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आत्‍मविश्‍वास से सामर्थ्य की पहचान

Posted On May - 28 - 2017

विकेश कुमार बडोला

12705cd _vk9ubdpe5n5yme3jambbzrसामान्‍य जीवनयापन करते हुए व्‍यक्ति स्‍वयं से अधिक विचार-विमर्श नहीं करता। उसका वैचारिक मंथन केवल दैनिक आवश्‍यकताओं की वस्‍तुओं तथा उनके उपभोग की व्‍यवस्‍था करने तक सीमित रहता है। जहां जीवन में कठिनाई आई नहीं कि भविष्‍य की चिंता में सोच-सोचकर मनुष्‍य तन-मन से कमजोर होता जाता है। संकट के समय व्‍यक्ति की संचेतना जाग्रत हो उठती है। इस समय उसका कर्तव्‍य यही होना चाहिए कि वह अपने हृदय में उठती संचेतना के प्रति स्थिर रहे। वह संकटमुक्‍त होने के उपरांत भी संचेत रहे।
कष्‍टों के दौरान व्‍यक्ति में जीवन संबंधी श्रेष्‍ठताओं का विचार उभरने लगता है। उसमें हर  परिस्थिति तथा जीवन के बारे में उठने वाली प्रत्‍येक मनोवैज्ञानिक स्थिति का बहुकोणीय विश्‍लेषण करने की शक्ति उत्‍पन्‍न हो जाती है। तब जीवन के प्रत्‍येक घटनाक्रम पर आत्‍ममंथन प्रारंभ हो जाता है। किंतु यह बात विचारणीय ही नहीं अपितु व्‍यावहारिक भी है कि संकट के समय व्‍यक्ति केवल वैचारिक स्‍तर पर श्रेष्‍ठ बने रहकर जीवन नहीं चला सकता। उसे जीने के लिए अनिवार्य खान-पान, वस्‍त्र, आवास इत्‍यादि भौतिक वस्‍तुओं के लिए शारीरिक परिश्रम भी करना पड़ता है।
सामान्‍य जीवन में अचानक आई विपदा से कमजोर पड़ा व्‍यक्ति नए सिरे से जीवन संभालने के प्रति भावनात्‍मक रूप से तो आशावान रहता है परंतु व्‍यावहारिक रूप से वह निराशा से घिरा होता है। यदि व्‍यक्ति की युवावस्‍था निकल गई हो तो उसे अत्‍यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में व्‍यक्ति का आत्‍मविश्‍वास ही उसका सबसे बड़ा साथी होता है। किसी नए व जटिल लगने वाले कार्य को करने के लिए विचार, नीति और क्रियान्‍वयन की आवश्‍यकता तो होती ही है परंतु ऐसे कार्य की सफलता करने वाले के सतत आत्‍मविश्‍वास पर ही टिकी होती है। कोई भी काम व्‍यावहारिक स्‍वरूप में आने से पहले एक विचार मात्र ही होता है। कर्ता का आत्‍मविश्‍वास ही कार्य की परिणति निर्धारित करता है।
मृत्‍यु के निकट पहुंचा व्‍यक्ति भी जीवन के प्रति समुत्‍पन्‍न आत्‍मविश्‍वास के सहारे वापस जीवन मार्ग पर चलने लगता है। जीवनकाल में अनेक असफलताओं का सामना करने वाला अगर अपना आत्‍मविश्‍वास बनाए रखता है तो एक न एक दिन उसे इच्छित सफलता अवश्‍य मिलती है। विचार का प्रभावमंडल विचारशक्ति की तुलना में उसके लिए अर्जित आत्‍मविश्‍वास से अधिक बढ़ता है।
इसी प्रकार कार्य में शत-प्रतिशत सफलता कार्यबल से ज्‍यादा उसके प्रति सच्‍ची निष्‍ठा से निर्धारित होती है। निष्‍ठा की लगन आत्‍मविश्‍वास से ही संभव हो पाती है। विचारवान बनने के बाद व्‍यक्ति जीवन में हर कार्य कर सकता है और इस हेतु ऊर्जा का जो सबसे प्रभावशाली संसाधन है, वह आत्‍मविश्‍वास ही है। यदि व्‍यक्ति अपने जीवन में आत्‍मविश्‍वास की शक्ति पहचान ले तो उसे उसके लक्षित मार्ग पर पहुंचने से कोई भी नहीं डिगा सकता। वास्‍तव में आत्मिक रूप से उत्‍पन्‍न किसी कल्‍याणकारी विचार का सर्वोत्तम व्‍यवहार में परिवर्तित होना ही ‘आत्‍मविश्‍वास’ की सरल व्‍याख्‍या है। आवश्‍यकता इस व्‍याख्‍या को जीवन में गहरे उतारने की है।
किसी व्‍यक्ति के जीवन में ‘विश्‍वास’ शब्‍द का अस्तित्‍व उसके सामान्‍य जीवन परिवेश की देन है। परंतु आत्‍मविश्‍वास प्रत्‍येक व्‍यक्ति की अपनी स्‍वयं की विचार शक्ति होती है, जिसके प्रताप से वह जीवन में अपने समुचित उद्देश्‍यों की प्राप्ति के लिए सदैव प्रयासरत रहता है। जब हम अपने चारों ओर किसी के लिए भी किसी के द्वारा या अपने साथ संवाद करते समय अपने लिए भी ‘आत्‍मविश्‍वास’ शब्‍द की आंतरिक ऊर्जा से परिचित होते हैं तो हम आत्‍मविश्‍वास से संबद्ध व्‍यक्तियों की किन्‍हीं अज्ञात जीवन-शक्तियों के संपर्क में होते हैं। मनुष्‍य का जीवन किन अर्थों, आधारों, बातों व विचारों के बल पर मूल्‍यवान बनता है, इसका व्‍यक्तिगत आभास हमें आत्‍मविश्‍वास से ही मिलता है।
आत्‍मविश्‍वासी होने में इतनी ऊर्जा संगठित होती है कि मनुष्‍य अपने एक ही जीवन को अनेक बार सकारात्‍मक होकर रूपांतरित कर सकता है। आत्‍मविश्‍वास के दिव्‍य प्रभाव में मनुष्‍य अपने सर्वश्रेष्‍ठ सामर्थ्य को पहचान पाता है। समाज में या मनुष्‍यों के मध्‍य रहते हुए सभी के साथ कल्‍याण, प्रेम भावना सहित जीवनयापन करने के लिए जिस आत्‍मबल की हमें सतत आवश्‍यकता होती है, उसका आरंभिक स्रोत ‘आत्‍मविश्‍वास’ ही है।
मनुष्‍य किसी भी बात के लिए किसी दूसरे मनुष्‍य पर चाहे विश्‍वास करे या न करे, किंतु उसे सार्वभौमिक सुख-शांति के प्रथम उद्देश्‍य हेतु स्‍वयं को ‘आत्‍मविश्‍वास’ के साथ देखना अवश्‍य आना चाहिए।


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