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अपनों की दरिंदगी से लाचार कानून

Posted On May - 25 - 2017

असुरक्षित बच्चियां

12505cd _rape1क्षमा शर्मा
उसकी उम्र छह साल थी। पिता से अलग होने के बाद मां ने दूसरी शादी की थी। सौतेले पिता ने इस नन्ही बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। वह प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी। वहां एक टीचर ने उसे अलग से पढ़ाने का बहाना बनाकर स्कूल की छुट्टी के बाद दुष्कर्म किया। वह अपने माता-पिता के साथ एक शादी में आई थी। पड़ोस के एक परिचित लड़के ने बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। बच्ची जब बेहोश हो गई तो सबूत मिटाने को उसका गला घोट दिया। अनाथालय में रहने वाली बच्ची के साथ वहां का चौकीदार ही धमकाकर दुष्कर्म करता रहा।
सबसे जघन्य घटना नासिक में हुई। वहां सचिन नामक शराबी नशे में घर लौटा। पत्नी की गैर मौजूदगी में पांच साल की बेटी से दुष्कर्म किया। जब वह बेहोश हो गई तो आकर अपनी मां यानी कि बच्ची की दादी को बताया। दादी को लगा कि बच्ची होश में कुछ कहेगी तो उसके बेटे की बदनामी होगी। उसने बेटे से कहा कि बच्ची को हमेशा के लिए सुला दिया जाए। बस दोनों ने बच्ची का गला दबाया और शव को एक स्कूल के पास फेंक दिया। फिर दादी ने रिपोर्ट लिखवाई कि पोती का अपहरण हो गया है। शक होने पर कड़ाई से पूछताछ करने पर दोनों मां-बेटे ने अपराध कुबूल कर लिया। दादी द्वारा पोती की हत्या की घटना पर भरोसा करना कठिन है।
इन घटनाओं में से अधिकांश अपराधी या तो सीसीटीवी फुटेज के आधार पर या अंतिम बार बच्चियों के साथ जिन्होंने इन्हें देखा था, उनके बयानों के आधार पर पकड़े जा सके। दुष्कर्म के 92 प्रतिशत मामले मित्र, परिचित, रिश्तेदार और परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों द्वारा किए जाते हैं। वे नन्ही बच्चियां जिनकी आंखों में न जाने कितने सपने होंगे, जीने की कितनी चाहत होगी, उन्हें क्या पता था कि वे अपनों के ही हाथों इस तरह शिकार बनेंगी।
हालात से लगता है नन्ही बच्चियों के साथ दुष्कृत्यों की बाढ़-सी आ गई है। अपराधियों को लगता है कि इन लड़कियों की उम्र और कमजोर होने का वे लाभ उठा सकते हैं। आखिर एक वहशी आदमी के सामने इनकी क्या बिसात। इन बच्चियों के प्रति जरा सी लापरवाही जानलेवा बन जाती है। मां का जरा सा ध्यान हटा कि ये किसी हादसे का शिकार बनीं। समाज में जैसे विश्वास का लोप हो गया है।
बच्चियों के मामले में अपनों पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। अकसर इन बच्चियों के प्रति अपराध करके आमतौर पर अपराधी इनकी जान लेने की कोशिश भी करते हैं। जिससे कि इनकी हैवानियत को बताने वाला कोई न रहे। फिर ये लाश को ठिकाने लगाने की भी जुगत भिड़ाते हैं। बच्चियों के प्रति हैवानियत के ये मामले तब सामने आ पाते हैं जब बच्चियां किसी तकलीफ की शिकायत करती हैं या स्कूल जाने में आनाकानी करती हैं अथवा किसी परिचित को सामने देखकर ही डरने लगती हैं। या फिर एकाएक घर से, स्कूल से, किसी समारोह स्थल से गायब हो जाती हैं। जब इनकी तलाश की जाती है तो इनका निष्प्राण शरीर ही हाथ आता है। किसी तालाब, कुएं, किसी रेल की पटरी, किसी गड्ढे, नाले या मैदान में पड़ा हुआ।
निर्भया का आंदोलन जब चल रहा था तो मांग की जा रही थी कि एक तो अपराधी को सरेआम ऐसा दंड दिया जाए जिससे कि फिर किसी की ऐसा अपराध करने की हिम्मत न हो। दूसरा, सजा देने वाला कानून भी ऐसा कठोर हो कि अपराधी उससे खौफ खाएं। लेकिन इन दिनों जिस तरह से छोटी बच्चियां बड़ी संख्या में दुष्कर्म जैसे अपराध झेल रही हैं, उनसे लगता तो नहीं कि किसी के भी मन में दुष्कर्म के खिलाफ बने कठोर कानून या पुलिस अथवा किसी कठोर सजा का डर बैठा है। बल्कि कई बार तो ऐसा हुआ है कि एक बार दुष्कर्म करने वाला अपराधी सजा काट कर बाहर आता है और दोबारा उसी तरह के अपराध को अंजाम देता है। इनमें से कई तो किशोर होते हैं जो अब तक जुवैनाइल जस्टिस एक्ट की धाराओं का लाभ उठाकर तीन साल जेल में रहने के बाद बाहर आ जाते हैं। और अनेक बार यह घोषणा करते हुए अपराध करते हैं कि हां वे ऐसा कर रहे हैं और तीन साल में बाहर आकर फिर से ऐसा करेंगे।
महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी भी ऐसे ही किशोरों का जिक्र कर चुकी हैं। हालांकि फिलहाल जुवैनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन किया गया है। अब अगर अपराध बड़ों जैसा होगा तो किशोर अपराधी को सजा भी बड़ों जैसी ही मिलेगी।
हो सकता है कि इस तरह के बदलाव से बच्चियों के प्रति अपराध में कुछ कमी आए। मगर बदलने की जरूरत तो उस सोच की है कि किसी भी औरत या बच्ची के प्रति मात्र बच्ची या औरत होने के कारण अपराध करना जायज है। आखिर यह सोच कैसे बदले, इस दिशा में प्रयास होने चाहिए। वरना कठोर कानून का डर शायद ही किसी अपराधी को सुधारता हो।


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