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भोजन का अनुशासन

Posted On April - 13 - 2017

सरकार की पहल के निहितार्थ

देश के बड़े होटलों में भोजन की अंधाधुंध हो रही बर्बादी रोकने के बारे में सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। इसकी जद में स्टार ग्रेड रेस्तरां भी शामिल होंगे। रोजाना क्विंटलों के हिसाब से खाना गटर में जाता है, जबकि देश का अधिकांश बचपन कुपोषण का शिकार है और भुखमरी की समस्या मुंह बाये खड़ी है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2016 की रिपोर्ट के आंकड़े भी यही बताते हैं कि भुखमरी व कुपोषण की स्थिति को लेकर भारत 118 देशों की सूची में 97वें पायदान पर है। भोजन की बर्बादी रोकने के लिए सरकार की चिंता सराहनीय है, लेकिन इसे रोकने के तौर-तरीके नि:संदेह बहस का मुद्दा हो सकते हैं। वैसे भी सरकार का कोई हक नहीं बनता कि वह यह फैसला करे कि किस उपभोक्ता को कितना भोजन परोसा जाए? यह तो आमजन की निजता में दखल जैसा है। यह ज्यादा देर की बात नहीं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘न्यूनतम शासन’ की बात करके लोगों की निजी स्वतंत्रता की वकालत की थी और अब उनके मंत्री ऐसे फैसले लागू करके ढाबों, होटलों में लोगों की निजता के अधिकार का हनन कर रहे हैं।
अध्ययन भी तो यही बताता है कि जितना भोजन संस्थानों में सामूहिक रूप से बर्बाद होता है, उतना निजी रूप में नहीं। हर साल 30 फीसदी सब्जियां तथा फल सड़ जाते हैं क्योंकि उनके भंडारण के लिए उचित व्यवस्था नहीं है। फिर लाखों टन खाद्यान्न जो हर साल बर्बाद होता है, उसके भंडारण के बारे में सरकार मौन क्यों है? उपभोक्ता की थाली पर नजर रखने की बजाय सरकार इन मुद्दों पर भी तो सोचे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा शराब पर लगाई पाबंदी से होटल उद्योग का आर्थिक ढांचा पहले से ही हिल गया है। इन हालात में ऐसा नहीं लगता कि होटल इंडस्ट्री सरकार के फैसले से सहमत होगी क्योंकि सरकार के इस फैसले में सबसे बड़ा स्टेकहोल्डर होटल ही हैं। यह सही है कि भोजन की बर्बादी को मुख्य रखकर ही यूरोप के कई देशों के होटलों में खाना जूठा छोड़ने पर पाबंदी लगी है। यह होटलों की निजी व्यवस्था है। इस बर्बादी के खिलाफ स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए सामाजिक जनचेतना जाग्रत करना तो सही दिखता है लेकिन इसमें सरकार की घुसपैठ उपभोक्ता के अधिकारों का अतिक्रमण है।


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