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पंजाब की हार से दिल्ली में बढ़ी आप की मुश्किलें

Posted On April - 1 - 2017

arvind-kejriwal-Aaap copyअजय पांडेय
पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव के परिणाम कांग्रेस और भाजपा के लिए चाहे जो अहमियत रखते हों, लेकिन दिल्ली में हुकूमत कर रही आम आदमी पार्टी के लिए इन दोनों राज्यों के चुनावी नतीजे बेहद निराश और हताश करने वाले साबित हुए हैं। इन दोनों प्रांतों में मिली पराजय से अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली इस पार्टी के दिल्ली से बाहर पांव पसारने के मंसूबों पर पानी फिर गया है। यदि बात दिल्ली से बाहर मिली इस हार तक ही सीमित होती, तो भी गनीमत थी, लेकिन दिल्ली के तीनों नगर निगमों के आगामी चुनाव के बहाने पार्टी के सामने अब अपने ही गढ़ में अपनी ताकत दिखाने की अग्निपरीक्षा से गुजरने की कड़ी चुनौती भी आ खड़ी हुई है। यदि दिल्ली में भी पराजय मिली तो एक नवोदित पार्टी के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। पंजाब और गोवा में मिली हार का असर आम आदमी पार्टी पर अब दिखाई भी देने लगा है। दिल्ली में विधायक पार्टी छोड़कर जाने लगे हैं और जो पार्टी के भीतर हैं, वे भी आंख दिखा रहे हैं। कम से कम आम आदमी पार्टी के भीतर यह कोई साधारण बात नहीं है। अब तक आलम यह रहा है कि विधायकों को साफ तौर पर यह बताया गया कि वह जो कुछ भी हैं वे अरविंद केजरीवाल की वजह से हैं और इस दावे में पूरी हकीकत भी है। लेकिन अब जैसे जैसे वक्त बीतता जा रहा है, क्षेत्र की जनता इन विधायकों से सवाल करने लगी है और इनको भी यह लगने लगा है कि यदि लोगों के काम नहीं हुए तो जवाब केजरीवाल नहीं देंगे, बल्कि उन्हें देना होगा।
ढाई साल पहले दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी ने पंजाब और गोवा के बहाने पहली बार दिल्ली से बाहर अपनी जमीन तलाशने की कोशिश की थी। गोवा तो नहीं, लेकिन पंजाब को लेकर खुद केजरीवाल से लेकर आम आदमी पार्टी के तमाम नेता बेहद आशान्वित थे। इधर, दिल्ली के सियासी पंडितों के बीच भी चर्चा यही थी कि यदि कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी के हाथों पराजित हो गई तो दिल्ली की तो जाने दीजिए, राष्ट्रीय राजनीति में भी उसे केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से बेहद कड़ी चुनौती मिलेगी। यहां तक कहा जा रहा था कि पंजाब और गोवा में जीत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी गुजरात, हिमाचल, राजस्थान में भी विजय पताका फहरायेगी और केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में पीएम मोदी के विकल्प के तौर पर उभरेंगे। खुद केजरीवाल जिस कदर पीएम मोदी पर सियासी हमले कर रहे थे, उससे साफ था कि उनके लिए अब दिल्ली की सियासत मायने नहीं रखती, वह समूचे देश की सियासत करने की तैयारी में थे। लेकिन पंजाब में कांग्रेस की जोरदार जीत के साथ ही न केवल ये तमाम कयास समाप्त हो गये, बल्कि अब चर्चा यह हो रही है कि यदि दिल्ली में भी कांग्रेस जीत गई तो आम आदमी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी।
दिल्ली में आप कांग्रेस को समाप्त कर खड़ी हुई थी। लगातार डेढ़ दशक तक दिल्ली में हुकूमत करने वाली कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली और उसका लगभग सारा वोट आप को चला गया। शुरुआत के एक डेढ़ साल तक के माहौल को देखते हुए यह कहना मुश्किल था कि दिल्ली में कांग्रेस की वापसी भी हो पायेगी, लेकिन पिछले साल नगर निगम की 13 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज कर आम आदमी पार्टी की बराबरी की और बड़ी संख्या में वोट खींचकर अपनी वापसी के संकेत दिये। पार्टी अब पूरी मुस्तैदी से तीनों नगर निगमों के चुनाव में जोर आजमाइश कर रही है।
आजादी के बाद से यदि दिल्ली की सियातस की बात करें तो चुनाव चाहे नगर निगम का हो अथवा लोकसभा का, यहां पर मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होता रहा है। जनता दल, बसपा, एनसीपी ने कांग्रेस के वोट बैंक में थोड़ी बहुत सेंध जरूर लगाई, लेकिन फिर भी इनकी वजह से पार्टी को उतना नुकसान कभी नहीं हुआ, जितना आम आदमी पार्टी के सामने आने के बाद हुआ। दिलचस्प यह भी है कि अलग-अलग कारणों से कांग्रेस के वोट बैंक में भले उतार-चढ़ाव आया हो, लेकिन भाजपा के वोट प्रतिशत में कोई खास फर्क कभी नहीं पड़ा। दूसरे दल उसके वोट बैंक को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाए। अब जबकि नगर निगम का चुनाव होने जा रहा है तो इसका खास पहलू यह है कि भाजपा को अपने वोट बैंक की लड़ाई आम आदमी पार्टी या कांग्रेस से नहीं लड़नी है। उसका वोट उसकी झोली में गिरेगा ही, असली मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच होना है। दिल्ली की नगर निगमों की सत्ता पर बीते एक दशक तक काबिज रही भाजपा से सत्ता छीन लेने की चुनौती कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने है। पंजाब चुनाव प्रचार के दौरान यह कहा जा रहा था कि यदि आम आदमी पार्टी वहां पर जीत दर्ज करने में कामयाब हुई तो दिल्ली में भी वह कांग्रेस और भाजपा को हरा देगी और यदि वह पंजाब में हार जाती है तो दिल्ली में उसके लिए कांग्रेस और भाजपा को रोक पाना संभव नहीं होगा। पंजाब में मिली जीत से उत्साहित कांग्रेस दिल्ली वालों को यह समझाने में कामयाब हो जाती है कि असल में वही भाजपा के विजय रथ को रोक सकती है तो वोट उसकी झोली में गिरेंगे और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आम आदमी पार्टी के लिए आगे की राह आसान हो जायेगी। बहरहाल, नगर निगम के इस चुनाव से भाजपा की नहीं, बल्कि दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की भविष्य की सियासत तय होगी।


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