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दिल्ली : अपनी पार्टी में ही नेताओं के नहीं मिलते दिल

Posted On April - 13 - 2017

अजय पांडेय
arvind-kejriwal-Aaap copyदिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय से सूबे में कांग्रेस और भाजपा के आसपास घूमने वाले सियासी गणित में बदलाव जरूर आया, लेकिन इन दलों में अंदरखाने चलने वाली सियासी उठापटक पर कोई असर नहीं पड़ा। कुछ नया कर दिखाने का आभास कराने वाली नयी नवेली आम आदमी पार्टी के भीतर भी हालात कांग्रेस और भाजपा से कुछ ज्यादा अलग नहीं हैं। अंतर्कलह से सभी पार्टियां जूझ रही हैं। एक-दूसरे को गिराने और उठाने का खेल हर पार्टी में जारी है।
भाजपा को दिल्ली में पारंपरिक रूप से पंजाबी और वैश्य समाज के प्रभुत्व वाली पार्टी समझा गया। दिल्ली में पार्टी के तमाम सूरमा इन्हीं दोनों समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। अब तक पार्टी के जितने भी प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये, उनमें ज्यादातर पंजाबी या वैश्य समुदाय से हुए। लेकिन इस बार पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर पूर्वांचल से ताल्लुक रखने वाले सांसद मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अपने आप में यह नया प्रयोग है। जाहिर तौर पर इसका मकसद यही है कि राजधानी की राजनीति को प्रभावित करने वाले पुरबिया मतदाताओं को प्रभावित किया जाए। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के इस फैसले से दिल्ली के पुराने नेताओं को दिक्कत हो रही है। दिल्ली में भाजपा की कमान डा. हर्षवर्धन, विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता के हाथों में ही रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने डा. हर्षवर्धन और विजय गोयल को केंद्र में मंत्री बनाकर दिल्ल्ली की सियासत से उन्हें थोड़ा अलग कर दिया तो प्रो. जगदीश मुखी को अंडमान निकोबार द्वीपसमूह का उपराज्यपाल बना दिया गया। जाहिर है कि पुराने प्रमुख नेताओं को अलग कुर्सी देकर बैठा दिया गया, लेकिन आज भी यह महसूस किया जा रहा है कि दिल्ली भाजपा में केंद्रीय मंत्री विजय गोयल का खेमा ज्यादा सक्रिय है। डा. हर्षवर्धन के करीबी लोगों की उनके प्रति वफादारी कायम है। दूसरी ओर जाट समुदाय से आने वाले सांसद प्रवेश वर्मा और गुर्जर समुदाय से आने वाले रमेश बिधूड़ी का अलग दमखम है। दिल्ली में स्थानीय कहे जाने वाले इन नेताओं के सामने प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी की भी नहीं चल रही। इतना जरूर है कि उनके आने से अलग-अलग गुटों में बंटी भाजपा में उनका भी एक अलग गुट बन गया है और पूर्वांचल से ताल्लुक रखने वाले नेता उनके पीछे गोलबंद हो गये हैं।
Ajay-Maken copyदिल्ली में कांग्रेस की सियासत किसी जमाने में एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार सरीखे कद्दावर पंजाबी और जाट नेताओं के इर्द गिर्द घूमती थी, लेकिन पूर्व सीएम शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के भीतर की सियासत में तेजी से बदलाव हुआ। एक वह जमाना भी आया जब दिल्ली में कांग्रेस का मतलब ही शीला दीक्षित हो गया। प्रदेश संगठन उनके कद के सामने बौना हो गया था। लेकिन अरविंद केजरीवाल के हाथों खुद शीला दीक्षित को और उनकी पूरी पार्टी को वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में मिली मात के बाद से स्थितियां बदली हैं। कमोबेश आज दिल्ली में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन के पीछे खड़ी है, लेकिन यह भी सच है कि शीला गुट अब भी सक्रिय है और जगह-जगह माकन को चुनौती भी दे रहा है। हाल ही में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने वाले पूर्व विधायक अमरीश गौतम को शीला का ही करीबी माना जाता है। दूसरी ओर उनके ही मंत्रिमंडल के मंत्री और करीबी मंगतराम सिंघल ने भी खुलकर माकन के खिलाफ मोर्चा खोला और निगम चुनाव में टिकटों के बंटवारे में गड़बड़ी का आरोप लगाया। शीला के अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल, अरविंदर सिंह लवली के भी अलग-अलग खेमे जरूर हैं, लेकिन माकन के खिलाफ यदि वाकई कोई सबसे ज्यादा मुखर खेमा दिखाई दे रहा है तो वह शीला दीक्षित का ही खेमा है।
manoj-tiwary-right copyआप नयी है और अरविंद केजरीवाल के करिश्मे पर निर्भर है। लेकिन अब आप में भी अनुशासन की डोर ढीली हो रही है। सबसे पहले केजरीवाल ने खुद ही पार्टी के संस्थापकों में शामिल अपने करीबी लोगों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर कराया। उनके साथ पार्टी के एक विधायक पंकज पुष्कर भी चले गये। उसके बाद दबी आवाज में बोलने वाले विधायक देवेंद्र सहरावत ने भी केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मंत्रिमंडल से निकाले जाने के बाद आसिम अहमद खान भी हमलावर हो गये। हाल ही में पार्टी के एक विधायक ने पार्टी छोड़कर विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि कम से कम तीन दर्जन ऐसे विधायक हैं, जिनमें पार्टी की गतिविधियों को लेकर विरोध है और वे अपने तेवर दिखा सकते हैं।


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