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नये युग को तैयार हिमाचल की सियासत

Posted On April - 1 - 2017

virbhadra singh-2 copy10104CD _DHUMAL_BIGज्ञाान ठाकुर
हिमाचल प्रदेश के लिए वर्ष 2017 चुनावों का वर्ष है। ऐसे में राज्य के कई राजनीतिक दिग्गजों के लिए यह साल आखिरी राजनीतिक पारी का होगा, जबकि कई राजनीतिज्ञों का राजनीतिक भविष्य तय करेगा। खासकर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव नतीजों के बाद यह तय हो गया है कि हिमाचल प्रदेश की राजनीति में मौजूदा साल नये राजनीतिक युग का होगा। एक ओर जहां उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की जीत से उत्साहित भाजपा राज्य में नये और युवा नेतृत्व का दांव खेलने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश में मौजूदा सत्तादल कांग्रेस के वीरभद्र सिंह, विद्या स्टोक्स और इसी आयु वर्ग के अन्य नेताओं के लिए यह साल राजनीतिक जीवन का आखिरी साल भी हो सकता है।
हिमाचल में खासकर भाजपा की राजनीति में पांच राज्यों के हालिया चुनाव नतीजों के बाद नेतृत्व के लिए किसे आगे लाया जाए और पुरानों का कहां विस्थापन होगा, इसे लेकर मंथन अभी जोरों पर है। जहां तक राज्य में भाजपा की राजनीति का सवाल है, इसमें पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा दो अलग-अलग गुटों को आगे बढ़ा रहे हैं। इनमें नड्डा के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि वह न केवल युवा हैं, बल्कि मोदी के करीबी भी हैं और केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनका प्रदर्शन भी ठीक-ठाक है, जबकि दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के राजनीतिक कैरियर में उम्र आड़े आ सकती है, क्योंकि धूमल इसी साल 75 के हो जाएंगे। यदि प्रधानमंत्री मोदी के मापदंड यहां भी लागू हुए तो उनकी राजनीतिक चाहतों पर पानी फिर सकता है। हिमाचल भाजपा में इस समय अनुराग ठाकुर, जयराम ठाकुर, सतपाल सत्ती, सुरेश भारद्वाज, राजीव बिंदल और मंडी से सांसद रामस्वरूप शर्मा जैसे कुछ ऐसे चेहरे हैं, जिन पर भारतीय जनता पार्टी हाईकमान कभी भी दांव खेल सकती है।
दूसरी ओर कांग्रेस की राजनीति में खासकर वीरभद्र सिंह और विद्या स्टोक्स का इस साल होने वाला विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का आखिरी चुनाव माना जा रहा है, क्योंकि ये दोनों ही 80 की उम्र कब के पार कर चुके हैं। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि इन्हें इस बार टिकट लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है। हालांकि वीरभद्र सिंह के लिए टिकट से अधिक राजनीतिक और कानूनी फ्रंट पर लड़ाई ज्यादा महत्वपूर्ण एवं निर्णायक हो गई है। वीरभद्र सिंह के आय से अधिक संपत्ति के मामले में यदि अदालत का फैसला उनके खिलाफ आता है तो वीरभद्र सिंह के लिए खासकर राजनीतिक जीवन में मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। वीरभद्र सिंह इस समय अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को राजनीति में स्थापित करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि विक्रमादित्य को राजनीति में स्थापित करने का संभवत: वीरभद्र सिंह के पास इस साल आखिरी मौका है। वीरभद्र सिंह यदि इसमें सफल नहीं होते हैं तो आने वाले समय में विक्रमादित्य को पैर जमाना आसान नहीं होगा।
प्रदेश की वीरभद्र सिंह सरकार के लिए इसी महीने 9 अप्रैल को होने वाला भोरंज उपचुनाव ‘लिटमस टेस्ट’ से कम नहीं है। प्रदेश की राजनीति में इस चुनाव को इसी साल होने वाले विधानसभा के आमचुनाव के लिए भी ट्रेंड सेटर माना जा रहा है। यही कारण है कि वीरभद्र सिंह सरकार ने इस चुनाव से पार पाने के लिए, जहां एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है, वहीं विधानसभा के बजट सत्र को एक सप्ताह पहले ही खत्म करने का दांव भी खेला है। साथ ही प्रदेश के आम बजट के माध्यम से बेरोजगारी भत्ते जैसी बड़ी घोषणा कर खासकर युवाओं को लुभाने का प्रयास किया है। हालांकि खाली खजाने से चुनावी साल में प्रदेश के मतदाताओं की आकांक्षाओं को पूरा करना वीरभद्र सरकार के लिए इतना आसान नहीं है। उस पर देश में मोदी लहर और प्रदेश के विकास के मामले में केंद्र की बैसाखियों पर निर्भर हो जाना भी, जहां सरकार के खिलाफ जा रहा है वहीं विपक्ष को केंद्र से मिल रही सहायता एक बड़ा मुद्दा हाथ लगा हुआ है। प्रदेश पर कर्ज का बोझ और राज्य में विपक्ष की भाषा में माफियाओं के राज का अलाप भी सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
बहरहाल, हिमाचल में चुनावी साल शुरू हो चुका है। सरकार जहां चुनावी रेवड़ियां बांटने में मशगूल है, वहीं विपक्षी दल भाजपा मोदी लहर पर सवार होने की कोशिश में है। अब देखना है कि आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति किस करवट बैठती है।


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