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दक्षिण तक पहुंची उत्तर की हवा

Posted On April - 8 - 2017

1111विनय ठाकुर
बहुत कम ऐसे मौके होते हैं जब सुदूर दक्षिण से चलकर कोई प्रदर्शनकारी समूह मीडिया मंडी दिल्ली में इतनी सुर्खियां बटोर ले जाये। एक तो भाषा का अवरोध, दूसरा मुख्यधारा के राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की न के बराबर दिलचस्पी। लेकिन इस बार तमिलनाडु के हताश किसानों के विरोध प्रदर्शन के तरीके व आरके नगर में होने वाले विधानसभा उपचुनाव ने इन कारकों के प्रभाव को बेअसर कर दिया है। किसान दिल्ली में जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर चुके किसानों की खोपड़ी के साथ धरने पर बैठे हैं और धरने ने नेताओं के साथ ही न्यायालय के ध्यान को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। पिछले साल तमिलनाडु में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 100 से अधिक थी। इनमें से ज्यादातर किसान कावेरी डेल्टा क्षेत्र के हैं। इनकी फसल पानी नहीं मिलने के कारण खराब हो गयी और खेती के लिए गये कर्ज को लौटाने में वे असमर्थ हो गये। कर्जदारों के दबाव व व्यवहार से होने वाली मानसिक यंत्रणा ने कई किसानों को आत्महत्या के अंतिम विकल्प को चुनने के लिए मजबूर कर दिया। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक ओर जहां सभी किसानों को कर्ज से राहत देने के लिए कहा है, वहीं केंद्र सरकार को इस बात की ताकीद की है कि वह इस मुद्दे पर असंवेदनशील व्यवहार नहीं दिखा सकती। उसे राज्य सरकारों की आर्थिक मदद करनी चाहिए। अदालत के इस आदेश से 3 लाख अन्य किसानों को फायदा होगा। राज्य सरकार को अपनी पूर्व घोषित योजना के 5780 करोड़ रुपये के अतिरिक्त 1980 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। दिल्ली में धरने पर बैठे तमिलनाडु के किसानों की मांग है कि उन्हें सरकार से 40 हजार करोड़ रुपये के कर्जमाफी का पैकेज
दिया जाये। इस साल जनवरी में तमिलनाडु सरकार ने राज्य के सभी 32 जिलों को सूखा प्रभावित घोषित करते हुए केंद्र से 39565 करोड़ रुपये के सूखा राहत पैकेज देने की मांग की थी। केंद्र सरकार से उसे हाल ही में महज 1712 करोड़ की राशि मिली है। उत्तर प्रदेश के किसानों को लगभग 36 हजार करोड़ की राहत की घोषणा ने उनके दावों को बल मिला है। किसानों की इस हालत के लिए एक ओर जहां खराब मानसून और कावेरी जलविवाद है, वहीं दूसरी ओर राज्य में राजनीतिक अस्थिरता भी इसकी वजह रही है। सत्ता का ध्यान अपनी आकर्षित करने के लिए किसानों को अतिवादी तरीके अपनाने पड़े। त्रिची के किसानों ने सरकार का ध्यान अपनी हालत की खींचने के लिए अपने दांतों में मरे हुए चूहों को दबाकर कलेक्टर के सामने प्रदर्शन किया। जिन जिलों में किसानों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या की उनमें नागापट्टनम व तिरूवरूवार का नाम आता है। दिल्ली में किसान प्रदर्शनों ने मीडिया व राजनीतिज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है, जो केंद्र की राजनीति को प्रभावित करने में असमर्थ थे। जिसकी वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान भी आसानी से सूर्खियां बटोरने में सफल हुए। कपास उपजाने वाले किसानों के मामले में मोनसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े होने के वजह से मामला ज्यादा उछला।
इस बार कर्जे के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों के मुद्दे को लेकर तमिलनाडु के किसान जंतर-मंतर पर डटे हैं। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मौत से खाली हुई राधाकृष्ण नगर सीट पर हो रहे उपचुनाव की  वजह से जंतर-मंतर पर नेताओं (खासकर तमिलनाडु के) के फेरे कुछ ज्यादा लग रहे हैं। किसानों की समस्या न पहले हल हुई न अब होती दिख रही है। वे पहले भी सियासी मोहरा बनते आये हैं और अब भी ऐसा ही हाल है।


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