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योजना की जगह नीति

Posted On April - 4 - 2017

सर्वांगीण विकास ही रहे लक्ष्य

नया वित्तीय वर्ष शुरू होने से ठीक पहले देश के दीर्घकालिक विकास की रीढ़ समझी जाने वाली पंचवर्षीय योजना इतिहास के पन्नों में सिमट गयी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में कार्यभार संभालते ही नेहरू युगीन योजना आयोग को समाप्त करने की घोषणा कर दी थी। परंतु देश को विकास और प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए मोदी सरकार अभी तक पंचवर्षीय योजना का विकल्प तय नहीं कर पायी है। योजना आयोग भंग कर सरकार ने नीति आयोग बनाया परंतु उसकी भूमिका वित्त मंत्रालय को सलाह देने तक सीमित रखी गयी। किसी योजना के लिए धनराशि की मंजूरी और आकलन का अधिकार वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को दिया गया है। यह स्वाभाविक है कि वित्त मंत्रालय उन्हीं मदों और क्षेत्रों में निवेश को वरीयता देगा, जो राजस्व अर्जन के बेहतर स्रोत होंगे। ऐसे में, समाज कल्याण की योजनाओं को धन की कमी की मार झेलनी पड़ सकती है। देश में विकास को गति देने के लिए नीति आयोग का अधिकार-संपन्न होना जरूरी है। आजाद देश की जर्जर माली हालत और विकास की तात्कालिक जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना की नीव रखी व योजना आयोग का गठन किया। पहली पंचवर्षीय योजना में बांधों, सिंचाई योजनाओं और कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश को प्राथमिकता दी गयी। आगे जाकर उद्योग, गेहूं उत्पादन, हरित क्रांति, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन, आर्थिक उदारीकरण और आर्थिक-सामाजिक विकास में निवेश को पांच साला योजनाओं का आधार बनाया गया। सात दशक तक पंचवर्षीय योजनाओं की बदौलत ही देश का सर्वांगीण विकास हुआ।
यह ठीक है कि प्रधानमंत्री ने नीति आयोग को दीर्घ अवधि का योजना दस्तावेज तैयार करने, मध्यम अवधि की रणनीति निर्धारित करने और कम अवधि की कार्ययोजना बनाने को कहा है, परंतु नीति आयोग का काम अभी प्राथमिक चरण में है। कई मामलों में उसे वित्त मंत्रालय की मंजूरी मिलनी बाकी है। सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया तथा डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं लेकर जरूर आयी है परंतु इन योजनाओं के बलबूते देश के आर्थिक, सामाजिक और योजनागत विकास को कितनी रफ्तार मिल पायेगी, कहना कठिन है। परंतु इतना जरूर है कि नीति आयोग को योजनाएं तैयार करने, निर्धारित करने व उनके आकलन में सक्रिय भूमिका देकर और पंचवर्षीय योजना की जगह वैकल्पिक योजना से  ‘सबका साथ, सबका विकास’ संभव होगा।


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