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अनुभव संग गांव-देहात की बात

Posted On May - 26 - 2017

ब्लॉग चर्चा

ज्ञाानदत्त पांडेय
हम कई बार बुजुर्गों से बात करने से कतराते हैं। लेकिन कभी-कभी उनके अनुभवों में खुद को डुबाते हैं तो नजारा अलग ही होता है। आज बात करते हैं रघुनाथ पांडे की। नब्बे से ऊपर के हैं। सभी इंद्रियां, सभी फैकल्टीज चाक चौबन्द। थोड़ा ऊंचा सुनते हैं पर फिर भी उनसे सम्प्रेषण में तकलीफ़ नहीं होती। जैसा उनका स्वास्थ्य है, उन्हें सरलता से सौ पार करना चाहिये। सरल जीवन। अपनी जवानी में व्यायाम और वजन उठाने का शौक रहा है उन्हें। बताते हैं कि गांव में बारात आती थी तो मनोविनोद के लिये वेट लिफ्टिंग का कार्यक्रम होता था। तीन मन (40 सेर वाला मन) वजन उठा लेते थे वे। अपने जमाने में साइकिल भी खूब चलाते थे। एक बार बनारस भी गये हैं साइकिल से।
उनका गांव है अगियाबीर। उनके घर से अगियाबीर का टीला सामने दिखता है। वह टीला जहां खुदाई में 3300 साल पुरानी सभ्यता पाई गयी है। मध्य गंगा घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर रहा है अगियाबीर। वे प्राचीन इतिहास-प्रागैतिहास की बात करते हैं, अगियाबीर के। ‘यह जो टीले के पास से रास्ता है, यही हुआ करता था प्राचीन काल में। तब, जब जीटी रोड नहीं थी। गंगा किनारे रास्ता गया था।’ वह बताते हैं। भोजपुरी/अवधी में बात करते हैं रघुनाथ जी। उनके लड़के गुन्नीलाल पांडे ने अपने घर आमंत्रित किया था मुझे और राजन भाई को। राजन भाई उनके स्कूल के सहपाठी रहे हैं। वहीं गुन्नीलाल जी के पुत्र संजय भी मिले। गुन्नीलाल पास के मिडिल स्कूल के अध्यापक पद से रिटायर हुए। आर्थिक रूप से ठोस है यह परिवार। रघुनाथ-गुन्नी-संजय और संजय का पुत्र/पुत्री। चार पीढ़ियां रह रही हैं वहां।
मैं गुन्नीलाल जी से पूछता हूं-यह सड़क जो अगियाबीर-कमहरिया-केवटाबीर आदि गांवों को जोड़ती है, पहले भी थी? उन्होंने बताया कि पहले तो मात्र पगडंडी भर थी। लोग अपनी लड़कियों की शादी यहां करने में झिझकते थे। पर सन‍् 1986 की चकबन्दी के बाद सड़क के लिये जमीन निकली। सड़क बनने पर बहुत अन्तर आया लोगों के जीवनस्तर में। अभी भी हाट-बाजार के लिये 4-5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। रघुनाथ पांडे कहते हैं कि मिर्जापुर और भदोही जिले की रस्साकशी में अगियाबीर और द्वारिकापुर के बीच नाले पर पुल नहीं बन पाया है। गुन्नीलाल जी इस इलाके की लचर नेतागिरी का भी हाथ मानते हैं विकास न होने में। गुन्नीलाल जी के यहां चाय बहुत बढ़िया बनती है। गांव के माहौल में अमूमन चाय टरकाऊ मिलती है। ऐसा गुन्नीलाल जी के यहां नहीं है। उनके घर में पेड़-पौधों, घर की बनावट, साफ़-सफ़ाई और समग्र व्यवस्था में एक सुरुचि दिखती है। रघुनाथ पाण्डेय जी के घर का फ्रंटेज, बिना सपोर्ट के इतना बढ़िया छज्जा गांव में मैंने देखा नहीं।

साभार : हलचल डॉट ब्लॉग


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