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बर्फ पिघलने से बढ़ेगी आतंकी तपिश

Posted On April - 5 - 2017

10504CD _KASHMIR_CLASHES_PTI_640X400_51468149159कश्मीर घाटी में वर्ष 2016 कुल मिलाकर बहुत उथल-पुथल वाला रहा है। इसमें आतंकी बुरहान वानी का प्रसंग भी शामिल है, जिसने बड़ी दक्षता से सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करते हुए पत्थरबाज युवाओं को सुरक्षा सेनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करने हेतु बरगलाए रखा था। पत्थरबाजी के उत्साह को सर्दियों की बर्फ ठंडा कर देती है। लेकिन पाक-अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान की आरामदायक पनाहगारों में बैठे योजनाकार युवाओं के भविष्य की कीमत पर मंसूबे पूरा करते हैं।
आने वाले कुछ हफ्तों में बर्फ पिघलने से बंद पड़े रास्ते खुलने को हैं। इसके मद्देनजर भारत को एक पत्थरबाजी भरी ग्रीष्म ऋतु का सामना करने के लिए खुद को तैयार रखना होगा। आईएसआई की कोशिश होगी कि एलओसी पार करने वाले कश्मीरी युवा लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के नये जिहादी रंगरूटों के साथ मिलकर ‘तोप-का-चारा’ बनते रहें। लिहाजा घाटी के बेरोजगार युवकों को अच्छे धन का लालच देकर पत्थरबाजी के लिए लालायित करवाया जाएगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके भी लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले संदेश गढ़कर अलगाववाद को उकसाया जाएगा। इस बीच पाकिस्तान अपने धुआंधार प्रचार से दुनिया के देशों को बरगलाएगा कि वे दखलअंदाजी करने हेतु बीच में आएं। ‘बृहद वार्ता प्रक्रिया’ को फिर से शुरू करने के लिए भारत को मजबूर करें।
आखिर पाकिस्तान इस तथाकथित ‘बृहद वार्ता प्रक्रिया’ पर इतना जोर क्यों दे रहा है ? दरअसल वर्ष 1997 में शर्म-अल-शेख सम्मेलन में शुरू की गई यह प्रक्रिया भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है, जिसमें हमारे राजनयिक विभाग के अनाड़ीपन का भी उतना ही बड़ा योगदान रहा है। इस ‘वार्ता प्रक्रिया’ के अंतर्गत ज्यादा तरजीह उन्हीं विषयों को दी गई है जो असल में पाकिस्तान को सबसे मुफीद बैठते हैं। मसलन जम्मू-कश्मीर समस्या, सियाचिन और सर क्रीक से संबधित सीमा-विवाद और जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा शुरू की गई पनबिजली परियोजानाएं, जिन्हें वह शिद्दत से रुकवाना चाहता है। इस सूची में आतंकवाद का विषय कहीं नीचे जाकर आता है। इसमें भी पाकिस्तान नशा-स्मगलिंग को आतंकवाद से जोड़कर इस मुद्दे को और भी ज्यादा हाशिए पर ढकेलना चाहता है। इसीलिए वह अपना जोर आतंकवाद पर चर्चा को आम विषयों जैसे कि सांस्कृतिक रिश्ते और वीजा आदि मामलों के साथ सरसरी तौर पर उठाने पर ही लगा रहा है।
एलओसी के पार बने आतंकी ठिकानों पर हमारी सेना द्वारा पिछले साल 29 सितंबर को की गई सर्जिकल स्ट्राइक के मायने केवल प्रतीकात्मक महत्व से कहीं ज्यादा हैं क्योंकि इस कार्रवाई से स्थापित सीमा रेखा से परे जाकर सैन्य अभियान करने की भारत की इच्छाशक्ति झलकती है, यह भी कि कब, कहां और किस तरीके से की जाएगी, इसका फैसला केवल भारत ही करेगा। हाफिज सईद और दाऊद इब्राहिम जैसों को इस मुगालते में रहने की इजाजत नहीं होनी चाहिए कि वे खुद को भारतीय कार्रवाई की जद से बाहर महफूज समझते रहें। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की खातिर हमें तथाकथित समूची ‘बृहद वार्ता प्रक्रिया’ को खारिज कर देना चाहिए। उसे बताना है कि जब परिस्थितियां माकूल बना दी जाएंगी तब ही भारत सभी मुद्दों पर विचार करने का इच्छुक है।
भारत को जोर देना चाहिए कि उफा शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच जो समझौता हुआ था, उसी के मुताबिक चलना होगा, जिसमें पहले-पहल दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच बैठकों का प्रावधान था ताकि सीमा को सील करके घुसपैठ एवं आतंक पर लगाम लगाने हेतु निश्चित उपायों पर विचार-विमर्श किया जा सके। वार्ता के इस स्तर को आगे बढ़ाते हुए भारत के उपसेनाध्यक्ष और पाकिस्तान के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के मध्य वार्ता और जरूरत पड़ने पर दोनों तरफ के सेनाध्यक्षों की भेंट भी की जा सकती है। हालांकि किसी को भी पाक के सामरिक ध्येयों में महत्वपूर्ण बदलाव होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
दरअसल वार्ता सुरक्षा संबंधी होनी चाहिए और इसमें भारत की ओर से सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान की तरफ से रेंजर्स के प्रमुखों को भी शामिल किया जाना चाहिए। दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों ‘रॉ’ और ‘आईएसआई’ के शीर्ष अधिकारियों के बीच बैठक पर भी विचार किया जा सकता है। विदेश सचिव और राजनीतिक स्तर की बैठकों का दौर फिर से तब तक शुरू नहीं किया जाना चाहिए जब तक आतंकवाद को लेकर हमारी चिंताओं पर पाकिस्तान कोई ठोस कदम न उठाये। भारत को अपने पूर्वी पड़ोसी मुल्कों से संबंधों को अन्य मंचों जैसे बीबीएन और ‘बिमस्टेक’ के जरिए प्रगाढ़ करना चाहिए।
लगता नहीं कि पाकिस्तान आतंकवाद समेत अन्य मुद्दों पर कुछ अर्थपूर्ण कदम उठाएगा। नवाज शरीफ विदेशों में संपत्तियों और छुपाए धन के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए विपरीत आदेशों से अपने देश के अंदर घिरे पड़े हैं। इसके अलावा पाकिस्तानी समाज शिया-सुन्नी और वहाबी-सुन्नी वर्ग संघर्षों से उपजी हिंसा और प्रतिद्वंद्विता में बंटता जा रहा है। इसके अलावा वह बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से लगी सीमा पर पश्तून विद्रोहियों से लड़ाई में लिप्त है। पाकिस्तानी सेना को अफगानिस्तान से लगती ड्यूरंड रेखा के आरपार बसे जनजातीय कबीलों और बलूचिस्तान में उसी की भाषा में जवाब मिल रहा है। वर्गीय संघर्ष अब पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों तक भी आ पहुंचा है। भारत कोशिश करे कि अफगानिस्तान को आईएसआई प्रायोजित आतंकवाद से निपटने हेतु भरपूर मनोबल, संसाधन और राजनयिक समर्थन मिलता रहे।
जहां एक ओर आईएसआई प्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिए हमें सुरक्षात्मक और राजनयिक उपाय जारी रखने होंगे वहीं साथ ही अन्य कड़े घरेलू उपाय भी जारी रखने होंगे ताकि पत्थरबाजों को बढ़ावा, उकसाने और मदद देने वाले तत्वों को स्पष्ट संकेत मिलें। अभी तक तो हुर्रियत कानफ्रेंस द्वारा हिंसा भड़काने और समर्थन देने वाला रवैया

