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मन-मस्तिष्क भी स्वच्छ बनाइए

Posted On April - 13 - 2017

11304cd _Swachta ka sanskar_0सत्याग्रह शब्द अपनाने में गांधीजी को भले ही काफी सोच-विचार करना पड़ा हो, काफी समय लगा हो, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनायास ही एक बहुत अच्छा शब्द गांधीजी के लिए चुना है-स्वच्छाग्रही। इस शब्द का सीधा-सा मतलब है, वह जो स्वच्छता के प्रति आग्रह रखता हो।
प्रधानमंत्री ने चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी के उपलक्ष्य में राजधानी दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि राष्ट्रपिता मूलतः स्वच्छाग्रही थे और उनके लिए स्वच्छता राजनीतिक आज़ादी से भी अधिक महत्वपूर्ण थी। उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को गांधीजी को अर्पित की गयी श्रद्धांजलि कहा है। लगभग दो साल पहले प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत अभियान प्रारंभ किया था और अब देश के लगभग दो लाख गांव ‘खुले शौच’ के अभिशाप से मुक्त करा देने की बात कही जा रही है। बावजूद इसके कि इस अभियान से दिखावे का भी गहरा रिश्ता है, निश्चित रूप से सफाई के प्रति एक जागरूकता अवश्य दिखाई दे रही है।
इसे एक अच्छी शुरुआत माना जाना चाहिए। और यह भी सही है कि गांधीजी ने भी स्वच्छता को एक अभियान की तरह चलाया था। लेकिन गांधीजी की स्वच्छता सिर्फ घर या गली या मोहल्ले की सफाई तक सीमित नहीं थी। स्वच्छता गांधीजी के लिए एक मूल्य थी, जिसका सीधा रिश्ता समूचे जीवन से था। यदि स्वच्छता के माध्यम से ही राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देनी है तो इस स्वच्छता को तन ही नहीं, मन और मस्तिष्क की स्वच्छता से भी जोड़ना होगा। गांधीजी का कोई काम इकहरा नहीं होता था, सब कुछ जैसे योजनाबद्ध तरीके से सोची-समझी रणनीति के तहत होता था। सौ साल पहले चंपारण में नील की खेती करने वाले खेतिहरों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ चलाये गये अभियान में गांधीजी ने सत्याग्रह की नीव रखी थी। पर यह सत्याग्रह सिर्फ गोरों के अन्याय तक ही सीमित नहीं था-एक व्यापक दृष्टि जुड़ी थी इसके साथ। वहीं गांधीजी ने शिक्षा में बदलाव की बात की, खेती को अधिक लाभप्रद बनाने पर ज़ोर दिया, अदालतों के प्रति जनता के रवैये और जनता के प्रति अदालतों के रवैये में बदलाव की ज़रूरत को समझाया। यही गांधीजी की विशेषता थी-गांधीजी व्यक्ति की सोच में परिवर्तन लाने के पक्षधर थे। सही सकारात्मक परिवर्तन वह क्रांति थी, जो वे करना चाहते थे।
इसीलिए, हमें यह समझना होगा कि गांधीजी की स्वच्छता सिर्फ घर-बाहर बुहारने तक सीमित नहीं थी-वे मन और मस्तिष्क की सफाई भी करना चाहते थे। सफाई उनके लिए शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई आवश्यकता नहीं थी, यह एक अवधारणा थी व्यक्ति और समाज की संपूर्ण सोच को स्वस्थ बनाने की। स्वच्छ-स्वस्थ सोच अर्थात एक ऐसा सकारात्मक नज़रिया जो जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र बन सके। आज हमें गांधीजी के उस नज़रिये की ज़रूरत है।
आज जब हम भारत में सत्याग्रह की शताब्दी मना रहे हैं, राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करने की बात कर रहे हैं-स्वच्छाग्रही बताकर गांधीजी के जीवन से कुछ सीखने की बात कर रहे हैं तो यह भी सीखना ज़रूरी है कि हम उन मूल्यों-आदर्शों को समझें जिन्हें अपनाकर राष्ट्रपिता ने एक नये समाज के निर्माण का सपना देखा था। हमें पूछना होगा अपने आप से कि यदि ‘स्वच्छाग्रही गांधी’ होते तो वे आज हमसे क्या अपेक्षा करते? गांधीजी उस सारी गंदगी को मिटाने की बात करते जो आज हमारे वैयक्तिक और सामाजिक जीवन को विषाक्त बना रही है। गांधीजी ने हमें सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। संवेदनशील बनने की शिक्षा दी थी। धर्म, जाति, वर्ण-वर्ग से ऊपर उठकर एक मनुष्य के रूप में जीने की प्रेरणा दी। वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में ईमानदार आचरण के मानक स्थापित किये थे गांधीजी ने। सवाल यह है कि इन मानकों पर हम कितने खरे उतर रहे हैं? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन मानकों के प्रति हम जागरूक कितने हैं?
हमने अपने नेताओं के झाड़ू हाथ में लेकर सफाई का नाटक करने के चित्र बहुत देखे हैं। सवाल यह है कि इस कृत्य में ईमानदारी क्यों नहीं झलकती। वह कचरा क्यों नहीं देख पाते हम, जिसने हमारी सोच को मैला कर रखा है? इक्कीसवीं सदी में जीने का दावा तो हम करते हैं पर आज भी सदियों पुरानी सोच को जी रहे हैं हम। आज भी देश में धर्म के नाम पर खून-खराबा होता दिख जाता है।
आज भी हम जाति के नाम पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं। भाषा के नाम पर झगड़ने लग जाते हैं हम। वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारों को हमने देश-प्रेम की परिभाषा बना रखा है। कभी परायी भाषा न बोल पाने से हम शर्मिंदा होते हैं और कभी हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आने लगती है। भ्रष्टाचार आज हमारे जीवन का स्वीकृत सत्य बना हुआ है। मंदिर-मस्जिद के झगड़े से हम उबर नहीं पा रहे। यह सब कुछ हमारी कचरे वाली सोच का परिणाम है। ज़रूरत इस सोच को साफ करने की है।
आज यदि गांधीजी होते तो क्या करते? गांधीजी विवेक का झ़ाड़ू लेकर सोच के इस कचरे को साफ करने में लगे होते। वे हमें बता रहे होते कि घर-आंगन बुहारना ज़रूरी है, लेकिन उतना या उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है मन और मस्तिष्क की मैल को साफ करना। इसी मैल के चलते आज हम एक-दूसरे से दूर हैं और दूर होते जा रहे हैं। जब हमारी सोच साफ होगी, मन निर्मल होगा, तब हम मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखेंगे। हमारा धर्म, हमारी जाति, हमारा वर्ण, हमारा वर्ग, यह सब कुछ महत्वपूर्ण है, लेकिन इस सबसे

