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अस्वस्थ समाज की नब्ज पर हाथ

Posted On May - 20 - 2017

अशोक गौतम
12005cd _Image_ 00 (46)व्यंग्य साहित्य की स्वतंत्र विधा बन जाने के बावजूद भी साहित्य में अकसर यह विचार-विमर्श बराबर होता रहा है कि जब साहित्य की हर विधा में किसी न किसी रूप में व्यंग्य के तत्व विद्यमान रहते हैं तो व्यंग्य विधा के रूप में अलग से क्यों? जबकि दूसरी ओर व्यंग्य एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हो चुका है, क्योंकि परिस्थितियों ने उसे दूसरी विधाओं में ही न रहकर उसके अलग अस्तित्व की मांग की है।
असल में अन्य साहित्यिक विधाओं के बीच व्यंग्य का रूप कुछ और होता है पर जब वही व्यंग्य अपने स्वतंत्र रूप में अपने को व्यक्त करता है तो उसका फार्मेट कुछ और होता है।
व्यंग्य आज की तारीख में पाठकों और उनकी परिस्थितियों के बीच जितना मजबूत सेतु बना है उतनी शायद ही कोई दूसरी विधा देखी जा रही हो। अपनी बात फटाक से कही और किनारे हो गए। पाठक सोचता रहे उसके आगे।
व्यंग्य के संदर्भ में आज जब बात होती है तो इसे दो तरह से देखा जाता है। एक तो व्यंग्य पाठक और व्यंग्य के संबंध से और दूसरे विसंगतियों और समाज के बीच में कड़ी के रूप से।
जहां तक प्रश्न आलोक सक्सेना के ‘स्वर्गवासी होने का सुख’ व्यंग्य संग्रह में संकलित व्यंग्यों का है, इस संग्रह के व्यंग्य जहां एक ओर अपने पाठकों से बड़ी चतुराई से जुड़ते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर वे समाज और विसंगतियों के बीच एक सशक्त कड़ी के न बिकने वाले गवाह भी बनते हैं।
यही वजह है कि इस संग्रह के व्यंग्य अस्वस्थ होते समाज से स्वस्थ संवाद स्थापित करने में पूरी तरह से सक्षम दिखते हैं, जिसके पीछे दो बातें साफ झलकती हैं—पहली व्यंग्यकार के पास समाज की नब्ज टटोलने का अपना लंबा अनुभव और दूसरा अपने अनुभव को पाठकों से साझा करने की प्रभावपूर्ण व्यंग्य शैली।
स्वर्गवासी होने का सुख के व्यंग्यकार आलोक सक्सेना के पास अपने व्यंग्यों के माध्यम से अपने पाठकों से संवाद करने हेतु विषयों की कोई कमी नहीं। पर अपने व्यंग्यों के लिए उन्होंने जिस मुस्तैदी से विषयों का चयन किया है, वह इस व्यंग्य संग्रह को संग्रहणीय बना देता है।
विवेचित व्यंग्य संग्रह स्वर्गवासी होने का सुख में 46 व्यंग्य संगृहीत हैं। कहने को ये 46 व्यंग्य हैं, परंतु व्यंग्यकार ने इन 46 व्यंग्यों के माध्यम से समाज को 46 कोणों से देखने की ईमानदार कोशिश की है। स्वर्गवासी होने का सुख, दो मिनट का वास्तविक प्रचार, स्वतंत्रता सेनानी की डायरी से, होली की उपाधि, मेरा कंसलटेंसी का दफ्तर, बॉस का काला कुत्ता, प्याजमय हुआ देश, केसरिया टोपी पर टिकी नजर और कलम, संग्रह के कुछ ऐसे व्यंग्य हैं जो अपने समय की सांस्कृतिक, बाजारीय, समाजवादीय, राजनीतिक विसंगतियों को पूरी ईमानदारी से पाठकों के सामने व्यंग्यात्मक भाषा-शैली में पूरे दमखम से प्रस्तुत करते हैं। इस व्यंग्य संग्रह के व्यंग्यों से गुजरते हुए आलोक सक्सेना से उम्मीद की जा सकती है कि उनके हाथों में व्यंग्य सुरक्षित रहेगा।
0पुस्तक : स्वर्गवासी होने का सुख (व्यंग्य संग्रह) 0व्यंग्यकार : आलोक सक्सेना 0प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली 0पृष्ठ     संख्या : 167 0मूल्य : ~ 200


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