जी. पार्थसारथी

जी. पार्थसारथी

रखने के बावजूद भारत सरकार का रुख उसके प्रति अपेक्षाकृत नर्म रहा है। सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेता जो सीमा पार से मिले निर्देशों के मुताबिक हिंसा को भड़काने में आगे रहते हैं, उन्हें घाटी से बाहर करके उन पर मुकदमा दर्ज करके कानूनी कार्रवाई हो। यहां तक कि मीर वायज उमर फारूख, जिनके प्रति बहुत उदार रवैया अपनाया जाता रहा है, वह भी अपने नेतृत्व में पढ़ी जाने वाली नमाज के बाद दिए गए भाषणों में भीड़ को भड़काने का काम अंजाम देते दिखाई देते हैं। पत्थरबाजों को भड़काने और इस काम के लिए युवकों को पैसे बांटने वालों को तुरंत गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे बंद करना चाहिए।
राज्य पुलिस को सेना की मदद लेने के अलावा विशेष कार्रवाई दलों को तुरंत सक्रिय करने हेतु राज्य सरकार द्वारा राजनीतिक नेतृत्व दिए जाने की जरूरत है। आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे पुलिस अधिकारियों के परिवार वालों को खुलेआम धमकियां दे रहे हैं। कोई वजह नहीं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस को आतंकवाद के दौर में पंजाब पुलिस जैसी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित न किया जाए। इससे अलावा हालात को काबू करने में सरकार को सोशल मीडिया के उपयोग को सीमित व पूर्ण पाबंदी लगाने के लिए तैयार रहना चाहिए। महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में चल रहे सत्तारूढ़ गठबंधन के भागीदारों को अपने आपसी मतभेद भुलाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों की शिक्षा-दीक्षा अलगाववादी नेताओं और सीमा पार बैठे उनके आकाओं के फरमानों की वजह से बंधक न बनने पाए।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं।)


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