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पाक जनमत को करें प्रभावित

Posted On April - 17 - 2017

Pakistanकौटिल्य कहते हैं कि राजा को अपने प्रतिद्वंद्वी देश में जासूस भेज कर वहां की जनता को अपने पक्ष में मोड़ना चाहिए। इस मंत्र को लागू करने की जरूरत है। पाकिस्तान में इस मंत्र को लागू करना आसान है चूंकि वहां की जनता सरकार से उत्पीड़ित है। जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर चुनिंदा परिवारों के शिकंजे को तोड़ दिया था। उन्होंने जमीदारी प्रथा को समाप्त किया। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीदारों के पास सैकड़ों एकड़ जमीन को अधिगृहीत करके आम आदमी को वितरित किया। इससे राजाओं एवं जमीदारों की कमर टूट गई। साथ-साथ उन्होंने प्रमुख औद्योगिक परिवारों पर भी निशाना साधा। उन्होंने अर्थव्यवस्था की बागडोर को सार्वजनिक इकाइयों के सुपुर्द किया। इन दो कदमों के कारण देश की जनता पर बड़े लोगों का वर्चस्व टूट गया। देश के किसान और उद्यमी को खुली हवा में फलने-फूलने का अवसर मिला।
पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ। वहां ग्रामीण क्षेत्रों में जमीदारी प्रथा बरकरार रही। औद्योगिक जगत पर मुट्ठी भर चुनिंदा परिवारों का वर्चस्व बना रहा। राजनीतिक पार्टियों में इन जमीदारी एवं उद्यमी परिवारों का वर्चस्व स्थापित हो गया। फलस्वरूप आम आदमी दबाव में रहा। पूर्व में इंग्लैंड के राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी का बोलबाला था। स्वतंत्र पाकिस्तान में चुनिंदा जमीदारी एवं उद्यमी परिवारों का बोलबाला स्थापित हो गया। जनता पूर्ववत पिसती रही।

भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला

जनता का ध्यान बंटाने के लिए इस सत्तारूढ़ गठबंधन ने कश्मीर मुद्दे को उठाया। इस कार्य के सम्पादन में गठबंधन में तीसरे सदस्य के रूप में सेना जुड़ गई। कश्मीर के मुद्दे की आड़ में सेना को प्रभुत्व एवं धन, दोनों हासिल हुए। जनता का ध्यान चुनिंदा परिवारों के वर्चस्व से हो रहे उत्पीड़न से हट गया। बल्कि इन्हीं परिवारों के सहयोग से जनता ने कश्मीर को हासिल करना चाहा। इन जमीदारों, उद्यमियों एवं सेना के गठबंधन को पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियां पोसती रहीं।
बीते दो दशक में अफगानिस्तान में तालिबान के उभरने से इस गठबंधन को एक और अवसर प्राप्त हुआ। अमेरिका के निशाने पर अलकायदा एवं तालिबान थे। अपनी इस मुहिम में अमेरिका ने पाकिस्तान का सहयोग चाहा। इस सहयोग के बदले में अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी मात्रा में सैन्य मदद दी, जिससे पाक सेना संतुष्ट हुई। साथ-साथ अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पाकिस्तान के प्रमुख उद्यमी परिवारों से समझौते किए। इससे ये परिवार संतुष्ट हुए। अफगानिस्तान की आड़ में पाकिस्तान के सत्तारूढ़ गठबंधन में चौथे सदस्य के रूप में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जुड़ गईं। पाकिस्तान की जनता पूर्ववत दबी रही। असमानता एवं आर्थिक विकास के मुद्दे पर्दे के पीछे पड़े रहे। सामने कश्मीर का मुद्दा छाया रहा। जनता जिहादियों के साथ खड़ी हो गई और भारत को अपना दुश्मन मानने लगी।
इस परिस्थिति में भारत पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि वह जिहादियों के विरुद्ध कारगर कार्रवाई करे। पाकिस्तान के सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। जनता का ध्यान समाज में व्याप्त असमानता से हटाने में जिहादियों की अहम भूमिका है। पाकिस्तान सरकार यदि जिहादियों के विरुद्ध कार्रवाई करेगी तो जनता का ध्यान चुनिंदा परिवारों के वर्चस्व पर जाएगा और सत्तारूढ़ गठबंधन की नीव हिलने लगेगी। इसलिए कश्मीर और जिहादी संगठनों को छोड़ना सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए संभव नहीं है।
इस परिस्थिति में हम कौटिल्य के मंत्र को अपना सकते हैं। वर्तमान परिस्थिति में पाकिस्तान के जमीदार, उद्यमी परिवार तथा सेना सभी संतुष्ट हैं। असंतुष्ट केवल वहां की जनता है। अतः हमें पाकिस्तान की जनता को अपने साथ लेना चाहिए। इस कार्य में गैर सरकारी संगठन हमारे सहायक हो सकते हैं। भारत को चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय डोनरों को भारी रकम उपलब्ध कराए। इनके माध्यम से इस रकम को पाकिस्तानी गैर सरकारी संगठनों तक पहुंचाए। गैर सरकारी संगठनों को कहा जाए कि वे आम आदमी के सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की बात उठाएं। जैसे भूमि सुधार की मांग उठाएं तो सत्तारूढ़ गठबंधन का जमीदारों का हिस्सा कमजोर पड़ेगा। आर्थिक अवसरों पर चुनिंदा परिवारों के कब्जे के मुद्दे को उठाएं तो सत्तारूढ़ गठबंधन का उद्यमियों का हिस्सा कमजोर पड़ेगा। तब पाकिस्तान सरकार का ध्यान घरेलू विषयों पर जाएगा और कश्मीर तथा जिहादियों को पोसते रहना उनके लिए जरूरी नहीं रह जाएगा।
पाकिस्तान में अमेरिका की भूमिका जटिल है। पाकिस्तान का आम आदमी अमेरिका को नकारात्मक दृष्टि से देखता है। वह अमेरिकी सरकार को पाक सेना का समर्थक एवं अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनिंदा उद्यमी परिवारों के समर्थक के रूप में देखता है। अमेरिका की नकारात्मक छवि की काट करने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन चीन से हाथ मिलाने को आतुर है। चीन भी भारत के विरोध में पाकिस्तान का साथ दे रहा है। पाकिस्तान की जनता अमेरिका को दुश्मन एवं चीन को दोस्त के रूप में देखती है। इसके विपरीत भारत में अमेरिका को दोस्त एवं चीन को दुश्मन के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तान की जनता के लिए उनके मित्र चीन का शत्रु भारत, पाकिस्तान का शत्रु है तथा उनके शत्रु अमेरिका का मित्र भारत, पुनः उनका शत्रु है। इसलिए पाकिस्तान की जनता को भारत के पक्ष में मोड़ना कठिन है।
हमें चीन तथा अमेरिका के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए। चीन का उदाहरण हमारे सामने है। अमेरिका का राजनयिक विरोध करते रहने के बावजूद चीन ने आधुनिकतम औद्योगिक तकनीकों को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हासिल कर लिया है। साथ-साथ आधुनिक सैन्य तकनीकों का स्वयं विकास कर लिया है। अतः हम यदि अमेरिका को छोड़ दें तो कुछ होने वाला नहीं है। बल्कि भारत तथा चीन के गठबंधन के सामने अमेरिका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व थरथर कांपेगा। हम चीन से दोस्ती करेंगे तो पाकिस्तान की जनता भी हमारे साथ आ सकती है।
मूल बात है कि भारत एवं पाकिस्तान के बीच उपलब्ध गतिरोध का कारण पाकिस्तान के जमीदारों, उद्यमी परिवारों एवं सेना का गठबंधन है। इस गठबंधन ने जिहादियों एवं कश्मीर के मुद्दे को भड़का रखा है। इस गठबंधन को तोड़े बिना पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंध बनाना संभव नहीं है। इस गठबंधन को तोड़ने का छिद्र उनके द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी नीतियां हैं।
अतः हमें पाकिस्तान की जनता को सत्तारूढ़ गठबंधन के विरुद्ध खड़ा करना होगा। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय डोनरों के माध्यम से पाकिस्तान के गैर सरकारी संगठनों को मदद पहुंचानी चाहिए। हमें चीन से मैत्री करनी चाहिए। पाकिस्तान की जनता चीन को अपना मित्र समझती है। हम भी चीन से मैत्री कर लें तो पाकिस्तान, भारत और चीन का गठबंधन बनाकर शेष विश्व से जीत सकते हैं।
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)


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