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बढ़ते तापमान को रोकना लक्ष्य हो

Posted On April - 4 - 2017

ज्ञाानेन्द्र रावत

10404cd _global_warming_in_himachalआज ग्लोबल वार्मिंग समूची दुनिया के लिए गंभीर चुनौती है। सभी देश अब इसकी गंभीरता को समझ चुके हैं। यदि इस मामले में देर की गई तो आने वाले दिनों में मानव जीवन का अस्तित्व खतरे में होगा। जहां तक ग्लेशियरों का सवाल है, समूची दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला माउंट एवरेस्ट बीते 5 दशकों से लगातार गर्म हो रही है। इससे इसके आसपास के हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं।
चीन के चाइनीज एकेडेमी ऑफ साइंसेज, हुनान यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एण्ड माउंट कुमोलांग मा स्नो लियोपार्ड कंजरवेशन सेंटर के शोध ने खुलासा किया है कि 8,844 मीटर ऊंची इस चोटी में हिमखंड काफी तेजी से पिघल रहे हैं। चाहे हिमालय के ग्लेशियर हों, तिब्बत के या फिर वह आर्कटिक ही क्यों न हो, वहां पर बर्फ के पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। असलियत यह है कि हिमालय के कुल 9600 के करीब ग्लेशियरों में से तकरीबन 75 फीसदी ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
इसरो ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हमेशा बर्फ से ढका रहने वाला हिमालय अब बर्फविहीन होता जा रहा है। सैटेलाइट चित्रों के आधार पर इसकी पुष्टि हो चुकी है कि बीते 15-20 सालों में 3.75 किलोमीटर की बर्फ पिघल चुकी है। इसका सबसे बड़ा कारण समूचे हिमालयी क्षेत्र में तापमान में तेजी से हो रहा बदलाव है। हिमालय क्षेत्र में गंगोत्री और यमुनोत्री ये दो ग्लेशियर प्रमुख हैं। गंगोत्री ग्लेशियर की लम्बाई जहां 30 किलोमीटर है वहीं यमुनोत्री की लगभग 5 किलोमीटर है। असल में हिमालय के बहुतेरे ग्लेशियर हर साल कई मीटर तक पीछे खिसक रहे हैं। जंगलों में लगने वाली आग से निकला धुआं और कार्बन से ग्लेशियरों पर एक महीन-सी काली परत पड़ रही है। यह कार्बन हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी के साथ बहकर लोगों तक पहुंच रहा है जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
गौरतलब है कि 75 फीसदी ग्लेशियर पिघलकर झरने और झीलों का रूप अख्तियार कर चुके हैं। सिर्फ आठ फीसदी ही ग्लेशियर स्थिर हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो अभी भी कुछ ग्लेशियर बहुत ही अच्छी हालत में हैं। यह ग्लेशियर कभी भी गायब नहीं होंगे। गौरतलब है कि इसरो का यह अध्ययन हिमालय के ग्लेशियर तेजी से गायब हो रहे हैं, इस मिथ को धता बताने के लिए किया गया था। लेकिन इसके नतीजे काफी परेशान करने वाले निकले। इसरो के इस अभियान को विज्ञान, पर्यावरण और वन मंत्रालय ने मंजूरी दी थी ताकि संयुक्त राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय रपट का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।
अध्ययन के अनुसार यह ग्लेशियर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मुहाने पर स्थित हैं। इसके अलावा इनमें से कई ग्लेशियर चीन, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान में भी हैं। आईपीसीसी ने भी आज से तकरीबन आठ-दस साल पहले जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2035 तक हिमालय के सभी ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के चलते खत्म हो जायेंगे। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले 200 सालों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते आइसलैण्ड के सभी ग्लेशियर खत्म हो जायेंगे।
इसके अलावा दक्षिण-पश्चिम चीन के किंवंघई-तिब्बत पठार क्षेत्र के ग्लेशियर भी ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से पिघल रहे हैं। चीन के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तिब्बत के ग्लेशियरों के पिघलने की दर इतनी तेज है, जितनी पहले कभी नहीं थी। शोध के परिणामों से इस बात की पुष्टि होती है कि 2400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा पिघल चुका है। इस शोध में तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र और सतलुज पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का जिक्र नहीं किया गया है।
वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा मानवीय गतिविधियां और जरूरत से ज्यादा दोहन भी ग्लेशियरों के पिघलने का एक बड़ा कारण है। ग्लेशियरों के पिघलने से आर्कटिक क्षेत्र की भविष्य में वैश्विक कार्बन सिंक के रूप में काम करने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ेगा। यदि इसी रफ्तार से बर्फ पिघलती रही तो आने वाले 40 सालों में आर्कटिक बर्फ रहित हो जायेगा।
दरअसल वैज्ञानिक न केवल बर्फ के पिघलने से चिंतित हैं बल्कि वह इससे समुद्र के स्तर में होने वाले इजाफे को लेकर भी चिंतित हैं। उनका मानना है कि आने वाले 30-40 सालों में समूचा आर्कटिक क्षेत्र बर्फ से मुक्त हो जायेगा। बीते दिनों उत्तराखण्ड की नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा-यमुना को मानव का दर्जा देने के बाद अब गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियरों को मानव का दर्जा देने की घोषणा की है। उसने ग्लेश्यिरों को दिये गए जीवित व्यक्ति के अधिकार का उपयोग करने के लिए छह सदस्यीय समिति गठित की है। आशा की जाती है कि इससे इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां सीमित होंगी लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा तो तापमान में हो रही वृद्धि पर अंकुश लगाने का है। इसके बिना सारे प्रयास बेमानी होंगे।


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