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पहले ही चुनाव में मिली उन्हें हार

Posted On April - 13 - 2017

अम्बेडकर जयंती

कृष्ण प्रताप सिंह
11304cd _1301116203_Babasaheb_Ambedkar1आज हम भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को उनकी 126वीं जयंती पर याद कर रहे हैं। देश की नयी पीढ़ी के लिए यह जानना दिलचस्प है कि यदि उन्हें भारत के संविधान का निर्माता कहा जाता है तो उनका योगदान क्या था? 26 नवम्बर, 1949 को संविधान के अधिनियमित, आत्मार्पित व अंगीकृत होने के बाद 1952 में सम्पन्न हुए देश के पहले लोकसभा चुनाव में वे हार गये थे। उनकी यह चुनावी पराजय लम्बे समय तक चर्चा का विषय बनी रही थी। वैसे ही, जैसे समाजवादी चिंतक आचार्य नरेन्द्र देव की फैजाबाद में उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले उपचुनाव में हुई अप्रत्याशित हार खासी चर्चा का विषय बनी थी।
इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि बाबा साहब की जयंतियों व निर्वाण दिवसों पर अनेकानेक समारोही आयोजनों के बावजूद हमारी नयी पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में ज्यादा प्रामाणिक जानकारियां नहीं हैं। उनके लिखे-पढ़े और कहे पर भी या तो चर्चा ही नहीं होती या खास राजनीतिक नजरिये से होती है, जिस कारण उनका असली योगदान एवं मन्तव्य सामने नहीं आ पाता।
संभवत: देश में कम ही लोग जानते हैं कि आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में वे विधि और न्यायमंत्री हुआ करते थे। इसके बाद कई मुद्दों पर कांग्रेस से नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने 27 सितम्बर, 1951 को पंडित नेहरू को पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इसके उपरांत उनके द्वारा 1942 में गठित जिस शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को वे स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण ठीक से खड़ा नहीं कर पाये थे, उसको नये सिरे से मजबूत करने में लग गये।
1952 का पहला आम चुनाव आया तो उन्होंने उक्त फेडरेशन के बैनर तले 35 प्रत्याशी खड़े किये लेकिन उन दिनों देशवासियों में कांग्रेस के प्रति कुछ ऐसा कृतज्ञाता का भाव था कि उनके सिर्फ दो ही प्रत्याशी जीत सके। खुद डॉ. अम्बेडकर महाराष्ट्र की मुम्बई शहर उत्तरी सीट से चुनाव हार गये। उन दिनों की व्यवस्था के अनुसार इस सीट से दो सांसद चुने जाने थे और दोनों कांग्रेसी चुन लिये गये।
बाबा साहब को कुल 1,23,576 वोट मिले जबकि कांग्रेस के प्रत्याशी काजरोल्कर को 1,37,950 वोट। यह हार डॉ. अम्बेडकर के लिए इस कारण कुछ ज्यादा ही पीड़ादायक थी कि महाराष्ट्र उनकी कर्मभूमि हुआ करता था। तिस पर कोढ़ में खाज यह कि मई, 1952 में लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव में वे फिर खड़े हुए तो भी अपनी हार नहीं टाल सके।
लेकिन इन शिकस्तों से उनके राजनीतिक जीवन पर इसलिए ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उन दिनों बड़े नेता चुनावों की जीत-हार को ज्यादा महत्व नहीं देते थे और उन्हें अपनी नीतियों व विचारों को जनता के बीच ले जाने और प्रचारित करने के अवसरों के रूप में लेते थे। अलबत्ता, बाद में बाबा साहब ने स्टेट कौंसिल में मुम्बई को आवंटित 17 सीटों में से एक पर परचा भरा तो वहां से निर्वाचित हो गये थे।
इस संदर्भ में यह जानना भी जरूरी है कि बाबा साहब की इन्हीं हारों की बिना पर उनसे असहमत नेता व पार्टियां तर्क दिया करती थीं कि उन्हें दलितों का नेतृत्व करने या उनकी ओर से बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि दलित तो उन्हें वोट ही नहीं देते और वे उनके साथ होने के बजाय महात्मा गांधी के पीछे एकजुट हैं।
प्रसंगवश, जिस संविधान के निर्माण में बाबा साहब ने अपना अविस्मरणीय योगदान दिया, पहले उसके लिए बनी संविधान सभा के सदस्यों में भी उनका नाम नहीं था। बाबा साहब के समर्थकों को यह बात ठीक नहीं लगी तो बंगाल के एक दलित सदस्य ने संविधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर उनकी सदस्यता का रास्ता साफ किया था।
काबिले गौर है कि बाबा साहब की ही तरह भारतीय जनसंघ के संस्थापक डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी पंडित नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल थे। 1952 के लोकसभा के आम चुनाव में उन्होंने जनसंघ के 94 उम्मीदवार खड़े किये थे, जिनमें से तीन को जीत हासिल हुई थी। वे स्वयं कलकत्ता दक्षिण पूर्व से और उनका एक उम्मीदवार मिदना झाड़ग्राम से जीता था। उन्हें तीसरी सीट राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से हासिल हुई थी।


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