विश्वनाथ सचदेव

विश्वनाथ सचदेव

अधिक महत्वपूर्ण है हमारा मनुष्य होना। और मनुष्यता की पहली पहचान यह है कि हम मनुष्य को सबसे ऊपर मानें।
मनुष्य होने का अर्थ है दूसरे की पीर को अनुभव कर पाना। दुर्भाग्य से, आज इस संवेदना से हीन होता जा रहा है मनुष्य। मनुष्य कहलाना तो हमें पसंद है, पर न हम मनुष्य बनने की आवश्यकता महसूस करते हैं और न ही मनुष्य बनने, बने रहने की कोशिश करना चाहते हैं हम। यही है कचरे वाली सोच। इस कचरे को साफ करना ज़रूरी है। गांधीजी मन और मस्तिष्क की इस स्वच्छता के आग्रही थे। वे सिर्फ आग्रह नहीं करते थे, विवेक का झाड़ू लेकर सफाई में जुट भी जाते थे।
आज जब हम चंपारण में हुए सत्याग्रह की शताब्दी मना रहे हैं तो राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि वह स्वच्छ भारत देना होगा, जिसमें व्यक्ति का आचरण विवेक की झाड़ू से धुला-पुछा हो। एक विवेकशील राष्ट्र होगा राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि-स्वच्छ मन वाला, स्वच्छ मस्तिष्क वाला भारत!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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