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अक्षम्य लापरवाही

Posted On May - 23 - 2017

छात्रों के भविष्य से खिलवाड़

Edit-1छात्र-छात्राओं की किस्मत संवारने का जिम्मा संभालने वाला हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड ही यदि उनके भविष्य से खिलवाड़ करने लगे तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। काहिली और लापरवाही का आलम देखिये कि दसवीं के टॉपर छात्र को फिस्सडी घोषित कर दिया गया। लापरहवाही की हद देखिये कि बोर्ड के इतने बड़े अमले की इस चूक पर नजर नहीं गई कि हजारों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लगा है। पीड़ित छात्र ने ही फोन कर बोर्ड के अधिकारियों को सूचित किया कि रिजल्ट में खामी है। इस तरह बोर्ड की लापरवाही से प्रतिभाओं का गला घोटा जा रहा है। बोर्ड ने दलील दी कि रिजल्ट  आउट सोर्सिंग से तैयार हुआ, सो रिजल्ट तैयार करने वाली फर्म पर दो लाख का जुर्माना लगाया गया है। इस अक्षम्य अपराध के लिये दो कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर निलंबित कर दिया गया। क्या बोर्ड के शीर्ष अधिकारी इस लापरवाही के लिये जिम्मेदार नहीं हैं? क्या उन्हें पद पर बने रहने का नैतिक दायित्व है? यदि रिजल्ट देखकर हताश विद्यार्थी कोई खतरनाक कदम उठा लेते तो कौन जिम्मेदार होता? क्या यह बोर्ड की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि फाइनल रिजल्ट की कई चरणों में चाकचौबंद जांच की जाये और परीक्षा परिणाम को फुलप्रूफ बनाया जाये?
सवाल यह है कि सरकार ने सरकारी स्कूलों की देखरेख के लिए जो तमाम विभाग बना रखे हैं, क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसी चूकों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करें? दसवीं की बोर्ड की परीक्षा में जो आधे छात्र फेल हो गये हैं, उसके लिये किसकी जवाबदेही तय की जायेगी? उस पर तुर्रा ये कि दो प्रतिशत ग्रेस अंक देकर पचास फीसदी रिजल्ट आ पाया। वास्तव में केवल 34 फीसदी विद्यार्थी ही पास हो पाये थे। दो फीसदी ग्रेस का सहारा देकर मुश्किल से रिजल्ट पचास फीसदी हो पाया। जाहिर सी बात है कि सरकारी स्कूलों का सारा सिस्टम ही चौपट है। क्या फेल होने वाले छात्रों के शिक्षकों की जवाबदेही तय हो पायेगी? ऐसे तमाम कारण मौजूद हैं कि अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर निजी स्कूलों में भर्ती करवा रहे हैं। जिसका फायदा उठाकर निजी स्कूल अभिभावकों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। आज मजबूर अभिभावक ही सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने भेज रहे हैं। जब तक सरकारी स्कूल के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों, प्रधानाचार्यों व शिक्षकों की जवाबदेही तय नहीं होती, सरकारी स्कूलों के शर्मसार करने वाले परीक्षा परिणामों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहने वाला है। दरअसल राजनीतिक हस्तक्षेप व शिक्षकों के चयन में दशकों से जारी धांधली जैसे कारक सरकारी स्कूलों की नाकामयाबी की पटकथा लिख रहे हैं। ये जागने का वक्त है, अन्यथा सरकारी स्कूल छात्रों के लिए तरसते रहेंगे।


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