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नापाक मंसूबे

Posted On April - 16 - 2017

पाक पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव जरूरी

Edit-1भारत-पाक में समुद्री सुरक्षा पर होने वाली वार्ता टल जाना अप्रत्याशित नहीं है। दरअसल भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी कुलभूषण जाधव को जिस तरह अगवा कर पाक सैन्य अदालत ने फांसी की सजा सुनायी है, उसके बाद यह अपेक्षित ही था कि परस्पर संबंधों में पहले से जारी गतिरोध तनाव में बदल जाये। वही होता भी दिख रहा है। मछुआरों की स्थिति समेत समुद्री सुरक्षा पर दोनों देशों के बीच रविवार से दो दिवसीय वार्ता होनी थी, जिसे कुलभूषण जाधव प्रकरण पर तनातनी के बाद रद्द कर दिया गया। जिस तरह जाधव को मनगढ़ंत मामले में फंसाते हुए तमाम न्यायिक प्रक्रिया को ताक पर रखते हुए फांसी की सजा सुनायी गयी है, वह सीधे-सीधे भारत को उकसाने वाली कार्रवाई ही है। उसके बाद भारत की प्रतिक्रियाओं पर भी पाकिस्तान जैसी धमकी वाली भाषा बोल रहा है, वह भी उसके नापाक मंसूबों की ओर ही इशारा करती है। भारत को यह अधिकार है कि वह अपने जायज नागरिक को इस तरह अगवा कर सैन्य अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाये जाने पर राजनयिक माध्यमों से विरोध दर्ज कराने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और न्यायालय के समक्ष यह मुद्दा उठाये। भारत ने अभी तक पाकिस्तान के साथ राजनयिक माध्यम से ही विरोध दर्ज कराते हुए अपनी संसद के जारी सत्र में इस पर कड़ी नाराजगी जतायी थी और जाधव को बचाने के लिए कुछ भी करने का इरादा जताया था। यह बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, लेकिन इस पर पाकिस्तान ने जिस भाषा और शैली में जवाबी प्रतिक्रिया दी है, वह बताती है कि दरअसल जाधव प्रकरण के जरिये वह वह किसी बड़े प्रपंच की फिराक में है। पाक सेना ने जाधव को बलूचिस्तान से गिरफ्तार दिखाते हुए उस पर अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया है। ध्यान रहे कि बलूचिस्तान में पाक सेना के दमन के चलते जारी विरोध और बगावत के लिए अरसे से भारत पर उंगली उठायी जाती रही है।
यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि जाधव प्रकरण के जरिये पाकिस्तान अपने भारत विरोधी प्रोपेगंडा को आधार देने की कोशिश कर रहा है। यह भी अनायास नहीं है कि अब पाक कब्जेवाले कश्मीर में तीन लोगों को भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का एजेंट बताते हुए गिरफ्तार किया गया है। उनकी कथित स्वीकारोक्ति के आधार पर भी जाधव जैसी ही भारत विरोधी कहानियां सुनायी जा रही हैं। निश्चय ही यह किसी ऐसे पड़ोसी देश का आचरण नहीं हो सकता, जो संबंध सुधार की बातें भी करता हो। दरअसल यह पाकिस्तान की कथनी-करनी के बीच के विरोधाभास का एक और प्रमाण भी है। वैसे इस बीच एक थ्योरी यह भी आ रही है कि जैसा अकसर होता है, पाक सेना नहीं चाहती कि भारत से संबंध सुधरें, इसीलिए जाधव सरीखे प्रपंच रचे जा रहे हैं। यह खुला रहस्य है कि पाकिस्तान में अकसर सेना निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार पर हावी रहती है। फिर मौजूदा पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तो पनामा कांड में अपनी विदेशी दौलत-संपत्ति के खुलासे के बाद बेहद कमजोर स्थिति में माने जा रहे हैं। राहिल शरीफ की पाक सेना प्रमुख पद से सेवानिव‌ृत्ति के बाद उम्मीद की जा रही थी कि नवाज को राहत मिल पायेगी, लेकिन लगता है कि नये सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी अपना दबाव कम नहीं पड़ने देना चाहते। अगर यह थ्योरी सच है तो भारत के लिए पाकिस्तान से डील करना और भी जटिल हो जायेगा, क्योंकि वहां एक निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार तो है, लेकिन उसके पास अपेक्षित अधिकार नहीं हैं। बेशक यह पाकिस्तान की आंतरिक समस्या है, जिसमें भारत ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, लेकिन जाधव सरीखे प्रपंचों में मूकदर्शक भी बन कर नहीं रहा जा सकता। ऐसे में भारत को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को विश्वास में ले कर पाकिस्तान पर हर संभव दबाव बढ़ाना चाहिए।


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