सिल्वर स्क्रीन !    हेलो हाॅलीवुड !    साहित्यिक सिनेमा से मोहभंग !    एक्यूट इंसेफेलाइिटस सिंड्रोम से बच्चों को बचाएं !    चैनल चर्चा !    बेदम न कर दे दमा !    दिल को दुरुस्त रखेंगे ये योग !    कंट्रोवर्सी !    दुबला पतला रहना पसंद !    हिंदी फीचर फिल्म : फर्ज़ !    

महाराष्ट्र में किस करवट बैठेगा ऊंट?

Posted On April - 8 - 2017

10804cd _marashtar_cotton_farmer_sucicide_20060213अजय गर्ग
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हाल ही सत्तासीन हुई भाजपा सरकार की किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही अन्य राज्यों की सरकारें भी ऐसी घोषणा कर सकती हैं। इन राज्यों में महाराष्ट्र का नाम भी है। हालांकि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस जल्दबाजी में निर्णय लेने वालों में नहीं है। लेकिन वे खुद किसान राजनीति के गढ़ विदर्भ से आते हैं और वहां की जमीनी हकीकत से भली-भांति परिचित हैं। ऐसे में नहीं लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार की देखा-देखी वे जल्दबाजी में कर्जमाफी जैसी कोई घोषणा करेंगे, जो किसानों के लिए तात्कालिक एवं सीमित राहत तो लेकर आये, लेकिन उसके दूरगामी लाभ न हों।
आसार यही हैं कि कर्जमाफी की बढ़ती मांग के दबाव को दरकिनार करते हुए फड़णवीस राजकोष का उपयोग किसानों को फौरी राहत पहुंचाकर वाहवाही बटोरने के बजाय बुनियादी स्तर पर काम करके मूल समस्याओं के समाधान का विकल्प चुन सकते हैं। उनका जोर सिंचाई परियोजनाओं को सिरे चढ़ाने और वर्षाजल संचयन जैसे विकल्पों के प्रसार करने पर रह सकता है। ऐसे कयास लगना स्वाभाविक है। जिस तरह से मीडिया यूपी सरकार खासकर वहां के सीएम आदित्यनाथ योगी को माइलेज दे रहा है और इस कारण जिस तेजी से जनता के बीच योगी की पैठ मजबूत होती दिख रही है, उसे देखकर अन्य राज्यों की सरकारों का मन ललचाना अवश्यंभावी लग रहा है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में कर्जमाफी की घोषणा भारतीय जनता पार्टी के चुनावी वादे को पूरा करने की कवायद थी, लेकिन इसके दूरगामी परिणामों को देखते हुए कम-से-कम भाजपा-शासित राज्य अवश्य ही उत्तर प्रदेश का अनुसरण कर सकते हैं। इन राज्यों में से सबसे ज्यादा उम्मीद महाराष्ट्र से है। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, यहां के विदर्भ इलाके में कर्ज से परेशान किसानों की आत्महत्या का लंबा इतिहास रहा है और किसानों की हालत के प्रति उदासीनता के आरोपों के बीच यहां अब तक की सरकारों की छिछालेदार होती रही है। ऐसे में कर्जमाफी की घोषणा वर्तमान सरकार के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकती है। दूसरे, महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस भी योगी की तरह युवा हैं। माना जा रहा है कि वे ऐसा साहसिक फैसला ले सकते हैं।
हालांकि, किसी भी तरह की आस लगाने तथा कुछ भी मान लेने से पहले विदर्भ और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में किसानों की स्थिति एवं दिक्कतों को जान लेना जरूरी है। साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि क्यों विदर्भ का किसान ही इतने बड़े पैमाने पर आत्महत्या कर रहा है और क्यों राज्य के अन्य हिस्सों में आत्महत्या की दर विदर्भ की अपेक्षा नगण्य है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान केंद्र की मनमोहन सरकार की तरफ से विदर्भ को विशेष राहत पैकेज दिए जाने की उपयोगिता एवं असर का लेखा-जोखा भी महाराष्ट्र में ऐसा कोई फैसला लिए जाने की सोच को प्रभावित कर सकता है।
महाराष्ट्र की भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के जानकार मानते हैं कि समुचित सिंचाई व्यवस्था का अभाव विदर्भ के किसान की खराब स्थिति का सबसे बड़ा कारण है। विदर्भ में भूजल का स्तर काफी गहरा है और कृषि के लिए जल उपलब्ध कराने के मामले में अब तक की सरकारें ढिलाई बरतती रही हैं। योजनाएं बनती रही हैं, मगर उन्हें साकार करने के लिए धनराशि जारी करने में उदासीनता दिखाई जाती रही हैं। युवा नेता एवं महाराष्ट्र को करीब से जानने वाले जयप्रकाश सिंह कहते हैं, ‘महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से ही राजकोषीय चाबी कमोबेश पश्चिमी महाराष्ट्र से संबंधित नेतृत्व के पास रही है और विदर्भ कभी उनकी प्राथमिकताओं में नहीं रहा। वहां के किसानों की आत्महत्या के पीछे असल कारण कर्ज का बोझ नहीं, बल्कि भविष्य अंधकारमय नजर आने से पैदा होने वाली निराशा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल कर्जमाफी की घोषणा से विदर्भ के किसान की हालत बेहतर हो सकती है? विदर्भ और महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों के किसानों की स्थिति में अंतर की दूसरी वजह अलग-अलग सांस्कृतिक इतिहास को माना जा सकता है। हालांकि, कोई तथ्यात्मक प्रमाण मौजूद नहीं है, लेकिन माना जाता रहा है कि विदर्भ (जो आजादी के तुंरत बाद सेंट्रल प्रोविंस का हिस्सा था) की अपेक्षा मराठवाड़ा (हैदराबाद स्टेट का हिस्सा) तथा पश्चिमी महाराष्ट्र (बॉम्बे स्टेट का हिस्सा) का किसान पारंपरिक तौर पर अधिक संघर्षशील प्रवृत्ति का रहा है। तीसरे, यह भी माना जाता है कि विदर्भ में साहूकारी प्रथा के गहरे पैठे होने का नकारात्मक एवं भावनात्मक असर वहां के किसान पर पड़ा है और पहले से ही सरकारी उदासीनता का दंश झेल रहे विदर्भ के किसानों का लोन कृषि कार्यों पर लगने के बजाय साहूकारों का सूद चुकाने में खर्च हो जाता है और उनके हालात जस-के-तस बने रहते हैं।
मनमोहक नहीं रहा 2006 का विदर्भ पैकेज : मनमोहन सरकार ने साल 2006 में विदर्भ के लिए करीब 3750 करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की थी। इसमें से कुछ हिस्सा किसानों के कर्ज पर ब्याज को चुकता करने के लिए था, तो एक बड़ा हिस्सा कृषिभूमि-आधारित अन्य व्यवसायों यथा मुर्गीपालन, मत्स्यपालन इत्यादि को प्रोत्साहन देने के लिए था। इसके बावजूद विदर्भ के किसानों की स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ और आत्महत्याओं की दर बदस्तूर बनी रही। समय-समय पर राज्य की विभिन्न सरकारें भी विदर्भ की झोली में राहत पैकेज डालती रही हैं, लेकिन उनमें से कितनी राशि का सही उपयोग हो पाता रहा है, यह जानने-समझने का विषय है।


Comments Off on महाराष्ट्र में किस करवट बैठेगा ऊंट?
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.