। जब वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने से पहले मैंने अपना सुझाव पेश किया था तो मुझे पंजाब-विरोधी होने का ठप्पा सहना पड़ा था। अब यही मुहर हरियाणा की तरफ से लगने वाली है, जब उसे लगेगा कि मेरी बात उसके हितों के खिलाफ है।
इसका लब्बोलुबाब यह है कि हरियाणा सरकार को पिछले फैसलों में तय किए गए पानी के अपने हिस्से से कुछ कम लेने पर राजी हो जाना चाहिए। उधर पंजाब को भी नए समझौते पर तुरंत क्रियान्वयन के लिए तैयार होना होगा, जिसमें एसवाईएल नहर का निर्माण भी शामिल है। वस्तुत: सतलुज के पानी पर कोई विवाद नहीं है, झगड़ा तो रावी और ब्यास के पानी की हिस्सेदारी को लेकर है। यहां भी इस बात पर कोई संशय नहीं है कि पंजाब राज्य के बंटवारे से पहले समूचे पंजाब को 2.3 एमएएफ (मिलियन-एकड़-फीट) और राजस्थान को 1.1 एमएएफ पानी देना तय हुआ और दोनों इस पर अमल करते भी रहे। अब झगड़ा तो केवल रावी और ब्यास में बहने वाले अतिरिक्त पानी के दो मुद्दों पर है। पानी के इस हिस्से को लेकर पंजाब और हरियाणा के बीच बना मनमुटाव सीमित दर्जे का है। कोई वजह नहीं कि ईमानदार संवाद के जरिए इसे हल न किया जा सके।
पंजाब का दावा है कि बंटवारे के लिए उपलब्ध कुल पानी की मात्रा वास्तव में वह नहीं है, जिसके आधार पर पिछले फैसले आए हैं। 1955 में हुए समझौते में मोटे अनुमान के मुताबिक उपलब्ध कुल पानी 15.9 एमएएफ था। इस आरंभिक अनुमान में सुधार करते हुए इराडी ट्रिब्यूनल ने 1987 में दी अपनी रिपोर्ट में 18.3 एमएएफ बताया था। पंजाब को इस अनुमान पर आपत्ति थी। हरियाणा का तर्क है कि 3.1 एमएएफ वाली यह मात्रा काफी बड़ी है और बिना इस्तेमाल किए यूं ही पाकिस्तान जाने देना दरअसल इसे व्यर्थ करना है। कोई वजह नहीं कि मौजूदा रावी-ब्यास ट्रिब्यूनल इसे हल न कर सकता हो। परंतु पदों में रिक्तियों के चलते यह पंचाट पिछले एक दशक से ज्यादा समय से निष्िक्रय पड़ा है।
एक के बाद एक आने वाली पंजाब की सरकारों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1976 में दिए फैसले पर एतराज जताते हुए सूबे को दिए गए 22 प्रतिशत हिस्से को काफी कम बताया है। अलबत्ता 1981 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच हुए अन्य समझौते में इस मात्रा को बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया गया था। इराडी ट्रिब्यूनल ने इसमें और सुधार करते हुए अपनी पहली रिपोर्ट में पंजाब को 28 प्रतिशत हिस्सा देना तय किया था। पंजाब के राजनीतिक नेताओं ने इसे भी नागवार ठहराया था। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय जल कानून में निहित ‘अपर रिवर रिपेरियन लॉ’ का वास्ता देते हुए उपलब्ध पूरे पानी पर पंजाब का नैसर्गिक हक बताना शुरू कर दिया।
पंजाब के मालवा क्षेत्र के किसान सालों से उस पानी को इस्तेमाल करने के आदी हो गए हैं जो कानूनन हरियाणा के हिस्से का है। एक बार एसवाईएल बन गई तो यह पानी वहां जाने लगेगा। इसीलिए वे पूरे जोर-शोर, गैर-वाजिब तर्क देकर और गैरकानूनी ही सही, किसी भी तरीके से, एसवाईएल बनाने के खिलाफ डटे हुए हैं। हरियाणा सरकार को पंजाब के इन किसानों की समस्या की सच्चाई को समझना चाहिए और इराडी ट्रिब्यूनल द्वारा पंजाब के लिए तय किए गए कुल में पानी में स्वेच्छा से अपने हिस्से से कुछ अतिरक्त जल, कहें तो 5 प्रतिशत, का त्याग कर देना चाहिए।

योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव

इसकी एवज में पंजाब सरकार को भी एसवाईएल न बनने देने के अपने अड़ियलपन को तजना होगा और एक तयशुदा अवधि, कहें तो समझौते की तारीख से 6 महीनों के अंदर, इसे पूरा करना ही होगा। यहां ऐसा राजनीतिक समझौता भी जरूरी है कि भविष्य में जल विवाद को लेकर कोई कानूनी या अड़चनवादी कार्रवाई नहीं की जाएगी, न ही कोई राजनीतिक ड्रामेबाजी इस मुद्दे पर आईंदा होगी।
इस तरह का समझौता पंजाब और हरियाणा के हितों के लिए लंबे समय तक व्यावहारिक होगा। समय आ गया है कि सभी सही सोच रखने व्यक्तियों को, चाहे वे दोनों सूबों के सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी या किसान संगठन हों, आपस में तालमेल बनाते हुए अपनी-अपनी सरकारों पर दबाव बनाना होगा ताकि उन्हें समझौते की मेज पर लाया जा सके।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)


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